Wednesday, March 10, 2010

आरक्षण में आरक्षण बेमानी क्यों है


राजकिशोर

पिछ़ड़े वर्ग के तीनों नेता - मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव और शरद यादव -- देश भर की निगाह में खलनायक बन गए हैं। उनके गुस्से के कारण महिला आरक्षण विधेयक 8 मार्च के ऐसिहासिक दिन लागू नहीं हो सका। हालांकि मैं विधायिका में किसी भी प्रकार के आरक्षण के सख्त खिलाफ हूं और मेरा मानना है कि विधायिका के बजाय नौकरियों में -- सरकारी और गैरसरकारी दोनों -- आरक्षण देने से आम महिला का बेहतर सशक्तीकरण होता, फिर भी यह स्वीकार करने में मुझे कोई कठिनाई नहीं है कि इस वक्त देश का मूड इस विधेयक के पक्ष में है। महिला आरक्षण का मामला इतने अधिक दिनों से लटकता चला आ रहा है और इस मुद्दे पर सभी दल जिस तरह कठघरे में आए हुए है, उसे देखते हुए कांग्रेस पार्टी की पहल प्रशंसनीय ही कही जाएगी।
याद कीजिए, जब विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशें लागू की थीं, तब देश भर में कितना हंगामा मचा था। पिछड़े वर्गों को दिया जानेवाला आरक्षण एक सर्वथा नई बात थी, जिसे गले उतारने में देश को काफी वक्त लगा। अंतत: इस प्रस्ताव को सार्वजनिक स्वीकृति मिल गई और पिछड़ा आरक्षण को ले कर आज किसी को कोई मलाल नहीं है। उन दिनों भी कहीं-कहीं से हलकी-सी आवाज उठी थी कि विधायिका में भी पिछड़ी जातियों को आरक्षण दिया गया, लेकिन यह मांग खारिज कर दी गई।
दरअसल, धर्म, जाति, भाषा आदि के आधार पर विधायिका में आरक्षण एक खतरनाक चीज है, क्योंकि विधायिका का काम कानून बनाना है और विधायिका में बहुमत के आधार पर ही सरकार बनती है जिसकी प्रतिबद्धता किसी एक वर्ग के प्रति नहीं, बल्कि पूरे समाज के प्रति होती है। प्रशासन का चरित्र भी ऐसा ही होता है यानी वह भी पूरे समाज के प्रति जिम्मेदार होता है - किसी एक वर्ग के प्रति नहीं, लेकिन सरकारी नौकरियों में आरक्षण न तो दया के रूप में दिया गया था न पिछड़ी जातियों की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए। इस प्रावधान की जरूरत इसलिए थी कि ऐतिहासिक कारणों से प्रशासन में इन जमातों की पर्याप्त हिस्सेदारी नहीं थी। इन्हीं कारणों से अनुसूचित जातियों और जनजातियों को भी सरकारी नौकरियों में आरक्षण दिया गया था।
विधायिका का मामला भिन्न इसलिए है कि इसके प्रतिनिधि मतदाताओं द्वारा चुन कर आते हैं। मतदाताओं को बाध्य नहीं किया जा सकता कि वे किसी खास धर्म या जाति के उम्मीदवारों को ही चुनें। नौकरी की तुलना में राजनीति एक बहुत व्यापक चीज है। लोकतांत्रिक समाज में वह एक तरह से हमारी सामाजिक और आर्थिक नियति को तय करती है। इसलिए राजनीतिक प्रतिनिधित्व को किसी खास वर्ग या समुदाय तक सीमित नहीं किया जा सकता।
