Wednesday, February 24, 2010

दर्द का महिमामण्डन खतरनाक है !

एक वक़्त था जब अमिताभ बच्चन की फिल्म 'मर्द' का यह डायलॉग बहुत मशहूर हुआ था- जो मर्द होता है, उसे दर्द नही होता ।मैने यह फिल्म नही देखी पर अन्दाज़ा लगा सकती हूँ कि मर्द होने के क्या प्रतिमान इस फिल्म ने कायम किए होंगे।दर्द स्त्रैण है या पुरुष यह क्लासिफिकेशन करना ही मुझे अन्याय जान पड़ता है क्योंकि मनुष्य होने के नाते दर्द महसूस करना एक सामान्य बात है।किसी भी शारीरिक समस्या का यह ऐसा लक्षण है जो स्त्री या पुरुष देख कर नही उपजता है।साथ ही , स्त्री के बनाए जाने की प्रक्रिया मे जैसे उसे कुछ स्त्रियोचित (?) बातें सिखाई जाती हैं ठीक वैसे ही दर्द सहने की शक्ति के अभिमान के साथ पुरुष को भी ढाला जाता है।इस मिथ्याभिमान के चलते न जाने लड़के क्या क्या कर गुज़रते हैं !सिर्फ इसलिए कि इससे वे अपने पुरुषत्व का प्रमाण दे पाएंगे।यह 'दर्द नही होता' दर अस्ल दर्द को सहजाने की क्षमता ही है।न कि यह कि सच मे ही दर्द नही होता।

समाज-मन के भीतर अब भी मर्द को दर्द नही होता -वाला प्रतिमान बसा हुआ है इससे पूरी तरह इनकार नही किया जा सकता हालाँकि अन्दरखाने परिवार की बड़ी महिलाएँ अब भी मानसिक-शारीरिक दर्द के लिए सहनशीलता के पाठ स्त्री को ही पढाती हैं।इसे दोगलापन ही कहा जा सकता है।लेकिन कम से कम शहर में काफी हद तक तथाकथित स्त्रैण गुण पुरुष के लिए परहेज़ की वजह नही रह गए हैं।विज्ञापन और फिल्मों ने भी काफी हद तक अपनी भूमिका इसमे निभाई है। रोते हुए ,और कमर दर्द से हलकान पुरुष टीवी और सिनेमा स्क्रीन पर देख कर अब हैरानी नही होती।

वहीं दूसरी ओर,दर्द की बात स्त्री के सन्दर्भ मे उठे तो मुझे अपने आस पास देख कर हमेशा यही लगा कि स्त्री में दर्द को सह जाने,या कहें पी जाने की अद्भुत क्षमता है।सर मे दर्द,बुखार मे बच्चों व पति के लिए खाना बनाती स्त्री किसने अपनेघर मे नही देखी होगी।दिन भर रसोई मे खड़ी व्यंजन बनाती ,मुँह से उफ्फ न करती ,एक से दूसरे पाँव पर अदल-बदल कर खड़ी ,थक कर चूर रात को शांत पड़ी स्त्री किसने नही देखी अपने परिवार में ,और जन्म का दर्द सहती स्त्री,प्रणय के सुख मे भी दर्द से अपनी खुशी का आगाज़ करती स्त्री क्या नई है ? मैने अक्सर देखा है जिस हालत मे आकर पति ,पिता बिस्तर पर लेट जाते हैं ठीक उसी हालत में पत्नी या माँ घरेलू ,दैनिक काम निबटा रही होती है ।यह भी सही है कि कुछ स्थितियों मे स्त्री केहीपास यह स्वतंत्रता है कि वह बाहर की दुनिया की चुनौतियों से खुद को बचा भी ले और दर्द की परछाईं भी उस पर् न पड़े। वहाँ भी अन्य पेंच अवश्य होंगे। खैर, वर्ग विशेष की बात की जाए तो स्त्री का जीवन उससे कहीं कठिन है जिस कठिनाई में उपरोक्त सम्वाद किसी पुरुष के मुँह से निकलता है।पहाड़ की स्त्री ,कन्स्ट्रक्शन साइट पर एक बच्चा गर्भ मे और एक नवजात को फुटपाथ पर लिटा काम करती स्त्री ,रेगिस्तान मे पानी ढोकर लाती स्त्री किसने नही देखी, पिटती हुई और पिट कर चुप्प लगा जाने वाली स्त्री किसने नही देखी !!
ऐसे में यदि मै कहूँ कि स्त्री को दर्द नही होता तो इसमे कतई अतिशयोक्ति नही मानी जानी चाहिए।देखने वाली बात है कि हम जब कहते हैं (यही कि- मर्द को दर्द नही होता) वह कितनी समझदारी से कहते हैं कि उसमें से स्त्री के दर्द और सहनशीलता को साफ छिपा ले जाते हैं।भनक भी नही लगने देते।स्त्री का दर्द सिर्फ सखियों के एकांत पलों में आवाज़ पाता है या माँ की चुप्पी से बेटी की आँखों में धीरे से उतर जाता है।

