Wednesday, April 7, 2010

निगाहें मिलाने को जी नहीं चाहता

पिछले दिनों उत्तराखंड के एक सुदूर गांव में बने पर्यटन स्थल पर एक जर्मन छात्रा से मुलाकात हुई। वह हिंदुस्तान के बारे में पढ़ाई कर रही है और इंटर्नशिप के लिए हर साल तीन-चार महीने के लिए यहां आती है। यहां आना उसके पाठ्यक्रम का जरूरी हिस्सा है।

उससे बातचीत के दौरान गोवा में किशोरी स्कारलेट के साथ बलात्कार और उसकी हत्या की घटना पर भी चर्चा हुई। बातचीत खूब देर तक चली। उस दौरान यहां और जर्मनी में स्त्री-पुरुष समानता से लेकर उनके आपसी व्यवहार और उसकी सांस्कृतिक व्याख्या तक के विषयों पर बात हुई। बातचीत के दौरान उसने बताया कि वह इस देश में कोशिश करती है कि सूरज ढलने के बाद बाहर न रहे। रात आठ या ज्यादा से ज्यादा नौ बजे तक बाहर रहती है, उसके बाद नहीं। जबकि जर्मनी में दिन-रात कभी भी घर से निकले, कोई दिक्कत नहीं होती।

उसने यह भी बताया कि उसने दुपट्टा ओढ़ना सीख लिया है।

एक और चीज सीखी है उसने- लोगों से, खास तौर पर पुरुषों से नजरें बिना मिलाए बात करना। हालांकि उसके देश में नजरें मिलाकर बात करना ही सहज है और नजरें चुराना किसी कमी की ओर इशारा करता है। पर उसने हिंदुस्तान में जाना है कि ‘नजरें मिलाकर बात करने का और ही मतलब होता है।’

उसके इस अवलोकन और ज्ञान से मैं दंग रह गई।

21 comments:

कृष्ण मुरारी प्रसाद said...

संस्कृति के अंतर से ऐसा होता है....

ab inconvenienti said...

Cultural Differences in Non-verbal Communication


6. Eye Contact and Gaze

In USA, eye contact indicates: degree of attention or interest, influences attitude change or persuasion, regulates interaction, communicates emotion, defines power and status, and has a central role in managing impressions of others.

Western cultures — see direct eye to eye contact as positive (advise children to look a person in the eyes). But within USA, African-Americans use more eye contact when talking and less when listening with reverse true for Anglo Americans. This is a possible cause for some sense of unease between races in US. A prolonged gaze is often seen as a sign of sexual interest.

Arabic cultures make prolonged eye-contact. — believe it shows interest and helps them understand truthfulness of the other person. (A person who doesn’t reciprocate is seen as untrustworthy)

Japan, Africa, Latin American, Caribbean — avoid eye contact to show respect.


http://www.1000ventures.com/business_guide/crosscuttings/communication_f2f_eye_contact.html

In some cultures, looking people in the eye is assumed to indicate honesty and straightforwardness; in others it is seen as challenging and rude. Most people in Arab cultures share a great deal of eye contact and may regard too little as disrespectful. In English culture, a certain amount of eye contact is required, but too much makes many people uncomfortable. Most English people make eye contact at the beginning and then let their gaze drift to the side periodically to avoid 'staring the other person out'. In South Asian and many other cultures direct eye contact is generally regarded as aggressive and rude.
In some cultures and religious groups eye contact between men and women is seen as flirtatious or threatening. Men of these communities who do not make eye contact with women are not usually rude or evasive, but respectful.
Different cultures also vary in the amount that it is acceptable to watch other people. Some experts call these high-look and low-look cultures. British culture is a low-look culture. Watching other people, especially strangers, is regarded as intrusive. People who are caught 'staring' usually look away quickly and are often embarrassed. Those being watched may feel threatened and insulted. In high-look cultures, for example in southern Europe, looking or gazing at other people is perfectly acceptable; being watched is not a problem. When people's expectations and interpretations clash, irritation and misunderstandings can arise.

mukti said...

