Saturday, March 27, 2010

बुरके के पीछे से विद्रोह की आवाज

राजकिशोर

नकाब, हिजाब या बुरके के पीछे सिर्फ मुस्सिम कट्टरपंथ की शिकार ही नहीं छिपी होती, बल्कि रेडिकल विचार भी पनप रहे होते हैं, यह सऊदी अरब की कवयित्री हिसा हिलाल ने साबित कर दिया है। सऊदी अरब वह मुल्क है, जिसने इस्लाम की सबसे प्रतिक्रियावादी व्याख्या अपने नागरिकों पर थोपी हुई है। इसकी सबसे ज्यादा कीमत वहां की औरतों को अदा करनी पड़ी है। सऊदी अरब में औरतों को पूर्ण मनुष्य का दरजा नहीं दिया जाता। वे घर से अकेले नहीं निकल सकतीं, अपरिचित आदमियों से मिल नहीं सकतीं, कार नहीं चला सकतीं और बड़े सरकारी पदों पर नियुक्त नहीं हो सकतीं। घर से बाहर निकलने पर उन्हें सिर से पैर तक काला बुरका पहनना पड़ता है, जिसमें उनका चेहरा तक पोशीदा रहता है - आंखें इसलिए दिखाई पड़ती हैं, क्योंकि इसके बिना वे 'हेडलेस चिकन' हो जाएंगी। । पुरुषों की तुलना में उनके हक इतने सीमित हैं कि कहा जा सकता है कि उनके कोई हक ही नहीं हैं -- सिर्फ उनके फर्ज हैं, जो इतने कठोर हैं कि दास स्त्रियों या बंधुवा मजदूरों से भी उनकी तुलना नहीं की जा सकती। ऐसे दमनकारी समाज में जीनेवाली हिसा हिलाल ने न केवल पत्रकारिता का पेशा अपनाया, बल्कि विद्रोही कविताएं भी लिखीं। इसी हफ्ते अबू धाबी में चल रही एक काव्य प्रतियोगिता में वे प्रथम स्थान के लिए सबसे मज़बूत दावेदार बन कर उभरी हैं।

संयुक्त अरब अमीरात की राजधानी अबू धाबी में कविता प्रतियोगिता का एक टीवी कार्यक्रम होता है -- जनप्रिय शायर। इस कार्यक्रम में हर हफ्ते अरबी के कवि और कवयित्रियां अपनी रचनाएं पढ़ती हैं। विजेता को तेरह लाख डॉलर का पुरस्कार मिलता है। इसी कार्यक्रम में हिसा हिलाल ने अपनी बेहतरीन और ताकतवर नज्म पढ़ी - फतवों के खिलाफ। यह कविता उन मुस्लिम धर्मगुरुओं पर चाबुक के प्रहार की तरह है, ' जो सत्ता में बैठे हुए हैं और अपने फतवों और धार्मिक फैसलों से लोगों को डराते रहते हैं। वे शांतिप्रिय लोगों पर भेड़ियों की तरह टूट पड़ते हैं।' अपनी इस कविता में इस साहसी कवयित्री ने कहा कि एक ऐसे वक्त में जब स्वीकार्य को विकृत कर निषिद्ध के रूप में पेश किया जा रहा है, मुझे इन फतवों में शैतान दिखाई देता है। 'जब सत्य के चेहरे से परदा उठाया जाता है, तब ये फतवे किसी राक्षस की तरह अपने गुप्त स्थान से बाहर निकल आते हैं।' हिसा ने फतवों की ही नहीं, बल्कि आतंकवाद की भी जबरदस्त आलोचना की। मजेदार बात यह हुई कि हर बंद पर टीवी कार्यक्रम में मौजूद श्रोताओं की तालियां बजने लगतीं। तीनों जजों ने हिसा को सर्वाधिक अंक दिए। उम्मीद की जाती है कि पहले नंबर पर वही आएंगी।

मुस्लिम कट्टरपंथ और मुस्लिम औरतों के प्रति दरिंदगी दिखानेवाली विचारधारा का विरोध करने के मामले में हिसा हिलाल अकेली नहीं हैं। हर मुस्लिम देश में ऐसी आवाजें उठ रही हैं। बेशक इन विद्रोही आवाजों का दमन करने की कोशिश भी होती है। हर ऐसी घटना पर हंगामा खड़ा किया जाता है। हिसा को भी मौत की धमकियां मिल रही है। जाहिर है, मर्दवादी किले में की जानेवाली हर सुराख पाप के इस किले को कमजोर बनाती है। लंबे समय से स्त्री के मन और शरीर पर कब्जा बनाए रखने के आदी पुरुष समाज को यह कैसे बर्दाश्त हो सकता है? लेकिन इनके दिन अब गिने-चुने हैं। विक्टर ह्यूगो ने कहा था कि जिस विचार का समय आ गया है, दुनिया की कोई भी ताकत उसे रोक नहीं सकती। अपने मन और तन की स्वाधीनता के लिए आज दुनिया भर के स्त्री समाज में जो तड़प जाग उठी है, वह अभी और फैलेगी। दरअसल, इसके माध्यम से सभ्यता अपने को फिर से परिभाषित कर रही है।