साथ ही यह भी समझ लेना होगा कि इस "दर्द" का महिमामंडन स्त्री और पुरुष दोनो के ही लिए खतरनाक है।यह पुनर्बलीकरण है एक गलत व्यवहार का ।जब भी दर्द को सह जाने की सीमा समाज हमारे जेंडर रोल के हिसाब से तय करेगा ,तभी हमारे बच्चे-बच्चियाँ एक गलत प्रतिमान को ध्यान में रखकर अपना व्यक्तित्व निर्माण करेंगे।इसलिए उचित ही होगा कि सहनशीलता और दर्द के बँटवारे जेंडर के आधार पर कर उसे सम्मानित न किया जाए।

10 comments:

Anonymous said...

उत्तर प्रदेश मे प्रसव के समय अगर कोई स्त्री रोती हैं तो उसको मना किया जाता हैं । उस से कहा जाता हैं प्रसव के दर्द मे रोना अशुभ हैं और आवाज नहीं निकालनी चाहिये कारण "वर्ना बेटी होगी " अब दर्द / रोने से बेटी होने का क्या सम्बन्ध हैं ?? क्या "बेटी होने का भय " मात्र ही आंसूं रोक सकता हैं !!!! जैसे शेर आया कहा जाता हैं । और दर्द को सहने कि परिभाषा मे ना जाने कितनी जिंदगियां तबाह हो जाती हैं

दिनेशराय द्विवेदी said...

स्त्री में दर्द सहने की अपार क्षमता है, पुरुषों से कई गुना अधिक। यदि ऐसा न होता तो प्रकृति उसे प्रसव पीड़ा का जिम्मा न सौंपती।

डॉ .अनुराग said...

बकोल सुधा अरोड़ा "स्त्री के शरीर में एक इन बिल्ट सरवाईवल सिस्टम फिट होता है जो उसे अनेको पीडाए झेलने की क्षमता देता है......

..यूँ भी उसके कई "दर्द " कई सो काल्ड बुद्दिजीवियो की नज़र में दर्द की डेफिनेशन में नहीं आते ......शायद तभी कोई "साधारण औरत" असाधारण परिस्तिथियों में "असाधरण" हो जाती है ओर कोई असाधारण व्यक्तित्व सामजिक दबावों में बुझ जाता है .....खैर विषय से नहीं भटकता ....महिमामंडन वाली बातसे सहमत हूँ.....

ab inconvenienti said...

पीड़ा, संवेदनशीलता, आंसुओं और दुःख का सार्वजानिक प्रदर्शन पुरुष के लिए टैबू हैं. दरअसल दर्द और आंसू को लेकर यह टैबू उत्क्रन्तिक मनोविज्ञान का क्षेत्र है, यह तब से चला आ रहा है जब मनुष्य नियेंडरथल युग में था. इसकी जड़ें लाखों साल पहले प्रागैतिहासिक काल में हैं, जब मानव कंदराओं में रहा करता था. तब भी नर और मादा के रोल बँटे हुए थे, पुरुष पर परिवार की सुरक्षा, शिकार और अन्य संसाधन जुटाने की ज़िम्मेदारी थी. वहीँ महिलाओं के जिम्मे बच्चे सँभालने, फल/जडियाँ चुनने, व्यवस्था बनाने, समूह में समरसता कायम रखने और अन्य सामाजिक काम थे बिलकुल आज की तरह.

उस काल में जीवन कहीं अधिक असुरक्षित था. कभी कुछ ऐसी परिस्थिति आ जाए जिसमे अनिश्चित काल के लिए भोजन मिलने की संभावना न रहे, या दुसरे काबिले के आक्रमण की वजह से प्राणों का भय, समूह के कुछ सदस्यों की अचानक मौत, महामारी, आपदा, बड़ी संख्या में हिंस्र पशुओं का आक्रमण, ज्वालामुखी/भूकंप/बाढ़/अतिवर्षा/सूखा/दावानल/चक्रवात वगैरह ---- इन स्थितियों में पुरुष भी सुरक्षा देने से लाचार हो जाता था, जिसकी उसपर जिम्मेदारी थी.

पर समूह की महिलाओं और बच्चों का मनोबल कायम रखने के लिए यह ज़रूरी था की पुरुष अपनी असहायता और पीड़ा को प्रगट न करे. यहीं से इस टैबू की शुरुआत हुई. उदहारण के लिए आधुनिक काल में इसके फलन को ऐसे देखें, की आज सेना पर बड़े समूहों (राष्ट्र) की सुरक्षा और बचाव की ज़िम्मेदारी होती है, अगर असहायता की स्थिति में सैनिक अपनी भावनाओं का प्रदर्शन करने लगें तो सारा समूह हार मान जायेगा. समूह के मनोबल के लिए यह आवश्यक है की सैनिक अपने दर्द और पीड़ा को दबाए रखें, और हँसते हँसते मर जाएँ. सेना में आज भी अपने संवेगों, कोमल भावनाओं, आंसुओं और पीड़ा का प्रदर्शन सबसे बड़ा टैबू है. यह टैबू घोषित अघोषित रूप से हर उस संगठन में लागू है जो पुरुष प्रधान हैं.