वो गाँव में रह रही है न...वो भी झारखंड के...तो सही सीखा है उसने. यही तो हमारे यहाँ लड़कियों को सिखाया जाता है...कितनी अच्छी छवि है उसके मन में हमारे देश की. संस्कारों से भरपूर आदर्श भारतीय नारियाँ, जिन्हें भले ही लोटा लेकर सुबह-सुबह बाहर निकलना पड़ता हो, मुँह घूँघट से ढका रहता है...( आपत्तिजनक शब्दों के लिये माफ़ी, पर आज मेरा खूब कड़वा-कड़वा बोलने का मन हो रहा है).

mukti said...

@ ab inconvenienti, बस एक सवाल---अगर बात संस्कृति की है तो स्त्री-पुरुष दोनों पर लागू होनी चाहिये. लेकिन हमारे देश में ऐसा नहीं है. कुछ अपवाद छोड़ दें, तो लड़के और आदमी तो ऐसे घूर कर देखते हैं कि हमीं लोग असहज सा महसूस करने लगते हैं. गाँव आते-जाते समय ही नहीं इलाहाबाद में पढ़ाई के दौरान मैंने ऐसी बहुत सी अप्रिय परिस्थितियों को झेला है, जबकि मैं फुलस्लीव का कुर्ता-पायजामा पहनती थी और दुपट्टे में बाकायदा पिन लगाकर जाती थी कि कहीं उड़ न जाये.

ab inconvenienti said...
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ab inconvenienti said...

@ mukti jee

यही सांस्कृतिक अंतर हैं. जैसे की भारत में आप साडी पहन कर निकलें, और मिड्रिफ (पेट और नाभि) न ढकें, तो कोई ध्यान नहीं देगा. पर कोई महिला यूरोप, अरब, उत्तरी या दक्षिणी अमेरिका में मिड्रिफ ढके बिना सड़क पर निकल जाएँ, तो वहां भी हर आता जाता ऐसे घूरेगा की क्या कहें. कितनी ही जातियों के आदिवासियों में महिलाओं में नग्न रहने और सीना खुला रखने का रिवाज़ है, पर वहां यौन शोषण, बलात्कार, छेड़छाड़, यौन कुंठा जैसी कोई चीज़ नहीं सुनी गई. न ही उनमे स्तनों के प्रति कोई आकर्षण है. वहां सेक्स की बच्चे पैदा करने से ज्यादा कोई अहमियत भी नहीं. पर मुख्यधारा के समाज में इसका उल्टा है. यह तो तय है की पुरुष ऐसा जानबूझ कर नहीं करते. कुछ न कुछ ऐसा है जो अन्दर से उन्हें प्रेरित करता है, और पूरी तरह समझ लिया जाए तो बदला भी जा सकता है. अब यह क्यों है, और बिना आदिम जीवन में लौटे यह सब किस तरह बदला जा सकता है वैज्ञानिकों और मानवशास्त्रियों के पास इसकी कई थ्योरी हैं. पर यह परिकल्पनाएं अर्थशास्त्रीय प्रतिदर्शों की तरह जटिल हैं.

जो सवाल नारीवादी उठा रही हैं वह सवाल साठ के ब्रा बर्निंग के दौर से उठ रहे हैं, पर सन नब्बे के बाद मस्तिष्क विज्ञान में आई क्रांति के बाद हमारे पास अधिकतर सवालों के जवाब हैं. लेकिन ब्लॉग इतने गंभीर और विस्तृत अध्ययन लिए सही मंच नहीं है. पुस्तकें पढने की किसी के पास फुर्सत नहीं है. हां, फुर्सत घिसे पिटे सवाल बार बार उठाने और हर समस्या के लिए मर्दों को गरियाने की है. फिर यह भी है की वैज्ञानिक साहित्य हिंदी में नहीं हैं, इससे सुई साठ और सत्तर में अटकी हुई है. और अपने देश में ज़्यादातर लोग अंग्रेजी में बेस्टसेलर्स के आलावा शायद ही कुछ पढ़ते हैं.

आप कह सकती हैं, की मर्द होते ही कमीने है. अगर आप भी उसी परिवेश में लड़के के रूप में जन्म लेती तो आप इन लड़कों और आदमियों से बिलकुल अलग होती. आप पूरी जिंदगी में किसी भी स्त्री या लड़की को घूरकर नहीं देखती, न ही लड़कियों के वक्ष, चाल, चेहरे या कमर की तरफ आकर्षण महसूस करतीं.

