Friday, December 25, 2009

उत्सव बना झमेला

खुशी अफसोस में बदल गई

मेरे छोटे भाई की शादी तय हो गई थी। 12 फरवरी को शादी और 14 को रिसेप्सन ओ भी बिना लड़की देखे। कि शादी ही तो करनी है। लड़की से करनी है देखना क्या । मुख्य आधार था लड़की का एक सुघड़ भाभी से तुलना। मेरे भाई ने कहा जब लड़की उन भाभी की तरह है तो मैं कर लूँगा। लड़की एमएससी कर के रिसर्च कर रही है और हायर स्टडी के लिए अमेरिका जा रही है। लड़की फरवरी में अमेरिका जा रही है। दोनों की आपस में बात भी शुरू हो गई थी। जिसमें मेरे भाई ने कहा कि तुम अपना केरियर देखो। फिर भी माँ ने कहा कि तुम लड़की एक बार देख लो। शादी के पहले। शायद माँ के मन ने कुछ भाप लिया था। लड़की अपने भाई और पिता के साथ नोयडा आई और मेरा भाई हैदराबाद से आया अपनी भावी पत्नी को देखने।

मुझे छोड़ कर सभी थे। लेकिन जब मेरे भाई ने लड़की को देखा तो जिन भाभी से उस लड़की की तुलना की गई थी वो उसमें दूर-दूर तक नहीं दिखीं। इतना ही नहीं लड़की के कपड़े अस्त-व्यस्त थे साफ नहीं थे। नए नहीं थे। कुछ भी ऐसा नहीं लग रहा था कि वे लोग लड़की को दिखाने आए हैं। यही नहीं लड़की समेत वे सारे लोग बड़े रिजिड और अड़ियल दिखे। भाई फिर खूब उत्साहित था। सज-धज कर तैयार था आखिर उस लड़की से मिलने जा रहा था जो उसके सपनों से जुड़ रही थी।

मिल कर वह बात-व्यवहार और रंग-ढंग से कपड़े-लत्ते से दुखी हुआ। फिर भी भैया के कहने पर वह शादी के लिए मान गया। कि लड़की को देख कर मना नहीं करते। बात सही दिशा में थोड़ी देर चली तो मामला वेन्यू पर आ कर फिर अटक गया। भाई चाहता था कि शादी इलाहाबाद से हो। लेकिन वे लोग लखनऊ से शादी करने पर अड़े रहे। फिर भी मेरे बड़े भाई ने कहा कि सोच लीजिए अगर इलाहाबाद से हो तो अच्छा रहेगा। हम फिर बात कर लेंगे। अगले दिन लड़की के भाई का फोन आया कि शादी लखनऊ से ही होगी और रिसेप्सन भी यहीं से होगा। उनका यह रवैया भाई को ठीक न लगा। हमारी ओर से इलाहाबाद में शादी करने के अलावा और कोई माँग न थी। इस पर वे लोग असहज रूप से पेश आ रहे थे। जिस बात को बड़ी प्यार से मनवाया जा सकता था उस पर वे लोग कुछ ढ़ीठ की तरह डट गए।

और इस के बाद भाई ने शादी से इनकार कर दिया। माँ अभी भी यह चाहती है कि यही शादी हो जाए। उधर से लड़की मेरे भाई को फोन करने लगी। पूरे प्रकरण से परेशान भाई में पहले तो फोन लेने की हिम्मत न रही। फिर उसने बात किया तो लड़की ने पूछा कि क्या गलती हुई। मेरे भाई ने कहा कि मेरी और आपकी शादी लगता है नहीं लिखी है। आपको और अच्छे जीवन साथी मिलेंगे। यह मेरी दुआ है।

अपने इस निर्णय से भाई और मेरा पूरा घर दुखी है। ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी लड़की को देखने के बाद किसी और कारण से शादी से न करना पड़ा है। हम यह सोच कर परेशान हैं कि आखिर लड़की वालों को कैसा लग रहा होगा।

बाद में सोचने समझने पर समझ में आया कि बिचौलिए हड़बड़ी में थे। उन्होंने दोनों तरफ के लोगों को भरम में रखा। जिसका परिणाम यह निकला कि एक लड़की और एक लड़का बे वजह परेशान हो रहे हैं। दोनों अनायास ही एक दूसरे की नजर से गिर गए हैं। वे लोग अभी भी यह नहीं समझ पा रहे हैं कि शादी क्यों टूटी। और इधर सो कोई उन्हें साफ-साफ यह नहीं कह पा रहा कि उनके अड़ियल बर्ताव से मामला बिगड़ रहा है। जब मैंने भाई से कहा कि तुम्हें लखनऊ बारात लेकर चलने में क्या दिक्कत है। तो वह बोला कि दिक्कत कुछ भी नहीं। बस उनके बोल बचन अच्छे नहीं लगे।

