Monday, March 15, 2010

महिला दिवस की बिलेटेड शुभकामनाएं?

नोन, तेल, लकड़ी...जब से होश संभाला, तब से इन्हीं में मन रमाया। आस पास वालों की नजर में शादी लायक देह हुई तो शादी के लिए लड़का खोजना शुरू किया। लंबी ऊंची गोरी गठीली देह। खेत में हाथ चलाती तो घास सरपट कट जाती। खड़ी फसल भी फर्र फर्र कटवा डालती। लड़की किस्मत वाली थी, लड़का जल्द ही मिल गया। जमीन का एक हिस्सा बेचा। साहूकार से कर्ज लिया। शादी में दही बूरा समेत आलू की सब्जी भी खिलाई बारातियों को। लड़के को मोटरसाइकिल पर चढ़ने का शौक था। लड़की के पिता ने पूरा किया। सेकेंड हैंड सही दाम में मिल गई। जमाई राजा खेत जाया करेंगे फटफटिया पर- सोचते तो छाती कुछ इंच फूल जाती। शादी में 5 रुपए की चिल्लड़ भी उड़ाई थी। सब निपट गया।

..पांच महीने बीतते बीतते पिता सूख गए। लोग कहते टीबी हो गई। मां की खांसी चलती तो थमती नहीं...सांस नहीं ली जाती...लड़की फिर धमकी घर तो अबकी मां नहर में डूब मरेगी...और क्या क्या बेचेंगे बापू...गांव में बिजली नहीं..लड़के को मोबाइल चाहिए...और भी पता नहीं क्या क्या चाहिए...नहीं दे पाएंगे कह दे जाकर...कैसे कह दे लड़की...दूसरे ब्याह के नाम पर धमकाते हैं...अबकी खाली लौटी तो लेंगे नहीं...और और और..दूसरी कर लेंगे...फिर भी लौट गई।

...छठा महीना बीत गया। पड़ोस की चाची ने खबर दी- लड़की को नहर में डुबो दिया...गर्दन काट डाली...दरांती से काटी...पूरी नहीं कटी...लड़की मर गई तो रेतना छोड़ दिया होगा...नहर में बहा दी...।

...मरी देह हाथ लगी घंटे बीतते बीतते। बही नहीं थी। कोने में कहीं सरक गई थी। या पता नहीं कैसे कहां से हाथ लग गई मरी देह।

...पैसे की खनक ने प्रधान के कान में शोर भर दिया था। मां चिल्लाई थी- तुमने मेरी बेटी खा ली।

पूरी बात बता चुकने के बाद गांव से आईं दूर के रिश्ते की मेरी भाभी कहती हैं कि घर में दो बेटी और हैं। उम्र कम है। पर शादी लायक हो चुकी हैं। दोनों अपने पिता से कहती हैं, दोनों अपने पिता से कहती हैं शादी नहीं करेंगी...

नहीं चाहिए मोटर गाड़ी,
नहीं चाहिए बंगला साड़ी
हम घांघरे में रह लेंगे
बापू हम कुंवारे रह लेंगे।।

नहीं चाहिए सेज पिया की
नहीं चाहिए सास मईया सी
हम तुम संग सब सह लेंगे
बापू हम कुंवारे रह लेंगे।।

गोटे वाली चुनर न चाहिए
कोरी चूड़ी भली, रंग न चाहिए
हम बिन कंगन जंच लेंगे
बापू हम कुंवारे रह लेंगे।।

जीजा जैसा खसम न चाहिए
सपने जैसा भरम न चाहिए
गई जीजी की याद बो लेंगे
बापू हम कुंवारे रह लेंगे।।

आपस में चुप रहेंगे
छोटे संग न लड़ेंगे
सयानी बिटिया बनेंगे
बापू हम कुंवारे रह लेंगे।।

---पूजा प्रसाद

13 comments:

रेखा श्रीवास्तव said...

eka kadava sach , aisa yatharth jo ab bhi hamare samaaj men aise vivash mata-pita ke liye abhishap bana hai kintu betiyon ki abhivyakti sarahniy dhang se prastut kee.
bahut bahut sundar abhivyakti.

ab inconvenienti said...