या करतीं? आप पुरुष होती तो कैसी होती?

यह भी हो सकता है महिलाओं में पुरुष शारीर की तरफ कोई आकर्षण नहीं होता, न ही वे किसी सुन्दर, सफल और गठे हुए पुरुष को चोर नज़रों से नहीं घूरती. पर अपना यह गुण आप पुरुषों पर क्यों थोपना चाहती हैं?

क्या यह प्रकृति की गलती है? उसे आज जो महिलाऐं हैं उन्हें पुरुष के रूप में पैदा करना था, और कमीने मर्दों को लड़की के रूप में. तब शायद संतुलन आता. खैर....

Pratibha Katiyar said...

अनुराधा जी सही बात तो ये है की हमारा खुद से निगाहे मिलाने को भी दिल नहीं चाहता. मेरी एक दोस्त जो हिंदुस्तान में पली पढ़ी और अब पिछले आठ बरस से अमरीका में रह रही है बताती है की विदेशी लड़कियां हिन्दुस्तानी लड़कों से बात करते
समय अतिरिक्त सतर्क रहती हैं. आधुनिक लड़कियों के बारे में बौधिक किस्म के पुरुषों की राय भी कमाल की होती है. उन्हें इनमे एक अवेलिबिल्टी सी नज़र आती है. यहाँ बात पहनावे में बदलाव की नहीं उस नीयत की है जिसमे खोट है और जिसे विदेशी लड़कियां भी भांपने लगी हैं. स्त्री पुरुष समानता की बुनियाद यहीं से कमजोर होने लगती है. यही बात निगाह मिलाकर बात करने के मामले पर भी लागू होती है. ऐसा नहीं है की विदेशों में सब अच्छा ही है फिर भी...

ab inconvenienti की टिप्पड़ी के बारे में सुजाता जी ही तय करें...

ab inconvenienti said...

ऐसा नहीं है की विदेशों में सब अच्छा ही है फिर भी... सही बात तो ये है की हिन्दुस्तानी मर्द होते ही कमीने है.

सुजाता said...

ab inconvenienti
यह व्यक्तिगत आक्षेप नही है।
प्रतिभा जी,
ab inconvenienti व हमारे बीच यह विवाद काफी समय से चल रहा है। पर अच्छा लगा किआज वे मनोविग्य़ान और प्रकृति से ज़रा परे हटकर सोशलाइज़ेशन पर बात कर रहे हैं।विभिन्न समाजों केअंतर की ओर्ध्यान दिला रहे हैं।
वे कहते हैं -
"यह तो तय है की पुरुष ऐसा जानबूझ कर नहीं करते. कुछ न कुछ ऐसा है जो अन्दर से उन्हें प्रेरित करता है, और पूरी तरह समझ लिया जाए तो बदला भी जा सकता है."
दर अस्ल वे जवाब खुद ही दे रहे हैं । यह सामाजिक ट्रेनिंग है और समाज की शक्ति संरचना है जो पुरुष को ऐसे कृत्य केलिए अन्दर से प्रेरित करती है।
ऐसा नही है कि स्त्री कोई "अयौनिक" या ए-सेक्शुअल जीव है जो वह पुरुष केप्रति आकर्षण महसूस नही करती । वरन ,उसकी समाजिक लर्निंग व शक्ति संरचना मे उसकी स्थिति उसे इसके किसी भी सभ्य-असभ्य इज़हार से रोकती है।

हल भी आप स्वयम सुझा रहे हैं कि इसे समझ लिया जाए तो शायद बदला जा सकता है।चोखेरबाली के लेखक आरम्भ से ही इसे समझने-समझाने की प्रक्रिया मे जुटे हैं !

ab inconvenienti said...
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ab inconvenienti said...

पर गरियाने से और अपराधबोध भरने से नहीं कोई नहीं बदलेगा. और जैविक अंतर तो रहेंगे ही, बस पुरुषों का महिलाओं के प्रति नजरिया बदल जाएगा. बदलने का आपका एजेंडा क्या है? खुद पुरुषों जैसा बनना? समन्वय या लड़ाई? बात साठ सत्तर से नारीवाद से आगे नहीं आ पा रहीं, मैंने आज तक हिंदी ब्लॉग जगत में ऐसी महिला नहीं देखी जो सत्तर के सिमोन दे बोवूर वाले जेंडर फेमिनिस्म से आगे बढ़कर कोई ज़मीनी और व्यावहारिक उपाय सुझाती हो. इसके लिए बहुत गंभीर अध्ययन चाहिए, जिसके लिए भारतीय नारीवादी तैयार नहीं हैं.