कायदे से अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए भी विधायिका में सीटें आरक्षित नहीं की जानी चाहिए। लेकिन इसके पीछे एक ऐतिहासिक समझौता है जिसे हम पूना पैक्ट के नाम से जानते हैं। यह पैक्ट इसलिए किया गया था कि दलितों के लिए अलग मतदाता मंडल का गठन होने से रोका जा सके। गांधी जी की नजर में इस तरह की पृथकतावादी व्यवस्था बहुत खतरनाक होती, क्योंकि इससे हिन्दू समाज सदा के लिए सवर्ण और अवर्ण में बंट जाता। आंबेडकर भी ऐसा नहीं चाहते होंगे, तभी उन्होंने पूना पैक्ट को स्वीकार किया था। दुख की और शर्म की बात है कि गांधी और आंबेडकर, दोनों की अपार कोशिशों के बाद भी सवर्ण और अवर्ण के बीच की विभेदक रेखा मिट नहीं पाई है। दूसरी ओर, पूना पैक्ट को इस आधार पर भी सफल नहीं कहा जा सकता कि दलितों और जनजातियों को दिए गए आरक्षण से इन समूहों को कोई वास्तविक लाभ नहीं पहुंचा है। इन समुदायों के प्रतिनिधि संसद और विधान सभाओं में अपने शोषित और उत्पीड़ित सदस्यों की आवाज नहीं उठाते न उनकी सुरक्षा के लिए कोई प्रयत्न करते हैं। उनकी ज्यादा रुचि माल जमा करने में होती है। वे सत्ता पक्ष के साथ तरह-तरह के समझौते करते हैं, ताकि अपने को अमीर और सत्तावान बना सकें।
जहां तक महिला आरक्षण का सवाल है, महिलाएं एक अलग कोटिगरी हैं। वे न तो जाति और भाषा से बंधी हैं न वर्ग से। इसके बावजूद विधायिका में उन्हें भी आरक्षण नहीं मिलना चाहिए, क्योंकि जेंडर के आधार पर संसद और विधान सभाओं को बांट देना एक अलोकतांत्रिक हरकत है। हमारा महिला आरक्षण विधेयक इस मामले में अनोखा है कि आज तक किसी भी देश की संसद में इस तरह का विधेयक पेश नहीं हुआ है। जब विधायिका में जाति के आधार पर पुरुषों का विभाजन नहीं किया गया है, तो स्त्रियों के साथ यह नाइंसाफी क्यों? यहां आ कर समानता का तर्क क्यों हवा हो जाता है? बेशक जाति भी स्त्रियों की सामाजिक स्थिति को निर्धारित करती है, पर इसका इलाज यह नहीं है कि संसद को विभिन्न जातियों के प्रतिनिधियों से भर दिया जाए। जिस दिन ऐसा होगा, देश की राजनीति का सर्वनाश हो जाएगा।
यह प्रश्न और भी बेहूदा है कि महिला कोटे में पिछड़ी जातियों के लिए अलग कोटा नहीं तय किया गया, तो सिर्फ संपन्न और उच्च जातियों की स्त्रियां ही संसद में आ सकेंगी। हमारा अनुभव इसके विपरीत है। जब कोई दल अलोकप्रिय हो जाता है, तब उसके पुरुष उम्मीदवार ही नहीं, स्त्री उम्मीदवार भी हारते हैं। एक समय तो महाबली इंदिरा गांधी भी चुनाव हार गई थीं। पिछड़ी जातियों के नेताओं का पाप यह है कि उन्होंने अपने समुदाय की महिलाओं को बड़ी संख्या में सार्वजनिक जीवन में नहीं उतारा है। स्त्री स्वतंत्रता के मामले में ये समुदाय किसी भी अन्य समुदाय की तुलना में ज्यादा संकीर्ण और दकियानूस हैं। दक्षिण भारत में यह दकियानूसी कम है, इसलिए वहां महिलाएं सार्वजनिक जीवन में ज्यादा हैं। इसलिए अपने समुदाय की स्त्रियों के लिए अलग से कोटा मांगने के बजाय पिछ़ड़ावादी नेताओं का कर्तव्य यह है कि वे अपने समुदाय की स्त्रियों को आजाद करें और जन सेवा करने की प्रेरणा दें।