यह हर लड़की को फरमान है या सिर्फ आपका निजी फैसला है?

I too believe institution of marriage should be abolished. Love feels great till it is without commitments. Marriage and freedom are opposite ends.

आर. अनुराधा said...

रोंगटे खड़े हो गए, बदन में झुरझुरी दौड़ गई। और कुछ कहने की हालत नहीं है।

पर इतनी सरल सी बात लोग समझते और मानते तो नहीं हैं न!!!!???

Pooja Prasad said...

@रेखा और अनुराधा, वाकई यह चीजें हमारे समाज में आज भी हैं। जिस घटना का जिक्र यहां किया है वग सुना तो कुछ कहते या बोलते नहीं बना। शहरों में दहेज ने गिफ्ट का रूप ले लिया है, पर वह है और ज्यादा खुलेपन के साथ मौजूद है।

@ab inconvenienti, यह उस हर बहन और सहेली का फैसला हो सकता है जिसने अपनी संगी खोई हो...।

pranava priyadarshee said...

bilkul, anuradha ne jaisi bataayee vaisi hee haalat ho gayee meri bhee. dono chhoti bahno ki ye soch bilkul sahi hai, vah faile isee me sabki bhalaai hai.
sach hai ki 'gift' ka roop dhar kar aaye to bhee vah dahej hee hai, aur rishta tay karte samay ladke ka 'ghar' dekhen ya ladki ke pita ki 'haisiyat' dekhen to vah bhee dahej hee hai.
baharhaal, badhai pooja.

कृष्ण मुरारी प्रसाद said...

पगला गयी हैं क्या?....इतना अच्छा लिख कर औरों को भी पगलाना है क्या?..

शरद कोकास said...

यही सच है ।

शोभना चौरे said...

is sach ke aage bhart ke tthakthit vikas bemani lgte hai .

अमिताभ त्रिपाठी ’ अमित’ said...

चार पंक्तियाँ इस पोस्ट पर सद्यः प्रसूत

करे जो हौसला सूरत हज़ार निकलेगी
जब अपने दम पे वो देहरी के पार निकलेगी।

किसी के देने से अब तक कभी मिली ही नहीं
फ़स्ले-आज़ादी तो ख़ैरात में फली ही नहीं।

आपके हौसले को मेरी बधाई!

Unknown said...

ये कडबे अनुभव यकीनन शादी नामक सन्सथा पर सचाल खदे करते है लेकिन ये सभी का अन्तिम फ़ैसला तो नही ही है. राह कठिन है पर रास्ते भी हमे देखने ही होन्गे.

Sulabh Jaiswal "सुलभ" said...

एक जैसी संस्था एक जैसे रूप सभी वर्गों पर कैसे लागू होगी. अच्छा बड़ा भला परिवार खोजना मतलब दहेज़ के लिए रकम जुगाड़ करना.
आपबीती के बाद ऐसे फैसलों कि कद्र करनी होगी.

अनुराग अन्वेषी said...

काश की ऐसी हर बेटियां कह पातीं -
बापू, बस एक इजाजत दो
हम सब हिसाब बराबर कर लेंगे
पूरी नहीं, गर्दन उसकी आधी ही काटेंगे
भले हो जाए हमारी और बदनामी
पर उस जीजा को जिंदा नहीं छोड़ेंगे

बस बापू एक इजाजत दो...

संजय भास्‍कर said...

ये कडबे अनुभव यकीनन शादी नामक सन्सथा पर सचाल खदे करते है लेकिन ये सभी का अन्तिम फ़ैसला तो नही ही है. राह कठिन है पर रास्ते भी हमे देखने ही होन्गे.

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