Monday, January 4, 2010

स्वप्न भी एक शुरुआत है

स्त्री-मुक्ति का यथार्थ और यूटोपिया:भाग-1

-राजीव रंजन गिरि

पटना से छपने वाली पत्रिका 'वर्तमान संदर्भ' ने अपना अगस्त 2009 अंक 'स्त्री मुक्ति: यथार्थ और यूटोपिया'पर केंद्रित किया है। संपादक संगीता आनंद 'बातें तेरी मेरी' में लिखती हैं- "जो स्त्री-अस्मिता और विमर्श का जन्म आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक गैर-बराबरी से मुक्ति के रूप में हुआ था, वह भटक कर महज देह पर केंद्रित हो गया है।"

पत्रिका के इस अंक के अतिथि संपादक राजीव रंजन गिरि दिल्ली विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं। उनका अतिथि-संपादकीय 'स्वप्न भी एक शुरुआत है' एक कविता के बहाने स्त्री मुक्ति के यथार्थ और यूटोपिया की पड़ताल करता है। यह लेख लंबा है। पढ़ने की सुविधा के लिए इसे तीन हिस्सों में बाट रही हूं। इस बार पहला हिस्सा दे रही हूं। मुझे पूरी उम्मीद है कि इस पर अच्छी चर्चा होगी। - अनुराधा


वह बार-बार भागती रही
बार बार हर रात एक ही सपना देखती
ताकि भूल न जाये मुक्ति की इच्छा
मुक्ति न भी मिले तो बना रहे मुक्ति का स्वप्न
बदले न भी जीवन तो जीवित बचे बदलने का यत्न


कवि अरुण कमल की एक कविता है – स्वप्न। इस कविता में एक औरत बार-बार
ससुराल से भागती है। मार खाकर। कभी किसी मंदिर की सीढ़ी पर घंटों बिताती
है। फिर अंधेरा होने पर उसी जगह लौट आती है। कभी किसी दूर के सम्बन्धी या
परिचित के घर दो चार दिन काटती है। कभी अपने नैहर चली जाती है। पर हफ़्ता
या महीना भर बाद थक कर उसी जगह लौटती है। बेहतर होगा यह कहना कि उसे हर
बार लौटना पड़ता है। यह उसकी विवशता है। यह भी याद रखने की बात है कि वह
हर बार मार खाकर ही भागती है और लौटने पर भी मार खाती है। तो क्या इस
स्त्री को अपनी ट्रैजिक नियति का पता नहीं है? कविता बताती है कि उसे
बखूबी पता है कि मार खाने के बाद जहाँ से भागती है, बार-बार उसे वहीं
लौटना है। साथ ही लौट कर फिर मार खाना है। जानती थी वो कहीं कोई रास्ता
नहीं है / कहीं कोई अंतिम आसरा नहीं है / जानती थी वो लौटना ही होगा इस
बार भी। फिर भी भागती है। उसके यहाँ से गंगा भी ज्यादा दूर नहीं थी। रेल
की पटरियाँ भी पास थीं। पर वह अपनी ट्रैजिक नियति को जानते हुए भी कि उसे
फिर लौटना पड़ेगा, और मार खाना पड़ेगा; भागती है। कुछ दिन के लिए ही सही।

वह मरण का वरण नहीं करती। आत्महत्या का रास्ता नहीं अख्तियार करती है।
लिहाजा गंगा नदी का ज्यादा दूर न होना या रेल की पटरियाँ पास होना उसके
लिए कोई विकल्प नहीं रचता। मार खाने से बचने के लिए जीवन को समाप्त करना
उसे गवारा नहीं है। क्योंकि वह बार-बार जीवन से मृत्यु नहीं, मृत्यु से
जीवन के लिए भाग रही थी। भागती भी है तो खूँटे से बंधी बछिया-सी जहाँ तक
रस्सी जाती, भागती / गर्दन ऐंठने तक खूँटे को डिगाती। आखिरकार वह औरत किस
खूँटे से बंधी है, जिसे उखाड़ने की बार-बार असफल कोशिश करती है। गौर करें
गर्दन ऐंठने तक कोशिश करती है और उखाड़ भले न पाये पर डिगा देती है। गर्दन
ऐंठने तक कोशिश करना मानीखेज है। धीरे-धीरे यह खूँटा जड़ से उखड़ भले न
पाये, टूटेगा जरूर। क्योंकि वह औरत बार-बार हर रात एक ही सपना देखती है।
ताकि भूल न जाये मुक्ति की इच्छा। सपना है- मुक्ति न भी मिले तो बना रहे
मुक्ति का स्वप्न और बदले न भी जीवन तो जीवित बचे बदलने का यत्न।

