Monday, March 1, 2010

लिपस्टिक की औकात

राजकिशोर

बीसवीं शताब्दी की एक बड़ी खूबी यह थी कि उसने सबको उसकी औकात बता दी। और तो और, महाबली पूंजीवाद को भी नहीं छोड़ा। देखते-देखते दुनिया का एक हिस्सा लाल हो उठा। इस हिस्से में पूंजी थी, पर पूंजीपति नहीं था। तानाशाही को भी उसकी औकात बताई गई। हिटलर की मूंछ उसकी लाश के साथ जमीन पर आ गिरी। भारत में अंग्रेजों को उनकी औकात बताई गई, हालांकि इसमें सौ से ज्यादा साल लग गए। प्रेमचंद जब 'गोदान' लिख रहे थे, तब जमींदार अमर जान पड़ते थे। आजाद भारत ने जमींदारों की औकात भी खोल कर रख दी। इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी लगा कर भारत के लोकतंत्र को उसकी औकात बताई, तो इमरजेंसी हटने के बाद होनेवाले आम चुनाव में जनता ने इंदिरा गांधी को उनकी औकात बता दी।

बीसवीं शताब्दी औरतों के लिए भी बहुत मेहरबान रही। उसने औरतों को बहुत मौका दिया कि वे मर्दों को उनकी औकात बता दें। इतिहास में पहली बार इतनी बड़ी तादाद में औरतों ने तलाक लिया, अपना अलग घर बसाया और स्वतंत्र हो कर रहने लगीं। अपनी मर्जी के मुताबिक पहनने-ओढ़ने लगीं। अपने मिजाज के अनुसार जीने लगीं। अपने समय से सोने और उठने लगीं। मर्द बोहेमियन बने, तो औरतों ने भी यह आजाद जिंदगी अपना ली। कुछ औरतों ने मर्दों की इच्छा और जरूरत के मुताबिक सजने-संवरने से भी इनकार कर दिया। यहां तक कि ब्रा को भी उसकी औकात बताने की कोशिश की गई।

इक्कीसवीं सदी की जीवन शैली पर इन सब की छाया दिखाई पड़ती है। अगर कनॉट प्लेस में कोई जवान औरत आधे-अधूरे कपड़े पहन कर घूमती नजर आए, तो उसे न घूर-घूर कर देखने की जरूरत है न कोसने की। उस औरत के पास इतना वक्त नहीं है कि वह दिल्ली के मर्दों को उनकी औकात बताने की कोशिश करे। दरअसल, ऐसा करके वह नए समाज में अपनी औकात घोषित कर रही है -- जान-बूझ कर नहीं, बल्कि अवचेतन स्तर पर। दूसरे भी हैं और उनके सोच के अपने दायरे हैं, यह खयाल तक उसके दिमाग में नहीं था जब वह बाहर निकलने के लिए अपने फ्लैट के दरवाजे पर ताला लगा रही थी। वह पूरी तरह सहज है। उसकी वजह से कोई पुरुष असहज हो उठता है, तो यह उसकी समस्या है।

करनेवाले हजारों होते हैं, तो लिख कर बतानेवाले सैकड़े में पांच भी नहीं। इन पांच में दो-तीन तो ऐसे होते हैं जिन्हें मिर्ची लगाए बिना न तो जबान खोलना आता है न कलम उठाना। जब औरतें ऐसा करती हैं, तो मर्दों को नारीवाद को बदनाम करने का मौका मिल जाता है। लेकिन एक-दो ऐसी भी होती हैं जो अपनी बात बहुत सहज भाव से कहती हैं। उनका उद्देश्य किसी को चुनौती देना नहीं, बल्कि अपनी स्वतंत्र चेतना को अपनी जीवन शैली के माध्यम से अभिव्यक्त करना है। वे किसी को चोट पहुंचाना नहीं चाहतीं, पर इतनी ही उत्कटता से यह भी चाहती हैं कि उन्हें भी कोई चोट न पहुंचाए। मैं जानना चाहता हूं कि अगर इसे लोकतंत्र नहीं कहेंगे, तो और किसे कहेंगे?

