Wednesday, February 17, 2010

नादीन को चार शौहर चाहिए

(दुबई, साउदी अरब के अल हुर्राटीवी नेटवर्क में पत्रकार नादीन अल-बेदैर ने मुसलमान पुरुषों में बहुविवाह को चुनौती दी,जिसके लिए उन पर इस्लाम विरोधी होने का आरोप लगा।)

- राजकिशोर

घटना यह है। सऊदी अरब की पत्रकार नादीन अल-बेदैर का एक लेख मिस्र के दैनिक 'अल मसरी अल यूम' के 11 दिसंबर 2010 के अंक में एक लेख छपा। लेख का शीर्षक था - 'मैं और मेरे चार शौहर'। लेख की शुरुआत यहां से होती है - 'मुझे चार, पांच या नौं या मै जितने भी चाहूं उतने शौहर चुनने की इजाजत दें। मैं तरह-तरह के साइज और शेप वाले शौहर चुनूंगी। एक काला, एक सुनहरे बालों वाला, एक लंबा और हो सकता है एक नाटा। उनका चुनाव जुदा-जुदा किस्मों, धर्मों, नस्लों और देशों से होगा। मैं वादा करती हूं कि उनके बीच पर्याप्त सौहार्द रहेगा।'

नादीन को यह तर्क मंजूर नहीं है कि औरतों के लिए एक से अधिक मर्दों को झेलना मुमकिन नहीं है। वे कहती हैं कि यह मुमकिन है, यह तो साबित हो ही चुका है उन औरतों द्वारा जो अपने शौहर से चोरी-छिपे गैर मर्द से प्यार करती हैं या उन औरतों के द्वारा जिनका प्यार पैसे से खरीदा जा सकता है। नादीन का सवाल है : 'एक औरत से बोर हो जाने के बाद दूसरी, और दूसरी से बोर हो जाने के बाद तीसरी और उससे भी बोर होने के बाद चौथी औरत से शादी करने का हक सिर्फ मर्दों को ही क्यों है? यह हक औरतों को भी होना चाहिए। आखिर औरत भी तो अपने एकमात्र शौहर से बोर हो जा सकती है। या हो सकता है, सुहागरात से ही उसका दांपत्य जीवन ठीक न चल रहा हो।' आखिर ऐसी औरतों को भी सुख-चैन से जीने का अधिकार है।

वास्तव में नादीन का यह लेख बहुगामी होने की उनकी ख्वाहिश का इश्तहार नहीं है। वे तो मुसलमान पुरुषों के चार शादियां करने के अधिकार को चुनौती देना चाहती हैं। इसीलिए उनके लेख का अंत इन पंक्तियों से होता है कि या तो मर्द-औरत दोनों को बहुगामी होने का अधिकार मिले या विवाह संस्था को नए सिरे से गढ़ा जाए। जाहिर है, यह मुस्लिम नारीवाद का एक क्रांतिकारी चेहरा है। चूंकि सऊदी अरब की इस साहसी पत्रकार ने स्त्री-पुरुष समानता की ख्वाहिश को बेहद नाटकीय ढंग से पेश किया है, इसलिए उनके लेख पर मुस्लिम जगत में हाहाकार मचा हुआ है। नादिम की कटु से कटु आलोचना की जा रही है और उन्हें फाहशा, चरित्रहीन, मर्दखोर आदि बताया जा रहा है। व्यंग्य की शैली बहुत ही प्रभावशाली होती है, लेकिन इसे अपनाने के अपने खतरे भी हैं। मैं तो सऊदी पत्रकार नादीन अल-बेदैर को बधाई ही दूंगा कि उन्होंने अपनी बात इतनी तल्खी से रखी है। इसके लिए जहां उन पर अपशब्दों की बौछार हो रही है, वहीं शुक्र यह है कि बहुत-से पुरुष उनके प्रतिपादन के मर्म तक पहुंच सके हैं, इसलिए उन्होंने लेखिका का पक्ष लिया है।

उदाहरण के लिए, काहिरा में एक मस्जिद के प्रबंधक शेख अम्र जाकी ने लिखा, 'लोगों को अब जाग जाना चाहिए और इस पर विचार करना चाहिए कि औरतों के साथ मर्दों का सलूक क्या रहता है। उन्हें इस पर भी विचार करना चाहिए कि आज के जमाने में बहुगामिता को मंजूर नहीं किया जा सकता। इसकी कोई जरूरत नहीं है। इसके अलावा, कोई भी मर्द एक से ज्यादा औरतों से सच्चा प्यार नहीं कर सकता न कोई औरत ही एक से ज्यादा मर्दों से सच्चा प्यार कर सकती है।' एलान पत्रिका की आयशा गवाद ने लिखा, 'मैं औरतों या मर्दों की बहुगामिता की तरदारी नहीं कर रही हूं। मैं मिज अल-बेदैर की ओर से भी कुछ कहना नहीं चाहती। लेकिन मुझे लगता है कि वे भी औरत या मर्द की बहुगामिता की वकालत नहीं कर रही हैं। वे तो उस गैरबराबरी को रेखांकित करना चाहती थीं जो बहुत-से बहुगामी विवाहों में मौजूद होती है।

