Monday, April 5, 2010

क्या, कहीं कोई जवाब है?

मैं राइट टू एजूकेशन वाली खबर पढ़कर खुश थी पिछले दिनों, इसी बीच मेरी एक मेरी एक दोस्त का फोन आया। मेरी दोस्त गायनोकोलॉजिस्ट है. उसके फोन ने बेचैन कर दिया. उसके पति के एक दोस्त (जो कि यूपी के एक महत्वपूर्ण जिले में डीएम हैं) उसके नर्सिंग होम में अपनी पत्नी समेत आए. कारण पत्नी के पेट में पल रहे गर्भ की लिंग जांच. दोस्ती का तकाजा और अपने ऊंचे ओहदे की हनक. उन्हें पूरा यकीन था कि काम हो ही जायेगा.
मेरी दोस्त बड़ी सख्त है इन मामलों में। उसके सिद्धान्त के खिलाफ था यह। पहले भी कई मौकों पर उसने लोगों की बुराई मोल ली लेकिन जांच नहीं की, तो नहीं की। लेकिन इस बार मामला थोड़ा दबाव बना रहा था। पति के उन मित्र ने पति की काफी मदद की थी. कॉलेज में उसकी बीमारी में ब्लड भी डोनेट किया था. मेरी दोस्त के पति जो खुद भी डॉक्टर है अपने इस डीएम दोस्त को काफी मानते हैं. मेरी दोस्त ने अपने पति को फोन लगाया और मामला बयान किया. जाहिर है वो लिंग जांच नहीं करना चाहती थी. दोनों पति-पत्नी ने आपस में मशविरा किया और इसके बाद उन्हें स्पष्ट शब्दों में मना कर दिया गया कि यह हमारे सिद्धांतों के खिलाफ है. उन्हें समझाया भी गया कि यार, इस जमाने में, पढ़े लिखे होकर तुम यह क्यों कर रहे हो? बेटा हो या बेटी क्या फर्क पड़ता है.
डीएम महोदय को ना सुनने की आदत तो थी नहीं, सो वे तिलमिला उठे। उन्होंने जाते-जाते मेरी दोस्त को जो झाड़ दी उसका लब्बोलुआब यह था कि वो जिंदगी में कभी तरक्की नहीं कर पायेगी। क्योंकि उसे समय के साथ चलना नहीं आता। मेरी दोस्त की खुद दो बेटियां हैं यह उसकी असफलता की गारंटी है ऐसा वो कहकर गये।
मैं जब भी उससे मिलती हूं वो ऐसे तमाम किस्से बताती है, जिसमें उस पर लिंग जांच का दबाव बनाया जाता है। कभी दोस्त, कभी पड़ोसी, कभी रिश्तेदार। पेशेंट्स तो खैर हैं ही। हर बार वो इन चीजों को लेकर नाराज होती है, इस बार दु:खी थी। दुखी इसलिए नहीं कि उसे भला-बुरा कहा गया बल्कि इसलिए कि क्या फायदा इस पढ़ाई-लिखाई का जब कि एक अनपढ़ मजदूर और एक डीएम, इंजीनियर, डॉक्टर, मैनेजर एक ही जैसा सोच रहे हैं। उसकी आवाज पिघल सी रही थी।
मेरी बेटियां मेरी सफलता हैं प्रतिभा, उन्हें मेरी असफलता क्यों कहते हैं लोग?

क्या कहीं कोई जवाब है?

14 comments:

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

सवाल तो सोच का है................
जय हिन्द, जय बुन्देलखण्ड

Amitraghat said...

डीएम जैसे लोगों को कोई भी नहीं समझा सकता है..बेटियाँ घरों की रौनक है और हमेशा ही रहेंगी............."

Bhavesh (भावेश ) said...

पढ़ा लिखा होना और समझधार होने में फर्क है. ये डी एम् महोदय पढ़ लिख गए तो, ये समझदार होने की कोई गारंटी थोड़े ही है. हो सकता है या तो ये आरक्षण के सहारे आये हों और अगर नहीं तो भी दफ्तर में जिन लोगो के बीच रहते है उसमे आधे से ज्यादा नाकाबिल लोग आरक्षण का सहारा लेकर नौकरी में आये हुए है. इनमे और अनपढ़ गंवार में इतना ही फर्क है कि ये शायद हिंदी या अंग्रेजी बोल लिख सकते हो.

kunwarji's said...

AB KYA JAWAAB HAI ISKA....??????

kunwar ji,

आनंद said...