सच इतना सरल नहीं है, आप इस बारे में गंभीर और विस्तृत अध्ययन करेंगी तो आप नारीवादी नहीं रह जाएँगी ( फेमिनिस्ट डॉक्टर्स मिलना मुश्किल है ).

चोखेरबाली या हिंदी के नारीवादी ब्लोगों की नीयत बदलाव से ज्यादा मेल बैशिंग की है. आप सच में बदलने के ज़मीनी प्रयास करेंगी तो अधिकतर पुरुष सहयोग करेंगे. पर पहले पुरुषों के मन से यह निकालना होगा की महिला सशक्तिकरण यानि पुरुष अशक्तिकरण, यह होता है पुरुषों को आतंकित करने की कोशिश से, ऐसे में पुरुष सहयोग करें भी तो कैसे?

अब एजेंडा बनाएं, और उपाय सुझाएँ. पुरुषों को आतंकित करने की कोशिश उलटे 'नारीवाद' के लिए ही बाधक बन रही है.
(मुझे समझ नहीं आता की अगर मर्दवादी होना गलत है तो नारीवादी होना सही कैसे हो सकता है?)

सेक्स के बारे में खुद नारीवादियों का के स्पष्ट विचार नहीं हैं, कुछ हर प्रकार के सेक्स को यौन हमला मानती हैं, और हर पुरुष को बलात्कारी और पीडोफाइल. तो कुछ महिलाओं से नज़र मिला कर भी बात करने को भी यौन उत्पीडन. और कुछ आपकी तरह बात करती हैं, कुछ पोर्न और वेश्यावृत्ति को कानूनन मान्यता देने की मांग करती हैं.

सिमोन दे बोवूर तो पीडोफीलिया को अपराध की श्रेणी से हटाने की पक्षधर थीं, वे खुद भी एक पीडोफाइल थीं. वहीँ यूरोप की नारीवादियों की मांग है की पुरुषों के खड़े होकर पेशाब करने पर क़ानूनी प्रतिबन्ध लगे, क्योंकि इससे उनका पौरुष गर्व मजबूत होता है जो जेंडर समानता के खिलाफ है!

Arvind Mishra said...

हम ऐसे ही असहज एबी के मुरीद नहीं हैं -क्या बात करता है यह इंसान ! स्टैंडिंग ओवेशन !

ZEAL said...

If a woman is busy mopping , sweeping and cooking, she is considered as an ideal woman. But unfortunately if a woman is aware, empowered and dares to put her views...She is labeled as 'Feminist' and 'Man-hater'.

Irony !

@ ab -

Mard ki mardaangi, females ko neecha dikhane mein nahi hai maanyawar.

"Pyar se humko saraaho, to koi baat bane,
Sur jhukane se kuchh nahi hota, sur uthaao , to koi baat bane "

Janab AB...Shukriya ada kijiye uss Ishwar ka jisne iss dhartee ko behad jaheen aur haseen pariyon se nawaza hai ( Beauty with brains)

Khuda jab husn deta hai, nazaqat aa hi jaati hai...... Attitude comes inevitably in successful women.

Be grateful to God who has blessed this beautiful earth with the most beautiful creation called 'women '

< Smiles >

आर. अनुराधा said...

साड़ी और मिडरिफ की बात जाने दें ab साहब। यहां तो बात पुरुष से बातें करनेकी हो रही है। अगर मैं अब तक कभी देश से बाहर नहीं गई हूं तो इसका मतलब है कि मैं अपने देश की 'सांस्कृतिक' आदतों, तौर-तरीकों को जानती-समझती (और शायद मानती भी?!) हूं। ऐसे में भी मुझे उस जर्मन महिला का observation चोट पहुंचा गया क्योंकि मैं भी मानती हूं कि निगाहें न मिलाकर बात करना सांस्कृतिक लिहाज कतई नहीं, लड़कियों के भीतर डर और उपलब्ध समझे जाने के खतरे से जुड़ा है। लिहाज तो बड़ों, सम्मान पाने योग्य लोगों का किया जाता है, पर नजर न मिलाना तो सिखाया जाता है, बचपन से ही--- बच के रहना, बात न करना, दूर ही रहना.. आदि आदि

kirti said...