हिन्दी में इस प्रसंग को उठाया है जेएनयू की शोध छात्र शीबा असलम फ़ाहमी ने। शीबा 'हंस' पत्रिका में हर महीने 'जेंडर जिहाद' नाम से एक अत्यंत लोकप्रिय कॉलम लिखती हैं। फरवरी अंक में इस प्रसंग की चर्चा करते हुए उन्होंने फ़रीद बुक डीपो, जामा मस्जिद, दिल्ली द्वारा प्रकाशित हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब थानवी रह की पुस्तक 'अहकामे इस्लाम की नज़र में तालीफ़' से एक लंबा उद्धरण दिया है, जिससे इस बात का संकेत मिलता है कि मुस्लिम मर्दों को चार शादी करने का हक क्यों है या क्यों होना चाहिए, इसकी तरफदारी में कैसे-कैसे बेहूदा तर्क दिए जा सकते हैं।


मौलाना का तर्क यह है : 'तफसील इस इजमाल की ये है कि ऐसा आदमी जब किसी एक औरत को निकाह में लाएगा तो कम अज कम ये औरत उसके लिए तीम माह तक काफी है। क्योंकि हमल की शनाख्त कम अज कम तीन माह तक मुकर्रर है। पर अगर उस मीयाद में उस औरत को हमल ठहर जाए तो ऐसे हैजान व जोशे शहवत वाला आदमी अगर उस औरत से सुहबत करेगा तो जनीन पर बुरा असर पड़ेगा और हमल गिर जाने का अंदेशा है। लिहाजा उस औरत को आराम देवे और उस औरत की सुहबत तर्क करके दूसरी औरत निकाह में लाएगा। अगर दूसरी औरत को भी तीन माह तक करारे हमल हो जाए तो उससे भी सुहबत तर्क करनी पड़ेगी। … ये 6 माह हुए। अब तीसरी औरत से निकाह करेगा। अगर तीसरी औरत को भी हमल हो गया तो अब उससे भी उसको सुहबत तर्क करनी पड़ेगी। ये 9 माह हुए। अब पहली औरत का वजए-हमल हो जाएगा मगर वह गालिबन तीन माह तक काबिले-सुहबत नहीं हो सकती। लिहाजा उसको चौथी निकाह में लानी होगी। अब चौथी औरत के हमल की शनाख्त भी तीन माह तक मुकर्रर है। यह एक साल हुआ और इस अस्ना में पहली औरत जिसको वजए-हमल से तीन माह गुजर चुके हैं तअल्लुकात जनान व शोई के लिए तैयार हो जाएगी। इस तरह वजए-हमल के बाद हर एक औरत नौबत-बनौबत उसके लिए मुहैया होगी।'

है न कमाल का गणित ! इस गणित को चुनौती देने के लिए सऊदी अरब की नादीन अल-बेदैर और भारत की शीबा असलम फ़ाहमी को मेरा सलाम।

22 comments:

Rangnath Singh said...

हंगामा है क्यों बरपा.....जाहिर है नादीन का साहस अनुकरणीय है।

और जहां तक शीबा असलम की बात है, उनके लेख लोग काफी पसंद कर रहे हैं।

Randhir Singh Suman said...

nice

Randhir Singh Suman said...

nice

Randhir Singh Suman said...

nice

Randhir Singh Suman said...

nice

ab inconvenienti said...

तफसील इस इजमाल की ये है कि ऐसा आदमी जब किसी एक औरत को निकाह में लाएगा तो कम अज कम ये औरत उसके लिए तीम माह तक काफी है। क्योंकि हमल की शनाख्त कम अज कम तीन माह तक मुकर्रर है। पर अगर उस मीयाद में उस औरत को हमल ठहर जाए तो ऐसे हैजान व जोशे शहवत वाला आदमी अगर उस औरत से सुहबत करेगा तो जनीन पर बुरा असर पड़ेगा और हमल गिर जाने का अंदेशा है। लिहाजा उस औरत को आराम देवे और उस औरत की सुहबत तर्क करके दूसरी औरत निकाह में लाएगा। अगर दूसरी औरत को भी तीन माह तक करारे हमल हो जाए तो उससे भी सुहबत तर्क करनी पड़ेगी। … ये 6 माह हुए। अब तीसरी औरत से निकाह करेगा। अगर तीसरी औरत को भी हमल हो गया तो अब उससे भी उसको सुहबत तर्क करनी पड़ेगी। ये 9 माह हुए। अब पहली औरत का वजए-हमल हो जाएगा मगर वह गालिबन तीन माह तक काबिले-सुहबत नहीं हो सकती। लिहाजा उसको चौथी निकाह में लानी होगी। अब चौथी औरत के हमल की शनाख्त भी तीन माह तक मुकर्रर है। यह एक साल हुआ और इस अस्ना में पहली औरत जिसको वजए-हमल से तीन माह गुजर चुके हैं तअल्लुकात जनान व शोई के लिए तैयार हो जाएगी। इस तरह वजए-हमल के बाद हर एक औरत नौबत-बनौबत उसके लिए मुहैया होगी।

PREPOSTEROUS.