भावनाओं की अभिव्यक्ति पर यह रोक लाखों सालों तक चलती रही, और मानव संस्कृति, मानसिकता यहाँ तक की दिमागी संरचना में भी घर कर गई. इसीलिए आज हम देखते हैं की परिवार पर कोई संकट आता है तो स्त्रियाँ स्वाभाविक रूप से रो पड़ती हैं, पर पुरुष अपनी भावनाएं दबाए रखता है. बच्चों की मौत, जीवनसाथी की मौत या माता पिता की मौत पर स्त्रियों के रोने पर कोई रोक नहीं है, पर आज भी पुरुष से उम्मीद की जाती है की ऐसे समय में भी वह अपनी पीड़ा दबाए रखे और महिलाओं और बच्चों को सहारा दे. पुरुषों द्वारा पीड़ा प्रदर्शन को न तो स्त्रियाँ सही मानती हैं न खुद पुरुष.

Neeraj Rohilla said...

मर्द को दर्द हो या न हो, ठण्ड जरूर लगती है....
सुबह ४:३० बजे ५ डिग्री तापमान में मित्रों ke साथ दौड़ने जाने पर अगर कोई हमारी हालत पर कमेन्ट करता है तो हमारा यही जवाब होता है..;-)
गंभीर विषय पर विशुद्ध सतही टिप्पणी कर रहे है, सो पहले से हाथ जोड़ लेते हैं,

Rashmi Swaroop said...

शब्दशः सहमत हूं…
परन्तु 'ab inconvenienti' सर की टिप्प्णी के बारे में लगता है जैसे वे विषय से भटक गये हैं, "दर्द" और "भावनांए" दोनों अलग अलग शब्द हैं जिनके अर्थ भी सर्वथा भिन्न हैं… ये सही है कि स्त्रियां भावनायें जल्दी ही अभिव्यक्त कर देती हैं परन्तु उतनी ही सफ़लता पूर्वक दर्द को छिपा भी लेतीं हैं…

Asha Joglekar said...

स्त्री में तो दर्द सहने की चाहे वह शारिरिक हो या मानसिक अभूतपूर्व क्षमता होती है ।

dr amit jain said...

दर्द का ये चित्रण पहली बार हमने देखा है , बढिया है,पर स्त्री की वाह वाह के अलावा कोई एस्सा गुण भी आप को दिखाई देता है जो उस में हो तो सम्पूर्ण परिवार व्यथित हो जाता है , कभी उस पर भी लिखना

Unknown said...

सुजाता जी लगता है फ़िल्म के सम्वाद से आपको ऐसा लगा कि यही लोग सोचते है. सही बात ये ही है कि दर्द सहने की ताकत स्त्री मे पुरुष से बहुत ज्यादा होती है. हा अपवाद भी होते है पर वो हमेशा नियम की पुष्ति करते है.

ab inconvenienti said...

लगता है मेरी बात समझ में नहीं आई. दर्द मर्दों को भी होता है, हम भी पीड़ा महसूस करते हैं. पुरुषों को शारीरिक दर्द भी होता है, और भावनात्मक दर्द भी, अंतर इतना है की सही मौकों पर औरतों द्वारा इसे अभिव्यक्त कर देना गलत नहीं माना जाता. पर मर्द को हर स्थिति में पीड़ा छिपा लेने के लिए कंडीशन किया जाता है.

पर पीड़ा अभिव्यक्त करना पुरुषों के लिए सही नहीं माना जाता. 'मर्द को दर्द नहीं' जैसे मुहावरे परुषों को अपनी पीड़ा अभिव्यक्त करने से बचने की हिदायत देते हैं, अपना दर्द छिपा लेने और चुपचाप सह लेने के लिए प्रेरित करते हैं. यह मुहावरा कहता है की तुम अब अब्च्चे नहीं रहे मर्द बन चुके हो, यह कराहना और अपने दर्द सभी को बताते फिरना बंद करो, जिंदगी को चुपचाप सहो. महिलाऐं सहनशीलता के लिए ज़िम्मेदारी के ज़रिये कंडीशन होती हैं, पुरुष अहम् के ज़रिये. पर समाज में जीना है तो चुपचाप सहना तो पड़ेगा ही.

मेरा तो यह सोचना है की महिलाओं के लिए भी पीड़ा अभिव्यक्त करना, शिकायती रवैया रखना, सिसकना या रोना टैबू बना देना चाहिए. उन्हें भी मर्दों जितना कठोर और वस्तुनिष्ठ होने के लिए शुरू से कंडीशन किया जाना चाहिए.

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