इस कविता में, जहाँ से वह औरत मार खाकर भागती है, वहीं उसे बार-बार लौटना
तथा मार खाना पड़ता है। जाहिर यह उसका ससुराल है। इसके लिए अरुण कमल ने
‘घर’ या ‘परिवार’ शब्द का प्रयोग नहीं किया है। क्या यह अनायास है? जबकि
शादी के बाद, इस सामाजिक संरचना में, यही उसका ‘घर’ है या ‘परिवार’ भी।
इस कविता में ‘घर’ शब्द एक बार आया है। जहाँ वह दो-चार दिन काटती है। कभी
किसी दूर के संबंधी या किसी परिचित के घर जाहिर है यहाँ भी वह अपनी
जिन्दगी का दो-चार दिन ही सही जीती नहीं, काटती है। कभी भागकर नैहर जाती
है। पर यहाँ भी कितने दिन के लिए? हफ़्ता या महीना। वहाँ से भी थककर
लौटती है। आशय यह कि पीहर में भी जिन्दगी का कुछ दिन ही काट पाती है। भले
ही परिचित या किसी दूर के रिश्तेदार के घर के तुलना में कुछ ज्यादा दिन।

थक कर लौटना दो बातों की तरफ इशारा करता है। एक, जिन्दगी जिया नहीं गया
है, काटा गया है। दो, जो संरचना मौजूद है उसमें उसके लिए नैहर अब विकल्प
नहीं रह गया है। चाहे जो हो उसे ससुराल में ही ‘निबाहना’ है। इस सामाजिक
ढाँचे में माना यह जाता है कि डोली नैहर से उठी है तो अर्थी ससुराल से
उठेगी। ऐसे में, वह ससुराल जहाँ बार-बार पीटी जाती है, शब्द के सच्चे
मायने में ‘घर’ या ‘परिवार’ हो सकता है? हरगिज नहीं। वह उस स्त्री के लिए
‘जगह’ भर ही है। न तो ‘घर’ महज छत के नीचे का बसेरा है और न ही ‘परिवार’
कुछ लोगों के साथ भर रह लेने वाली व्यवस्था। जब तक आपसी संवेदनात्मक
रिश्ता और उससे पैदा होनेवाली उष्मा मौजूद नहीं हो, उसे ‘घर’ या ‘परिवार’
की संज्ञा नहीं दी जा सकती। आखिरकार, जब वह जगह ‘घर’ और वहाँ के लोग
‘परिवार’ नहीं है तब वह वहाँ क्यों है? वह किस ‘खूँटा’ के मजबूत रस्सी से
बंधी है जिसे गर्दन ऐंठने तक उखाड़ने या तोड़ने की हर बार कोशिश करती है।
यह खूँटा पितृसत्तात्मक व्यवस्था है। याद रखें पितृसत्तात्मक व्यवस्था के
मायने परिवार में पुरूष का सिर्फ मुखिया होना नहीं है। यह महज इतना ही
होता तो इसका ‘खूँटा’ कब का उखड़ चुका होता या इसकी ‘रस्सी’ टूट गयी होती।
क्या यह कहने की जरूरत है कि इस ढाँचे की रचना धूर्तता और चालाकी के साथ
की गयी है और आज भी हो रही है। आर्थिक, धार्मिक, राजनीतिक, वैधानिक,
सांस्कृतिक व्यवस्था और मूल्यों-मर्यादाओं, संस्कारों, आदर्शों तथा चिंतन
के विभिन्न रूपों, विचारधाराओं, निर्मितियों, गतिविध्यिों के जरिये बड़े
महीन ढंग से इसे रचा-बुना गया है। इन सबके जरिये पितृसत्ता पुरूष को औरत
की तुलना में श्रेष्ठ स्थापित करने का पाखंड रचती और फैलाती है।