Akanksha Yadav said...

जब भी रुढियों के विरुद्ध आवाज़ उठती है, तो हंगामा होता है..पर इसी से चीजें बदलती भी हैं..जज्बे को सलाम.

डॉ .अनुराग said...

शीबा जी को पर्सनली इस पर बधाई दे चूका हूं...
सारी रस्मे सारी कवायदे औरत के जिम्मे.....बचपन से कंडीशन किया दिमाग....मजहब ओर मोरालिटी का घाल मेल .अपनी सहूलियत के मुताबिक उठाया गया धरम की किसी किताब का पन्ना .... मजहब कोई भी हो ...शर्ते .रस्मे ....सबकी शकले जुदा है पर मकसद एक ही है.......

Akhilesh pal blog said...

kisi ne sach kaha hai kee porason kee irasya ne vivah namamak sansta ko janm diya hai striyo ke irsya ise khatam karegee sahas achha hai

Anonymous said...

शीबा जी जिस तरह विसंगतियों को उघारती है ,वाकई काबिले तारीफ है ! शीघ्र ही नादीन की बातो से अन्य युवतियां भी सहमत होती जाएँगी ! क्योंकि आधी आबादी को कितना बेवकूफ बनाया जायेगा और कब तक !
राजकिशोर जी !हम आपके आभारी हैं !

shikha varshney said...

कब तक सूखी लकड़ी पड़ी रहेगी बंद दीवारों में,
कभी तो आग भड़केगी बस चिंगारी लगना बाकी है

شہروز said...

जब भी रुढियों के विरुद्ध आवाज़ उठती है, तो हंगामा होता है..

अन्तर सोहिल said...

क्रांतिकारी नादीन अल-बेदैर और शीबा असलम फ़ाहमी को मेरा भी सलाम
सचमुच अब जागना ही पडेगा लोगों को

प्रणाम

Sheeba Aslam Fehmi said...

आप सबका शुक्रिया. अगले लेखों में कुछ और तल्ख़ सवाल-जवाब होंगे, देखते जाइये और यूँही हौसला बढ़ाते जाइये :)

Ashok Kumar pandey said...

शीबा जी को बधाई
पर मैं सोच रहा था अगर इसी भाषा में कोई महिला हिन्दू धर्म की कुरीतियों पर लिखती तो क्या इतनी बधाईयां आतीं?

Dr. Zakir Ali Rajnish said...

आपको यह सूचित करते हुए हर्ष की अनुभूति हो रही है कि संवाद समूह द्वारा आयोजित 'संवाद सम्मान 2009' के नारी चेतना सम्मान'' हेतु 'चोखेर बाली' ब्लॉग का चयन किया गया है। इस सम्मान के अन्तर्गत एक 'सम्मान पत्र' एवं 'ई-सम्मान पत्र' का प्राविधान है। चूंकि आपके ब्लॉग का ईमेल आईडी उपलब्ध नहीं हो सका है, इसलिए कमेंट के द्वारा यह सूचना आपको प्रेषित की जा रही है। इस ब्लॉग के मॉडरेटर से आग्रह है कि कृपया आप मेरे मेल आईडी zakirlko@gmail.com पर सम्पर्क करने का कष्ट करें, जिससे अग्रेतर कार्यवाही सम्पन्न की जा सके।

कविता रावत said...

Rudhivaadi mansikta se bahar nikalne ki jang ladhna vastav mein ek karantikari kadam hai. jiska samarthan karne ke liye sabko aage aana chahiye.
Bahut badhia....

Sachin Agarwal said...

मुस्लिम समाज का आधुनिकता से परिचय कराने के लिए हमें अभी बहुत से और ऐसे प्रगतिशील और आन्दोल कारी लेखक चाहीये | ये तो और भी अच्चा है की परिवर्तन की मांग उनके भीतर से ही उठ रही है | वैसे, हिन्दू समाज में भी औरतों के प्रति कम रुढिवादिता नहीं है ! उसे भी उजागर करने की जरुरत है |

कडुवासच said...

.... रोचक प्रस्तुति !!!

आर. अनुराधा said...

जहां जड़ता ज्यादा हो,वहां बदलाव लाना ज्यादा कठिन और ज्यादा महत्वपूर्ण है। शीबा और नादीन दोनों का लेखन सोतों को जगाने का काम कर रहा है। ऐसी कोशिशें जारी रहें।

वैसे हिंदुस्तान में औरतों की गैर-बराबरी के मामले में हिंदू-मुसलमान का अंतर बहुत ज्यादा नहीं है। पर सउदी अरब में स्त्री-पुरुष समानता की भारी कमी है।

vishnu-luvingheart said...

bahut khoob udaharan pesh kiya hai nadin ne, vakai pith thapthapane ke layak.

Pratibha Katiyar said...

बधाई नादीन और शीबा. सचमुच इसी हिम्मत की जरूरत है. हम सबको, हर मोर्चे पर.

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