वाइरस की तरह दमन के कीड़े की भी एक निश्चित उम्र होती है। फर्क यह है कि वाइरस एक निश्चित उम्र जी लेने के बाद अपने आप मर जाता है, जब कि दमन के खिलाफ उठ खड़ा होना पड़ता है और संघर्ष करना होता है। मुस्लिम औरतें अपनी जड़ता और मानसिक पराधीनता का त्याग कर इस विश्वव्यापी संघर्ष में शामिल हो गई हैं, यह इतिहास की धारा में आ रहे रेडिकल मोड़ का एक निश्चित चिह्न है। सबसे बड़ी बात यह है कि इस तरह के प्रयत्नों से यह मिथक टूटता है कि मुस्लिम समाज कोई एकरूप समुदाय है जिसमें सभी लोग एक जैसा सोचते हैं और एक जैसा करते हैं। व्यापक अज्ञान से उपजा यह पूर्वाग्रह जितनी जल्द टूट जाए, उतना अच्छा है। सच तो यह है कि इस तरह की एकरूपता किसी भी समाज में नहीं पाई जाती। यह मानव स्वभाव के विरुद्ध है। धरती पर जब से अन्याय है, तभी से उसका विरोध भी है। रूढ़िग्रस्त और कट्टर माने जानेवाले मुस्लिम समाज में भी अन्याय और विषमता के खिलाफ प्रतिवाद के स्वर शुरू से ही उठते रहे हैं। हिसा हिलाल इसी गौरवशाली परंपरा की ताजा कड़ी हैं। वे ठीक कहती हैं कि यह अपने को अभिव्यक्त करने और अरब स्त्रियों को आवाज देने का एक तरीका है, जिन्हें उनके द्वारा बेआवाज कर दिया गया है 'जिन्होंने हमारी संस्कृति और हमारे धर्म को हाइजैक कर लिया है।'

तब फिर अबू धाबी में होनेवाली इस काव्य प्रतियोगिता में जब हिसा हलाल अपनी नज्म पढ़ रही थीं, तब उनका पूरा शरीर, नख से शिख तक, काले परदे से ढका हुआ क्यों था? क्या वे परदे को उतार कर फेंक नहीं सकती थीं? इतने क्रांतिकारी विचार और परदानशीनी एक साथ कैसे चल सकते हैं? इसके जवाब में हिसा ने कहा कि 'मुझे किसी का डर नहीं है। मैंने पूरा परदा इसलिए किया ताकि मेरे घरवालों को मुश्किल न हो। हम एक कबायली समाज में रहते हैं और वहां के लोगों की मानसिकता में परिवर्तन नहीं आया है।' आएगा हिसा, परिवर्तन आएगा। आनेवाले वर्षों में तुम जैसी लड़कियां घर-घर में पैदा होंगी और अपने साथ-साथ दुनिया को भी आजाद कराएंगी।

यह भी नारीवाद का एक चेहरा है। इसमें भी विद्रोह है, लेकिन अपने धर्म की चौहद्दी में। यह जाल-बट्टे को एक तरफ रख कर हजरत साहब की मूल शिक्षाओं तक पहुंचने की एक साहसी कार्रवाई है। इससे संकेत मिलता है कि परंपरा के भीतर रहते हुए भी कैसे तर्क और मानवीयता का पक्ष लिया जा सकता है। अगला कदम शायद यह हो कि धर्म का स्थान वैज्ञानिकता ले ले। नारीवाद को मानववाद की तार्किक परिणति तक ले जाने के लिए यह आवश्यक होगा। अभी तो हमें इसी से संतोष करना होगा कि धर्म की डाली पर आधुनिकता का फूल खिल रहा है।

15 comments:

Randhir Singh Suman said...

nice

L.R.Gandhi said...

विरोधाभास है भई ......शैतान की आयतों को भी मानो और उनसे मुक्ति का आह्वान भी करो ! एक और तसलीमा नसरीन सांप की मांद में बीन बजा रही है.....भगा दी जाएगी...

कृष्ण मुरारी प्रसाद said...

धर्म के जानकार लोगों से माफी सहित ....
धर्म के बारे में लिखने ..एवं ..टिप्पणी करने बाले.. तोता-रटंत.. के बारे में यह पोस्ट ....मेरा कॉमन कमेन्ट है....
http://laddoospeaks.blogspot.com/2010/03/blog-post_27.html

सुशीला पुरी said...

यह सुखद है .........

Taarkeshwar Giri said...

Ek achhi pahale hai. Un sabhi purani paramparawo ko badal dena chahiye jiski aaj ke samaj main koi jarurat nahi hai.

mukti said...