इस कविता में स्त्री के पास कहीं कोई रास्ता नहीं है और कहीं कोई अंतिम
आसरा भी नहीं। जाहिर है उसे अपना रास्ता खुद बनाना है और अपना आसरा भी
खुद ही बनना है। इस स्त्री को इसका बोध् है। इस बोध और गहरी जिजीविषा ने
इसे रेल की पटरी पर या गंगा में जाने से रोका है। लिहाजा, ससुराल से मार
खाकर बार-बार भागना महज पलायन नहीं है बल्कि विकल्प रचने के लिए रास्ता
बनाने की प्रक्रिया की एक कड़ी है। इसके साथ ही पीटने की पीड़ा का अहसास
होते रहने के लिए जरूरी कदम भी है। इस पीड़ा का अहसास होना बेहद जरूरी है।
बगैर इस अहसास के न तो मुक्ति का स्वप्न याद रहेगा और न ही जीवन को बदलने
के लिए यत्न करने की अभीप्सा बचेगी। इस अभीप्सा के बगैर वह गर्दन ऐंठने
तक बार-बार खूँटे को डिगाने की असफल ही सही, कोशिश नहीं कर पायेगी।

पितृसत्ता ने एक तरफ स्त्री को घर के अंदर कैद किया है और उसके घरेलू
श्रम का अवमूल्यन किया है। दूसरी तरफ विभिन्न मूल्यों-मान्यताओं और
संस्कारों के जरिये शोषण को सहज एवं स्वाभाविक मान्यता के रूप में
मन-मस्तिष्क में बैठाने की कोशिशा की है। इस कविता की स्त्री का आर्थिक
तौर पर स्वावलंबी नहीं होना और विभिन्न संस्कारों का मकड़जाल अपना आशियाना
अलग बनाने से रोकता है। इन वैचारिक जकड़बंदियों का दबाव ऐसा मजबूत है कि
जहाँ तक रस्सी जाती है (यानी मंदिर की सीढ़ी, नैहर या किसी रिश्तेदार के
घर) वहीं तक भाग पाती है। फिर ससुराल में लौटकर आना इसकी ट्रैजिक नियति
है। लेकिन बार-बार, हर रात जो मुक्ति का स्वप्न देखती है उसके जरिये
रास्ता जरूर बनेगा, मुक्ति जरूर मिलेगी, जीवन जरूर बदलेगा।

इस कविता पर किंचित विस्तार के साथ विचार करने की वजह यह है कि इसमें एक आम स्त्री के
जीवन का यथार्थ है और साधरण स्त्री की मुक्ति-कामना के साथ, खतरा मोलकर
अपनी गर्दन ऐंठने तक कोशिश कर यूटोपिया रचने का साहस भी।

स्वप्न शीर्षक कविता के मार्फ़त स्त्री मुक्तिः यथार्थ और यूटोपिया पर
विचार करने की एक वजह यह है कि यह कविता जिस स्त्री के जीवन पर हो रहे
पारिवारिक अत्याचार को अपना विषय बनाती है, वह ‘स्त्रीवाद’ का सिद्धांत
पढ़कर अपनी मुक्ति-कामना से लबरेज नहीं है, बल्कि जीवन-जगत के यथार्थ से
उसमें यह मुक्ति-कामना पैदा हुई है। यहाँ यह स्पष्ट कर देना जरूरी है कि
अगर कोई स्त्री ‘स्त्रीवाद’ या स्त्री-मुक्ति से सम्बन्धित धरणाओं को
पढ़-सुन या समझकर अपनी मुक्ति की कामना करती है या इसके लिए अग्रसर होती
है तो यह अपराध नहीं बल्कि अच्छी बात है। इसी में मुक्तिकारी अवधरणाओं की
सफलता भी है।