Ita not about "difference in culture". The new learning is her defence mechanism to keep the lewds at bay. to give the desperate guys a clear signal taht she is not available.
unfortunately , this defence tactics are good enough only for the people sitting on the fence but indian lusty man's charm for white skin still makes her vunerable.
this is what the indian male's image is today . and why not ? rape is teh national sport of this country , just check the statistics.

Asha Joglekar said...

अपने आप को बचा कर चलने में ही बुद्धिमानी है कुछ ऐसे कि काम भी होता रहै और फालतू के पचडे भी ना हों । जान बूझ कर जहर की परिक्षा क्यूं की जाये । हर बाहर से आने वाला व्यक्ती समाज़ को सुधारने तो नही आता । सोचने की जरूरत हमारे पुरुषों को है ।

सुजाता said...

एब जी,
यदि आप सोचते हैं कि स्त्रीवादी आन्दोलन पहले पुरुष के मन से ये-वो निकालने की कोशिश करे और फिर पुरुषों का सहयोग मिलेगा तो माफ कीजिए ऐसे कोई गान्धीवादी आन्दोलन आज की डेट में चलाने की कतई मंशा नही है...आपकी शर्तों के अनुसार कोई अपने लिए अपने जायज़ हक मांगने के लिए अपनाएगा तभी आप को उससे सम्वेदना महसूस होगी और आप ऐसी बेचारी , गिडगिड़ाती अबलाओं का की आवाज़ को अपना मर्दाना सुर देकर मजबूत बनाएंगे ..ऐसी प्रतीक्षा की हालत मे स्त्री आज नही है !!कारण साफ है कि जिन पुरुषों की आप बात कर रहे हैं वे केवल करुणा-दया-रहम् से स्त्री के साथ हो सकते हैं तर्क से नही !!!और स्त्री को दया नही चाहिए ! यूँ भी उत्पीड़क -समाज का प्रतिनिधि कभी उत्पीड़ित का साथ नही देता जब तक कि उसका देखने का नज़रिया ही बदल न जाए !

सुजाता said...

और एक बात यह भी,

आपके पास मानव शास्त्र ,बायलॉजीऔर जानेक्या क्या थ्योरियाँ हैं अपनी बात की पुष्टि के लिए ....हमारे पास किसी और की थ्योरी नही है ...अपने ही अनुभव हैं जिनसे थ्योरी तक पहुँचे हैं !!जो स्त्री स्वयम भोग रही हो उसे कहने के लिए उसे किसी थ्योरी के सहारे की ज़रूरत नही ,और कमाल की बात यह है कि फिर भी थ्योरी की बात की जाए तो उसे उसकी भी कोई कमी नही!

ZEAL said...

यूँ भी उत्पीड़क -समाज का प्रतिनिधि कभी उत्पीड़ित का साथ नही देता जब तक कि उसका देखने का नज़रिया ही बदल न जाए !


So true !

Btw Janab ABCD is hibernating...it seems.

अजय मूड़ौतिया said...

जर्मन छात्रा की बात अपमान के उस तमाचे की तरह है जो गाल पर पड़ता जरूर है लेकिन चोट आत्मा पर करता है। भारतीय संस्कृति में जहां स्त्री को सदैव सम्मान का पात्र माना गया, तेजी से बढ़ रही यह विकृति पीड़ादायक और मन को झकझोरने वाली ही है। विदेषी छात्रा की बात में निहितार्थ सामने लाने के लिए लेखिका को आभार।

अजय मूड़ौतिया said...

@ Mukti ji,
कृपया जानकारी दुरूस्त कर लें। जर्मन छात्रा उत्तराखंड गई थी झारखंड नहीं। उत्तराखंड और झारखंड में उतना ही अंतर है जितना कि केपटाउन और युगांडा में है। शेष बढ़िया लिखा। शुभकामनाएं..

अनुप्रिया के रेखांकन

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