जहाँ जितना ज्यादा सप्रेसन होगा, वहाँ उतनी ही तेजी से विद्रोह होगा. कोई माने या न माने, उसे चाहे जो नाम दे ले, पर ये बात सच है कि बुर्कों के पीछे बहुत ही अधिक असंतोष है. ये उस तीसरी दुनिया की औरत है, जिसने पर्दे को अपनी ताकत बना लिया है और इसके द्वारा वह न सिर्फ़ तीसरी दुनिया के मर्दों को बल्कि पश्चिम की आधुनिकता को भी धता बता रही है. वो एक तरफ़ अपने धर्म के ठेकेदारों को दिखा रही है कि उसके शरीर को भले ही सात पर्दों के अन्दर बन्द कर लो पर विचारों को नहीं कैद किया जा सकता. दूसरी तरफ़ वह पश्चिम के देशों को भी ठेंगा दिखा रही है, जो ये मानते हैं कि आधुनिकता उनकी बपौती है और वो तभी आ सकती है, जब पश्चिम के मानदण्डों को अपनाया जाये.
अन्ततः --
"अपने मन और तन की स्वाधीनता के लिए आज दुनिया भर के स्त्री समाज में जो तड़प जाग उठी है, वह अभी और फैलेगी।"

डॉ .अनुराग said...
This comment has been removed by the author.
डॉ .अनुराग said...

टाइम ऑफ़ इंडिया में फोटो देखा था .बुर्के में ....कवियत्री का ...सब जानते है क्या गलत है .....फिर इस मसले पर क्यों मुस्लिम बुद्दिजीवी खामोश रहते है ......क्या मजहब का डंडा इतना बड़ा है ?

एक बात ओर ऐसी पोस्टो पे "nice" पढ़कर बड़ी कोफ़्त होती है

शोभना चौरे said...

jag uthi hai nari aur isi trh kitne hi prde ho uske vicharo ko bahr aane se koi rok na skega .
anurag ji se shmat "nice "ke vishy me .

Sanjay Grover said...

मैं डा. अनुराग से सहमत हूं। एक मुस्लिम बुद्विजीवी जब सीता की अग्नि-परीक्षा पर उंगली उठाता है तो हिंदू बुद्विजीवी खुले दिमाग़ से उसका साथ देता है। लेकिन बात जब इस्लाम की आती है तो उस ‘प्रगतिशील’ मुस्लिम बुद्धिजीवी के तर्क और तेवर बदलने लगते हैं। तब उसे सारी कमियां पितृसत्ता और दूसरे धर्मों के आक्रमणों में नज़र आने लगती हैं। आप कब तक अपने धर्म में लोच पैदा करने से बचते रहेंगे और अन्य धर्मो की ‘लचक’ का फ़ायदा उठाकर ख़ुदको ‘क्रांतिकारी’ मानते रहेंगे ? पिछले 5-6 महीनों से तो कुछ इतनी अजीबो-ग़रीब चीज़ें देख रहा हूं कि लगने लगा है कि निष्पक्ष और उदार होना जैसे कोई अपराध है !

प्रज्ञा पांडेय said...

हिसा हिलाल के विचारों को मजहब नकाब में रहने को मजबूर नहीं कर सका न ! राख के नीचे पड़ी चिंगारी ही तो जला देती है ., लेकिन ये मुस्लिम बुद्धिजीवी चुप रहते हैं .इस बात की वजह क्या है? क्या उन्हें पीडाओं का एहसास नहीं होता ? या वे धर्म के सामने को बुद्धि को ताक पर रख देना आसान समझते हैं !

कविता रावत said...

Dheere-dheere hi sahi naari jaag rahi hai... aur use apni sahi disha khud tay karni hai..
bahut achha laga aapka lekh....
bahut shubhkamnayne

रेखा श्रीवास्तव said...

कोई न कोई तो पहल करता ही है और फिर उसके पीछे चलने वालों को काफिला भी बन जाता है. कट्टरवादिता ने ही मानव को मानव नहीं रहने दिया है. किसी का भी जीवन उनकी नजर में क्षणभंगुर सिद्ध होता है क्योंकि वे अंधविश्वास से ही ग्रसित होनेवालों पर शासन कर सकते हैं. जिनमें विरोध की ताकत है वे इन सब नियमों से ऊपर उठ जाते हैं. शोषित खुद ही अपने ऊपर का लबादा उठा कर नहीं फेंकेंगे तब तक उसमें ही सांस लेते रहेंगे और घुट घुट कर जीते रहेंगे. मर्यादा में रहकर भी विरोध किया जा सकता है. अपने मानव होने के अधिकारों को लिया जा सकता है.

अरुणेश मिश्र said...

प्रशंसनीय ।

''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल said...

aise lekhan kee jarurat hai

अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री को सिर्फ बाहर ही नहीं अपने भीतर भी लड़ना पड़ता है- अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री-विमर्श के तमाम सवालों को समेटने की कोशिश में लगे अनुप्रिया के रेखांकन इन दिनों सबसे विशिष्ट हैं। अपने कहन और असर में वे कई तरह से ...