यह उन लोगों के लिए कहा गया है जो ‘स्त्रीवाद’ और उससे जुड़ी
धरणाओं को बदनाम करने के मकसद से अनर्गल प्रलाप करते हैं और मानते हैं कि
आम औरतों का इससे कोई लेना-देना नहीं है। यह कविता पढ़कर समझा जा सकता है
कि इस औरत पर पितृसत्तात्मक ढाँचे का भी असर है। इस संरचना के दायरे में
जन्म लेने और उसकी परवरिश होने की वजह से यह स्वाभाविक भी है। काबिलेगौर
बात है – इस ढाँचे के भीतर रहते हुए उसका ‘स्वप्न’ देखना और उस स्वप्न के
लिए ‘यत्न’ करना। यही स्वप्न और यत्न उसे मुक्ति भी दिलाएगी।

11 comments:

Girish Billore Mukul said...

जिस मुक्ति की बात की जा रही है उसे स्वयं नारी
स्वीकार्य कितना कर रही है इस पर भी सतत
विमर्श अपेक्षित है ...तस्वीर यूं ही न बदलेगी !!

आर. अनुराधा said...

वह बार-बार भागती है, जबकि उसे पता है कि फिर वापस आना पड़ेगा। सारी यंत्रणाएं झेलती है लेकिन कभी अपने को खत्म करने की बात नहीं सोचती। दरअसल यही उसका जज़्बा है जो उसको और उसकी उम्मीदों को जिलाए रखता है। वह लगातार तलाश रही है कोई रास्ता जिस पर चलने के बाद उसे वापस लौटने की मजबूरी नहीं होगी।

इसी संदर्भ में लू शुन की कहानी याद आती है जिसमें लोहे की दीवारों से घिरा, बंद कमरे में बैठा इंसान सोचता है कि अगर वह बैठा रहे तो उसका उसी में मर जाना तय है, लेकिन अगर वह उन मजबूत फौलादी दीवारों को अपने, फौलाद के सामने कमजोर हाथों का ताकत से हटाने, गिराने, तोड़ने की कोशिश भी करता रहे तो उम्मीद बनी रहती है कि शायद किसी दीवार से निकलने का रास्ता बन पाए।

यही है स्त्री मुक्ति की जद्दोजहद, समूचे समाज को समझाने की कोशिश, कि यह सिर्प स्त्री की मुक्ति का एक-तरफा, आइसोलेटेड मामला नहीं है, इसी से पूरे समाज की मुक्ति की रास्ता गुजरता है।

आर. अनुराधा said...

और जहां तक मुक्ति की स्वीकार्यता की बात है, तो वह भी स्त्री के अकेले के लिए नहीं बल्कि पूरे समाज के लिए है क्योंकि सबकी साझा समझ और स्वीकृति भी जरूरी है।

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

@“यही है स्त्री मुक्ति की जद्दोजहद, समूचे समाज को समझाने की कोशिश, कि यह सिर्फ़ स्त्री की मुक्ति का एक-तरफा, आइसोलेटेड मामला नहीं है, इसी से पूरे समाज की मुक्ति का रास्ता गुजरता है”

मैं मानता हूँ कि इस समाज की सभी स्त्रियाँ इस कविता की नायिका की भाँति विडम्बना नहीं झेल रही हैं और न ही इस समाज की वृहत्तर संरचना ही सभी स्त्रियों के लिए कैदखाने जैसी है। यह ठीक है कि नारी मुक्ति का आन्दोलन तबतक चलना चाहिए जबतक सभी स्त्रियाँ एक सहज स्वातंत्र्य का अनुभव न कर लें लेकिन इस समस्या को संपूर्ण समाज पर एक बराबर विस्तारित और अभ्यारोपित कर देना हमारे अबतक के प्रयासों और सदाशयी पूर्वजों के कृतित्व को पूरी तरह से खारिज करता है।

इतने बड़े समाज में बुराई के साथ बहुत सी अच्छाइयाँ भी हैं जिन्हें याद रखना चाहिए। अनुकरण के लिए ही सही।

Ashok Kumar pandey said...

एक पितृसत्तात्मक समाज मे स्त्री का मानस भी उसी विचारधारा से संचालित होता है।

सवाल स्त्री या पुरुष के स्वीकार करने का नहीं है। एक लोकतांत्रिक समाज का सपना देखने वाले हर जागरूक नागरिक का फ़र्ज़ है कि वह सच को समझे और समझाये।

आर. अनुराधा said...