इलाहाबाद में पैदा हुई और बरास्ता मुंबई आजकल भोपाल में डेरा डाले मनीषा पांडे ऐसी ही एक युवा नाजनीन हैं। वे दैनिक भास्कर में फीचर संपादक हैं। 'बेदखल की डायरी' नाम से ब्लॉग भी लिखती हैं। हाल ही में उन्होंने अपने ब्लॉग पर 'मेरी जिंदगी में किताबें' पर लिखते हुए बताया : 'ऐसा नहीं कि मैं लिपस्टिक नहीं लगाती या सजती नहीं। फुरसत में होती हूं तो मेहनत से संवरती हूं। लेकिन अगर काफ्का को पढ़ने लगूं तो लिपस्टिक लगाने का होश नहीं रहता। हॉस्टल के दिनों में नाइट सूट पहने-पहने ही क्लास करने चली जाती थी और आज भी अगर मैं कोई इंटरेस्टिंग किताब पढ़ रही हूं तो ऑफिस के समय से पांच मिनट पहले किताब छोड़ जो भी मुड़ा-कुचड़ा सामने दिखे, पहन कर चली जाती हूं। होश नहीं रहता कि बालों में ठीक से कंघी है या नहीं। यूं नहीं कि मैं चाहती नहीं कि लिपस्टिक-काजल लगा लूं, पर इजाबेला एलेंदे के आगे लिपस्टिक जाए तेल लेने। लिपस्टिक बुरी नहीं है, लेकिन उसे उसकी औकात बताना जरूरी है। मैं सजूं, सुंदर भी दिखूं, पर इस सजावट के भूत को अपनी खोपड़ी पर सवार न होने दूं। सज ली तो वाह-वाह, नहीं सजी तो भी वाह-वाह।'

ऐसी भी औरतें होंगी जो ठीक से सजे-संवरे बिना परचून की दुकान तक भी नहीं जा सकतीं। कहने की जरूरत नहीं कि वे दूसरों के द्वारा देखे जाने से कम अपने को नहीं निहारती रहतीं। ऐसी औरतों ने अपनी एक आत्मछवि बना रखी होती है, जिससे विचलित होना उनके लिए जीवन-मरण का प्रश्न बन जाता है। इन्होंने अपनी एक औकात बना रखी है और उसकी कीमत एक छदाम भी गिरे, यह उन्हें गवारा नहीं। दुर्भाग्य से, यह आत्मछवि देह के दायरे से बाहर जाने के लिए राजी नहीं होती। औरतें अकसर पुरुषों से पूछती रहती हैं, क्या हम मात्र देह हैं? लेकिन जरूरत से ज्यादा शृंगार करते हुए वे अपने आपसे यह सवाल पूछना भूल जाती हैं। बहुत पहले एक बार मेरे मन में आया था कि सुंदर होना या सुंदर दिखना स्त्री के लिए पासपोर्ट है, वीसा नहीं। वीसा तो वे बौद्धिक और चारित्रिक गुण हैं जो किसी को बेहतर इनसान बनाते हैं। ये गुण पुरुष में अपेक्षित हैं और स्त्री में भी। जेंडर से परे कोई तो कॉमन आदमीयत होगी, जहां स्त्री-पुरुष की नागरिकता एक जैसी होती है।

मनीषा का उपर्युक्त बयान स्त्री नागरिकता से उनका इस्तीफा नहीं है। न उसकी अवमानना है। यह बयान स्त्री नागरिकता और मानव नागरिकता दोनों को स्वीकार करना है और यह बताना है कि किसका स्थान ऊपर है। लिपस्टिक को उसकी औकात बता कर ही यह प्रमेय सिद्ध किया जा सकता था

16 comments:

Ashutosh said...

होली की हार्दिक शुभकामनाएँ.
हिन्दीकुंज

ab inconvenienti said...

अपनी वेशभूषा और ग्रूमिंग पर ध्यान न देने वाले या शैबी ड्रेस सेन्स वाले पुरुषों की तरफ महिलाऐं आकर्षित नहीं होतीं. कुछ यही फंडा आदमियों का भी है. शैबी लोग आकर्षक नहीं माने जाते और उन्हें मनचाहा पार्टनर मिलना भी उतना ही कठिन होता है. प्रभावशाली छवि और आकर्षण की पहली शर्त सुरुचिपूर्ण व्यक्तित्व है. यह जेंडर की बात नहीं बल्कि मानव स्वाभाव है की वह छोटी छोटी बातों से दूसरों के बारे में राय बना लेता है. जैसे क्या ऐसे आदमी को ज़िम्मेदार छवि का माना जाएगा जो शेव करना भूल जाता हो या बिना प्रेस किये कपडे पहनता हो? या कितने पिता ऐसे लड़के को अपनी बेटी के लिए वर चुनेंगे जो देखने में ही ढीला ढाला लगता हो? कितनी लड़कियां ऐसे लड़के की तरफ आकर्षित होंगी जिसके तोंद निकली हो और वह अक्सर बिना हजामत पैजामे-स्लीपर में घूमता मिल जाता हो? कॉमन सेन्स की बात है.

Randhir Singh Suman said...

nice

Randhir Singh Suman said...

nice

वर्षा said...

कई बार लिपस्टिक काजल न लगाने से आप समूह से बाहर भी खदेड़ दिये जाते हैं। औकात बतानेवाली बात सचमुच जबरदस्त है।

mukti said...