भाई की दुविधा यह है कि जो लड़की फोटो में बहुत अच्छी दिख रही थी वह सामने से इतनी उलट क्यों है। जो ल़ड़की फोन पर इतनी सहज और मीठी थी वह सामने से इतनी उलझी और कठोर क्यों थी। कहीं ऐसा तो नहीं कि उनके यहाँ कोई आपसी संकट रहा हो। जिसके कारण लड़की को कोई उलझन रही हो। जो भी रहा हो। खामखा का एक संभावित उत्सव झमेले में बदल गया। 12 और 14 फरवरी 2010 मेरे भाई और उस लड़की के लिए एक मनहूस तारीख की तरह दर्ज हो गए हैं। बिचौलिए पति-पत्नी वहीं आपस में भिड़ गए कि मैंने कहा था तैने कहा था। लेकिन अभी इससे क्या। दोनों पक्षों की फजीहत हो रही है।

6 comments:

मनोज कुमार said...

बहुत अच्छी रचना। क्रिसमस पर्व की बहुत-बहुत शुभकामनाएं एवं बधाई।

विजय गौड़ said...

क्या यह रचना है ? या कोई सत्य घटना ?
रचना है तो अच्छी नहीं है, क्योंकि लेखकीय हस्तक्षेप जो घटना को रचना में पिरोने वाला रहा होगा, दिखाई नहीं देता और यदि सत्य घटना है तो सीधा-सीधा सवाल है कि जब स्त्रियां बहन, मां या अन्य किसी भी रिश्ते में होती हैं तो उनकी मानसिकता में वह स्त्रीपन क्यों नहीं दिखता जो उसको एक स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में स्थापित करे ? क्यों वही सामंती मानसिकता बार बार झलक जाती है जो व्यक्ति के निजी्पन के खिलाफ़ होती है ?
आभा जी का यह वाक्य, "कुछ भी ऐसा नहीं लग रहा था कि वे लोग लड़की को दिखाने आए हैं।" मुझे कचोट रहा है।

अन्तर सोहिल said...

आभा जी
आपकी बातों से ऐसा लग रहा है कि "लडकी वालों को लडके वालों के सामने थोडा झुक कर रहना चाहिये।" यह मेरा भ्रम भी हो सकता है।
खैर मेरे साथ भी ऐसी ही घटना हुई थी, ससुराल पक्ष ने सगाई के समय वादा किया था कि जहां आप कहेंगें शादी का वेन्यू वहीं होगा। मगर शादी से एक महिना पहले उनका मूड बदल गया।
लेकिन मैने बेमन से उनकी बात मानकर गांव में ही बारात ले जाने का फैसला किया। लडका-लडकी में सगाई के बाद 6-7 महिनों की बातचीत में काफी जुडाव हो जाता है।

प्रणाम स्वीकार करें

कार्तिकेय मिश्र (Kartikeya Mishra) said...

यदि सत्य घटना है तो एक ईमानदार सलाह..

गोली मारिये बिचौलियों को, एक बार दोनों परिवार मिल बैठ कर बातें सुलझाने की कोशिश कर लें..

लड़की का बिना सजे धजे आना उसके आत्मविश्वास का भी तो परिचायक हो सकता है..

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

यदि ऎसी घटना या कोई रचना पुरुष द्वारा राखी गई होती तो आफत आ जाती, सामंती सोच, स्त्री को सामान बनाने जैसी बातें सुना दी जातीं. यहाँ क्या है? क्या एक महिला वस्तु के रूप में सामने नहीं है?
स्त्री को सशक्त मानने वाले और धर्म को बेड़ियाँ बताने वाले कन्यादान जैसी रस्म का विरोध करते हैं पर लड़की दिखाने, बारात के दरवाजे पर आने, वर के घोड़े पर चढ़ कर आने, लड़की के विदा होकर लड़के के घर जाने, लड़की की मुंह दिखाई आदि रस्मों को ख़ुशी-ख़ुशी निभाते हैं. इनसे मुक्ति का रास्ता भी खोजना होगा.
वैसे ये घटना सत्य भी हो सकती है क्योंकि इसमें एक शब्द जुदा है "बिचौलिया"

दुखद है ये.............

Renu said...

If its a true incindent, thenits better that they have broken. Anyone who doesnt respect the relations(its shown by the casual way of dressing by girl and her behaviour)..doesnt deserve them.

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