माना कि सभी स्त्रियां 'यह' विडंबना नहीं झेल रही हैं। लेकिन घटना का साम्य होना जरूरी नहीं। वह सिर्फ प्रतीकात्मक है। इस पुरुष-निर्देशित समाज में (जो सिर्फ भारत का नहीं, दुनिया भर का है, विकसित देशों का भी जहां बांग्लादेश ने 1972 और स्विटजरलैंड ने 1971 में महिलाओं को चुनाव में वोट देने का हक दिया) बहुत कम महिलाए हैं जो एक तय माइंड-फ्रेम से बाहर कुछ सोच कर करने की हिम्मत कर पाती हैं। लेकिन अच्छी बात यह है कि अब वह कम-से-कम बिना किसी पूर्वाग्रह के सोचने लगी है और कई बार उस सोच को जाहिर भी कर पाती है।

आजादी का मतलब अविवेकी होकर जो चाहे करना कतई नहीं है, लेकिन कोई पुरुष जब अपनी छत पर खड़ा होता है, तो कितनी बार उसके मन में यह विचार/डर आता है कि कोई उसे टोक न दे? लेकिन कोई महिला किसी काम से भी छत पर पहुंचती है तो घर-बाहर के कइयों के इस कहे-अनकहे सवाल का सामना उसे करना पड़ता है।

यह भी सिर्फ एक उदाहरण है। दैनिक जीवन में और किन्हीं खास मौकों पर कितनी तरह की जंजीरों की जकड़न कोई महिला अपने मन-विचार पर महसूस करती है, इसका हिसाब पाना बहुत ही मुश्किल है। चाह सिर्फ यह है कि कोई एक समय आए जब ज्यादातर महिलाएं बिना बेवजह के डर लिए जी सकें,डर के लिए जीना छोड़ कर सहज हो पाएं।

अर्कजेश said...

जब तक परिवार नाम का सुविधापूर्ण करागार रहेगा , किसी भी तरह की मुक्ति की कामना करना सिर्फ एक अच्‍छा खयाल कहा जा सकता है ।

बडी बडी प्रतिभाशाली महिलाओं को परिवार की भारी कीमत चुकानी पडती है । फिर भी वे स्‍वेच्‍छा से यह सब करती हैं । शादी करती हैं । अभिनय छोड देती हैं या उनका कैरियर दूसरे न. पर आ जाता है । क्‍यों ? क्‍या नारी एक मॉं होकर परिपूर्ण होती है वाला सिद्धांत इस पर लागू होता है । या इससे बडी वजह सामाजिक सुरक्षा की मॉंग है ।

शायद नारी अभी सिर्फ कुछ छूट लेना चाहती है । पूरी मुक्ति के लिए वह तैयार नहीं है ।

आर. अनुराधा said...

फिर वही पिटा हुआ (लेकिन उतना ही सार्थक) सिमोन द बोआ का कथन दोहराना होगा कि स्त्री बनाई जाती है। जब भी प्रतिभाशाली महिलाओं के 'स्वेच्छा से' अपनी प्रतिभा का विस्तार का प्रयास छोड़ देने की बात होती है तो यह सोच में कतई नहीं आता कि वह शुद्ध स्वेच्छा से ज्यादा अपने परिवेश, परिस्थिति और खुद में विकसित एक खास सामाजिक-पारिवारिक प्रतिबद्धता, जिम्मेदारियों आदि की रोपी गई भावना के ताने-बाने के बीच मानसिकता के कारण ऐसा करती है। इस वास्तविकता को, और ऐसी स्थितियों में फैसला लेने के पहले के उस स्त्री के द्वन्द्व को समझना होगा। यह सब सहज ही नहीं हो जाता, जैसा कि दिखाई या सुनाई पड़ता है। और फिर बड़े आराम से इसे "नारी एक मॉं होकर परिपूर्ण होती है" के भारी-भरकम आरोपित जुमले के नीचे दबा-छुपा दिया जाता है।
"शायद नारी अभी सिर्फ कुछ छूट लेना चाहती है । पूरी मुक्ति के लिए वह तैयार नहीं है ।
"- अंग्रेजों ने भारत के बारे में भी यही कहा था, और बार-बार दोहराया था कि देश आजादी, स्वशासन के लिए तैयार नहीं है। और बहुत लोग उस समय और कुछ आज भी कहते हैं कि अंग्रेजों का जमाना कहीं अच्छा था। तो क्या हमें आज तक गुलाम रहना चाहिए था कि आज भी हम अपनी आजादी की देख-भाल और अपने सपनों का शासन चलाना करना नहीं सीख पाए हैं? क्या छोटे बच्चे को जमीन पर नहीं छोड़ा जाता कि उसने अभी चलना नहीं सीखा? अरे, उसे चलने का मौका मिलेगा तभी तो वह सीखेगा। जरूर वह गिरेगा, चोट खाएगा, कभी अपनी टांगे, सिर भी तुड़वाएगा, लेकिन आखिरकार उसकी सहज प्रवृति चलने की ही है तो वह चलेगा नहीं क्या? इसी तरह एक इंसान होने भर से एक महिला की सहज प्रवृति आजादी की ही है, कोई माने या नहीं।