लोगों की मानसिकता बदलने में समय लगेगा...

- आनंद

रेखा श्रीवास्तव said...

ये समय कभी नहीं आएगा? जो आना था आ चुका, लड़कियाँ क्या होती हैं? इसके बारे में लोगों कि नजर अगर अभी तक साफ नहीं है तो फिर कब आएगा. सोच पुरुष कि कभी बदली है और न बदलेगी. (मैं सिर्फ डीएम जैसे लोगों कि बात कर रही हूँ.) कुल दीपककी जो अवधारणा है वह कभी मिटा नहीं पायेंगे ये दकियानूसी लोग. कुल ज्योति क्यों नहीं? जवाहर लाल नेहरु के पुत्र नहीं थे - इंदिरा गाँधी उनकी पुत्री ही थीं. फिर कुल का नाम कब तक चलेगा? ये तो सिर्फ आपके अपने कर्मों से ही चलता है. बेटे या बेटियों से नहीं. फिर नाम डुबोने वाले पुत्र से सिर ऊँचा करने वाली बेटियां बहुत अच्छी हैं.
कभी दुखी नहीं होना चाहिए कि हमारे सिर्फ बेटियां हैं. मेरे भी बेटियां हैं और मुझे उन पर फख्र है.

सुशील छौक्कर said...

मैं बहुत पहले सोचता था कि पढने लिखने से आदमी अच्छा इंसान हो जाता है। पर मैं गलत था बाद में इसका अहसास हुआ। ये डीएम साहब खूब पढलिखकर ही डीएम बने होगे पर सोच वही पुरानी सी। लगता है हमने भौतिक संसाधनों में पाने में तरक्की कर ली है पर सोच के मामलें में अभी पिछे है। और ऐसे विरले लोग कम ही मिलते जैसी ये डाक्टर साहिबा है।

डॉ महेश सिन्हा said...

पढ़ना
लिखना
गढ़ना
सब अलग अलग बातें हैं

कृष्ण मुरारी प्रसाद said...

ऐसे लोगों को मैं कहता हूँ..."पढ़-पशु" ..यानि ..पढ़ा-लिखा पशु...

Sunil Yadav said...

apni dost se kahiye ki unka nam bhi batayen.aise mahan logon ke baare mein sabhi ko jankari honi chahiye.Sayed DM sahab Bhool gaye ki unki wife aur unki maa bhi Girl hain.

वीनस केसरी said...

पढ़े लिखे पशु

बिलकुल सही कहा

अजय कुमार झा said...

किसी ने बिल्कुल ठीक ही कहा है पढे लिखे होने और शिक्षित होने में फ़र्क होता है ...पता चल गया कि वो फ़र्क क्या होता है ? बेटियों का महत्व सिर्फ़ वो ही जान सकते हैं जिनके पास बेटियां होती हैं ...बहुत ही अच्छी पोस्ट
अजय कुमार झा

अजित गुप्ता का कोना said...

इसी सत्‍य को उजागर करने की आवश्‍यकता है। आज हम डॉक्‍टरों को मोहरा बनाते हैं लेकिन वास्‍तविकता है कि उन्‍हें धमकियां मिलती है। उन्‍हें बदनाम किया जाता है और उन पर झूठे मुकदमें ठोके जाते हैं। दोषी समाज है और बदनाम हम डाक्‍टर को करते हैं इसी कारण कुछ डाक्‍टर कहते हैं कि इन सबसे बचने के लिए अच्‍छा है कि लिंग परीक्षण कर ही दो। ऐसा ही गर्भपात में भी है। पढे-लिखे होने से मानसिकता नहीं बदलती है। शिक्षा का अर्थ तो केवल रोजगार है। इसलिए ऐसी समस्‍या दिखने पर हम सबको भी विवेक के साथ किसी का समर्थन करना चाहिए। किसी एक वर्ग को गाली देने से कभी भी समाज को नहीं सुधारा जा सकता है।

अविनाश वाचस्पति said...

ऐसी ही सोच की वजह से ही तो यह सब है। ऐसे ही मानसिकता की वजह से तो इंसानियत शर्मसार है। परन्‍तु जो संतुलन बना हुआ है वो जैसी आपकी मित्र हैं, उनकी वजह से ही है। सुख दुख, गलत सही यह समाज की अनिवार्यता है। बुराई नहीं होगी तो अच्‍छाई भी नहीं पूछी जाएगी। दोनों ही समाज की अनिवार्यताएं हैं। पर हमें सदैव बेहतर के लिए प्रयास करते रहने चाहिएं।

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