आपकी बात से बिल्कुल सहमत हूँ. ख़ासकर इस लाइन से "वीसा तो वे बौद्धिक और चारित्रिक गुण हैं जो किसी को बेहतर इनसान बनाते हैं। ये गुण पुरुष में अपेक्षित हैं और स्त्री में भी। जेंडर से परे कोई तो कॉमन आदमीयत होगी, जहां स्त्री-पुरुष की नागरिकता एक जैसी होती है।" पर लिपिस्टिक को औकात बताने के लिये जो उच्च स्तर की चारित्रिक और बौद्धिक क्षमता चाहिये है, वो अब भी अधिकांश औरतों में नहीं है. औरतें उस छवि से अब भी बाहर नहीं निकल पाई हैं, जो पितृसत्तात्मक मानसिकता ने उनके लिये बना रखी है. लिपिस्टिक को धता वही औरत बता सकती है, जो काफ़्का और इजाबेले इलेंदे को पढ़ती हो. ये तय करने के लिये भी औरत को एक लंबा रास्ता तय करना है कि उसे लिपिस्टिक चाहिये या किताबें.

स्वप्नदर्शी said...
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स्वप्नदर्शी said...
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डॉ .अनुराग said...

जावेद अख्तर का एक शेर पूरा तो याद नहीं आ रहा कुछ कुछ यूँ था ..खुश शक्ल है वो ज़हीन भी है....यानि ......गर लिपस्टिक को एक तरफ रख दे ....तो अपने आप को अच्छी तरह से केरी करना एक पर्सनल चोयेस है ओर पर्सनेलटी का हिस्सा भी .शबाना आज़मी ,नंदिता दास ,वीर संघवी ....ऐसो अनेको उदारहण है ...आख़िरकार बुद्धिजीवी भी अच्छा दिख सकता है .ओर इसमें बुराई नहीं है ..कुछ लोगो को कपड़ो का शौंक होता है ....कुछ लोगो को गेजेट का .ओर कुछ लोगो को किताबो ओर कपड़ो दोनों का हो सकता है ...
ओर आखिर में ये बात तो
"वे बौद्धिक और चारित्रिक गुण हैं जो किसी को बेहतर इनसान बनाते हैं। ये गुण पुरुष में अपेक्षित हैं और स्त्री में भी। जेंडर से परे कोई तो कॉमन आदमीयत होगी, जहां स्त्री-पुरुष की नागरिकता एक जैसी होती है।"
खरी है ही......

Rangnath Singh said...
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Rangnath Singh said...

आधे-अधूरे कपड़े ? युवा नाजनीन ?

लेख का सेकेण्ड लास्ट पैरा ??

सूट-टाई धारी अंग्रेजी के एक प्रोफेसर क्लास में प्रवचन देने आए। प्रवचन देने के दौरान बोले खूबसूरत औरत कभी वफादार नहीं होती। कई लड़कों को यह वाक्य उपनिषदिक सूक्ति के समान लगी।

बाद में एक कम-बौद्धिक छात्र ने बहुत ही भोले अंदाज से पूछा; सर, खूबसूरत पुरुष ?

Asha Joglekar said...

लिपस्टिक को उसकी औकात बताने की बात अच्छी लगी । अपने आप को चुस्त दुरुस्त रखने में तो कोई बुराई मैं नही देखती । गंदे मुचडे कपडे में कोई भी हो स्त्री या पुरुष वह अच्छा नही लगेगा । प्रेझेन्टेबल लगना किसी भी प्रोफेशन की जरूरत है । बौध्दिक और चारित्रिक गुण सुंदरता से कहीं बढकर हैं पर साफ सुथरा और अच्छा लगना भी उतना ही आवश्यक है ।

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

राजकिशोर जी आपको बहुत पढ़ा है और हर बार पढना अच्छा लगता है पर इस बार आप क्या कहना और बताना चाहते थे समझ नहीं सके. हो सकता है कि हम मूढ़ बुद्धि के, आपकी गूढ़ बात समझ नहीं सके.
जहाँ तक पहनावे की बात है तो इसमें सलीका होना चाहिए................

जय हिन्द, जय बुन्देलखण्ड

प्रज्ञा पांडेय said...

मनीषा ने लिपस्टिक को औकात बता दी यह बात मजेदार है. औरत आकर्षण पैदा करने के लिए थोड़े ही पैदा हुई है . .उसके अपने निजी काम और रुचियाँ भी हैं जिनको वह खुद अपनी ही असुरक्षा की भावना के वशीभूत होकर मार देती हैं और सतही ताकत पर निर्भर होकर ज़िन्दगी जैसी कठिन और विलक्षण स्थिति का काम तमाम खुद कर डालती है !आपका आलेख पढ़कर अच्छा लगा !

pranava priyadarshee said...

kamaal ki post. raj kishor ji ko jhuk kar salaam. beshak post ki prernaa bani manisha pahle salaam ki haqdaar hain, apni us sahajta ke liye jo durlabh hai aur jaroori bhee. raj kishor ji ne us sahajta ki jitni shaandaar vyakhya ki hai aur jitne badhiya dhang se use prastut kiya hai vah adbhut hai. saadar naman.

Arun Bharti said...

Very Nice and well knitted comments on so many issues with such an ease.
The way you highlighted the breast implants fashion was hilarious but very true.

Will come back to read again.

Thanks and Regards,

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