Asha Joglekar said...

याद रखें पितृसत्तात्मक व्यवस्था के
मायने परिवार में पुरूष का सिर्फ मुखिया होना नहीं है। यह महज इतना ही
होता तो इसका ‘खूँटा’ कब का उखड़ चुका होता या इसकी ‘रस्सी’ टूट गयी होती।
क्या यह कहने की जरूरत है कि इस ढाँचे की रचना धूर्तता और चालाकी के साथ
की गयी है और आज भी हो रही है। आर्थिक, धार्मिक, राजनीतिक, वैधानिक,
सांस्कृतिक व्यवस्था और मूल्यों-मर्यादाओं, संस्कारों, आदर्शों तथा चिंतन
के विभिन्न रूपों, विचारधाराओं, निर्मितियों, गतिविधियों के जरिये बड़े
महीन ढंग से इसे रचा-बुना गया है। इन सबके जरिये पितृसत्ता पुरूष को औरत
की तुलना में श्रेष्ठ स्थापित करने का पाखंड रचती और फैलाती है।
यही कारण है कि आर्थिक रूप से स्वतंत्र कई महिलाएं घर में ढेर सारी बंदिशों और बेडियों के बावजूद घर छोड कर अकेले रहने का साहस नही जुटा पातीं ।

ghughutibasuti said...

सोचने को विवश करता लेख।
आभार।
घुघूती बासूती

Unknown said...

लेख मे स्त्री की मुक्ति की जो कामना है वो परिस्थितिजन्य है और पूरा जोर उस्को बार बार पीटे जाने को लेकर है तो क्या उसे पीता नही जाये तो उसकी मुक्ति की कामना का अन्त हो गया. सभी को तो नही पीटा जाता क्या उनका जीवन सुखी है? स्त्री के लिये समस्या है विकल्प की जो पुरुष के लिये नही है. अगर बार बार भागने की बजाय उसने कोई हुनर सीखने पर ध्यान दिया होता जिससे वो जब भी विकल्प की तलाश करे तो भागने की बजाय वो मुक्ति की कोई सार्थक पहल कर पाती. परिवार रूपी सुविधाजनक कारगार भी एक कारण है जो स्त्री को मुक्ति की कामना से विमुख करता है.
भारतीय उपमहाद्वीप मे म्यामार ( पूर्व वर्मा ) एक ऐसा देश था जो नारी स्वातन्त्रय का झन्डा १०० साल पहले भी थामे हुए था. शरत चन्द्र के उपन्यासो मे उसकी झलक बार बार मिलती है.
चर्चा बहुत ही बढिया है. यहा प्रस्तुति के लिये आभार.
नये साल की शुभकामनाये

अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री को सिर्फ बाहर ही नहीं अपने भीतर भी लड़ना पड़ता है- अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री-विमर्श के तमाम सवालों को समेटने की कोशिश में लगे अनुप्रिया के रेखांकन इन दिनों सबसे विशिष्ट हैं। अपने कहन और असर में वे कई तरह से ...