12 comments:

अनूप शुक्ल said...

विधायिका में महिलाओं के आरक्षण के क्या फ़ायदे-नुकसान होंगे यह तो बाद में देखा जायेगा। फ़िलहाल तो इससे बहुत खुशी हुई।

निर्मला कपिला said...

ापसे सहमत हूँ बहुत अच्छा लगा ये आलेख। आभार

Admin said...

बहुत अच्छा । बहुत सुंदर प्रयास है। जारी रखिये ।

आपका लेख अच्छा लगा।



अगर आप हिंदी साहित्य की दुर्लभ पुस्तकें जैसे उपन्यास, कहानी-संग्रह, कविता-संग्रह, निबंध इत्यादि डाउनलोड करना चाहते है तो कृपया किताबघर पर पधारें । इसका पता है :

http://Kitabghar.tk

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

महिला बिल का स्वागत करता हूँ लेकिन आरक्षण में आरक्षण तो होना ही चाहिए था!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...
This comment has been removed by the author.
कृष्ण मुरारी प्रसाद said...

जहां तक महिला आरक्षण का सवाल है, महिलाएं एक अलग कोटिगरी हैं। वे न तो जाति और भाषा से बंधी हैं न वर्ग से।....
इस आरक्षण के बाद पहले के सभी आरक्षणों के दोष दूर हो जायेंगे.जाती, धर्म,वर्ग, अगड़ा, पिछड़ा, भाषा...इत्यादि के आधार पर जो झगडे हैं वह इसमें संभव ही नहीं है,
क्योंकि अब आप किस्से लड़ेंगे? अपने माँ से, आपनी बीबी से, अपनी बहन, बुआ, मौसी, नानी, दादी...किससे ?
नफरत की राजनीति के दिन लदने बाले हैं.

अंकुर गुप्ता said...

मैं समझता हूं कि आरक्षण पार्टियों के भीतर होना चाहिए था ना कि सीटों के ऊपर.
यदि जनता को अपने क्षेत्र के लिए कोई अच्छा पुरूष नेता पसंद है तो यदि उस क्षेत्र की सीट महिलाओं के लिए आरक्षित हो जाती है तो वो चाह के भी उसे नही चुन सकेगी. यदि पार्टी आधारित आरक्षण होता तो महिलाओं को चुनाव लड़ने का मौका तो मिलता ही साथ ही जनता के हाथ में विकल्प की दिक्कत भी नही होती.
ये बात मैं केवल सोच कर नही कह रहा हूं. बल्कि टेलिविजन पर सरपंच की चुनाव के संबंध में देखा था. एक पुरूष सरपंच ने खूब अच्छा काम कराया. गांव वाले उसे ही सरपंच बनाना चाहते थे (और कई बार बना चुके थे) परंतु महिला आरक्षण की वजह से वो उस गांव से चुनाव नही लड़ पाया.
पार्टी आधारित आरक्षण के बारे में आप लोगों का क्या ख्याल है?

कबीर कुटी - कमलेश कुमार दीवान said...

संसदीय लोकतँत्र मे जनप्रतिनिधित्व भी बढ़ाना चाहिये ।

राजकिशोर said...

अंकुर गुप्ता के सुझाव से मैं पूरी तरह सहमत हूं।

स्वप्नदर्शी said...
This comment has been removed by the author.
स्वप्नदर्शी said...

For those who think that less qualified women will end up in the parliament as a result of women bill.

1. Do you think that All male MPs and MLAs are the best qualified candidates in our country. Is there any standard for them? and what is that Standard?

2. Do you also believe that you can not find 300 qualified women candidates in India out of about half billions?

What qualification do you have in mind which a women is suppose to have so that she can be as qualified as Lalu, Mulaayam and Mayavati?

@ Ankur Gupta and Rajkishor

Your strategy will not work, simply because each political party will meet requirement of giving 30% tickets to women. But those seats will end up being not strong hold for a given party. As a result most women will loose, will not reach to the parliament.

If seats are reserved for women, then all political parties will have women candidates, will use their best resources, and eventually a woman will end up winning. This is the only effective way this can work.

As an Indian citizens we are not restricted to maintain residency in any particular area, Male politicians are free to fight in other 70% constituencies if they are good in political service.

They can choose any other place, if because of reserved seat, they can not fight election from their present constituency.

Ultimately we are citizen of India not of any district in particular and leaders in political life should have that confidence in this country.

We see all the time big leaders fighting election in two very far apart constituency (one may be in north, other may be in south, and eventually if they win in both places, they drop one).

I do not think this is going to destroy anybodies political career. eventually all MPs and MLAs reside in State Capitol or in Delhi.

ZEAL said...

Men should not feel insecured. After all its a better decision for their better halves.

अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री को सिर्फ बाहर ही नहीं अपने भीतर भी लड़ना पड़ता है- अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री-विमर्श के तमाम सवालों को समेटने की कोशिश में लगे अनुप्रिया के रेखांकन इन दिनों सबसे विशिष्ट हैं। अपने कहन और असर में वे कई तरह से ...