Saturday, April 17, 2010

स्त्री का कोई धर्म नही होता !

प्रिय फिरदौस ,

आपके साहसी लेखन की मै मुरीद हो चली हूँ । पिछले दिनों ब्लॉग पर हो रहे धर्म-शादी -लव जिहाद के बवाल पर नज़र पड़ी । सच यह है कि "स्त्री का कोई धर्म नही होता ,हर धर्म ने उसके लिए सिर्फ और सिर्फ बेड़ियाँ ही बनाई हैं " । धर्म , ताकत और सत्ता यह एक ही पलड़े में साथ साथ झूलते हैं , पींगे बढाते हैं ।धर्म उसी को ताकत बख्शता है जिसके पास सामर्थ्य है। यह कहना कतई गलत नही होगा कि कोई भी धर्म स्त्री को समर्थ ,सबल, समान मनुष्य नही मानता ।इसलिएमेरे तईं यह बात सिरे से बेकार है कि कौन सा धर्म स्त्री के पक्ष मे है !! क्योंकि दर अस्ल कोई धर्म ऐसा है ही नही ।
मै इस बात को नकारती हूँ कि धर्म किसी ईश्वर या उसके प्रतिनिधि ने बनाया है । मै नकारती हूँ कि ईश्वर भी कोई है! पुरानी दलील ही सही पर सच है कि ईश्वर पुल्लिंग है , धर्म ग्रंथों के रचयिता भी पुरुष ही थे , उपदेश देने वाले पैगम्बर या महापुरुष ही थे। मुझे यह कहने मे कतई संकोच नही कि धर्म ऐसी संरचना है जिसे पुरुषों ने अपने हितों की रक्षा और सुविधाओं के लिए बनाया । इसलिए किसी धर्म मे स्त्री के प्रति समानता -सम्वेदनशीलता कहीं दिखाई नही देती।
यदि आस्था का ही सवाल हो तो मुझे निस्संकोच अपने जीवन मे सही पथ पर चलने के लिए धर्म से ज़्यादा लोकतांत्रिक मूल्यों मे आस्था है । धर्म आधारित किसी नैतिकता से अधिक मानवता और मानवाधिकारों में आस्था है ! कोई धर्म मानवीय नही है यदि वह समाज को बराबरी न देकर एक पद सोपानगत संरचना मे बदलता है और किसी खास वर्ग के लिए विशेषाधिकार सुनिश्चित करता है।
त्योहार , रीतियाँ -रिवाज़ , परम्पराएँ , व्रत -उपवास ,हिजाब या सिन्दूर ,मंगलसूत्र या चार शादियाँ .....अनेक उदाहरण हैं जो साबित करते हैं पुरुष के ईश्वर ने स्त्री को पुरुष की सुविधा और मन बहलाव के लिए बनाया और स्त्री का ईश्वर खुद पुरुष बन बैठा !
स्त्री न ज़मीन के लिए लड़ती है , न धर्म के नाम पर ! यह धर्म और सत्ता की लड़ाई पुरुष की है , जीत भी उसकी ही है । स्त्री या अन्य दमितों के लिए सिर्फ उपेक्षा है !
इसलिए मै "राज्य" और कानून की तरफ आस से देखती हूँ । हालांकि वे भी मर्दवादी सोच से बाहर नही निकल पाए हैं , लेकिन उम्मीद की ही बात हो तो शायद धर्म के मुकाबले उन पर अधिक विश्वास किया जा सकता है ।
धर्म से टकराए बिना स्त्री का भला होने वाला नही है , यह सबसे कड़ी लड़ाई है स्त्री के लिए । इसलिए प्रिय फिरदौस ,आत्मालोचन की इस प्रक्रिया में मेरी ओर से तुम्हें बहुत शुभकामनाएँ !

21 comments:

मनोज कुमार said...

निःसंदेह यह एक श्रेष्ठ रचना है।

Pratibha Katiyar said...

सही कहा, स्त्री का कोई धर्म नहीं होता. पुरुषों की सेवा को ही स्त्री धर्म (साजिश के तहत)कहा गया है. जब तक धर्म के बंधन को स्त्रियां नहीं तोड़ेंगी तब तक हालात नहीं सुधरेंगे.

Yugal said...

बहुत सही बात, धर्म का योगदान स्त्रियों के विकास में नहीं है,

फ़िरदौस ख़ान said...

आपने हमें चोखेर बाली की टीम में शामिल होने का निमंत्रण दिया... इसके लिए हम आपके तहे-दिल से शुक्रगुज़ार हैं... आपने सही कहा- औरत का कोई मज़हब नहीं होता... औरत सिर्फ़ औरत होती है... औरत होने के साथ ही वो इंसान भी है... और इस दुनिया से, समाज से इंसान होने के नाते जीने का हक़ चाहती है... वो कमज़ोर नहीं है... वो शक्ति है, वो जननी है... और जो जननी है वो तो कभी अबला हो ही नहीं सकती... जननी होने के नाते औरत ही कायनात में सृष्टिकर्ता के सबसे ज़्यादा क़रीब है...

चोखेर बाली औरतों के हक़ में औरतों के लिए बेहतरीन मंच हैं... चोखेर बाली की सभी बहनों को हमारा स्नेह और शुभकामनाएं...

आनंद said...

एक अच्‍छे ब्‍लॉग से परिचय करवाने के लिए धन्‍यवाद..

- आनंद

RAJENDRA said...

आदरणीय बहिन सुजाता इश्वर यदि पुल्लिंग है तो उसमे जो भी शक्ति है वह तो स्त्रीलिंग ही है ज्योति है तो स्त्रीलिंग है प्रीती है तो स्त्रीलिंग है करुना है तो स्त्रीलिंग है मानव में धर्म यदि है तो मर्यादा स्त्रीलिंग है आप एक शब्द की कल्पना के सहारे सत्ता को नकार रही हैं सत्ता ही सर्वोपरि है और उसे परमात्मा कहा जाये तो यहाँ परम आत्मा भी स्त्रीलिंग ही है उसे ही सबने नमस्कार किया है मूर्ख पुरुष या स्त्री कोई भी हो सकता है कृपा कर इसे उदगार समझे अपनी आलोचना नहीं
RP Sharma

सुशीला पुरी said...

सुजाता जी ! कितनी सच्ची बात लिखी आपने ,धर्म तो धारण करने की चीज है न की लादने की ,धर्म को यदि स्त्री या पुरुष लिंग से अलग मानकर सिर्फ महसूस किया जाय तो ज्यादा बेहतर होगा । धर्म की बंदिशों से बाहर आए बिना किसी का भला नही होगा ,सब यूँ ही लड़ते मरते रहेंगे ।

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" said...

अपने फायेदे के लिए और अपनी कमजोरी छिपाने के लिए ही इन्सान धर्म/मज़हब बनाया । शारीरिक जोर और पाशविक मनोवृति से आदमी ने औरत को अपने ग़ुलाम बनाने कि साजिश रची । पर वो यह भूल गया कि स्त्री ही उसकी जननी है, स्त्री ही शक्ति और स्त्री ही उसका परिपूरक भी है । मानव समाज पुरुष और स्त्री दोनों से बना है । आज विज्ञानं, ज्ञान और तकनीक बहुत आगे बढ़ चूका है लेकिन इन्सान कि सोच आज भी प्रस्तर युग में ही है । ख़ास कर हमारे देश के सन्दर्भ में तो ये बात बिलकुल सही है । आपकी यह रचना सराहनीय है !

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत सही बात सही तरीके से कही गयी है....स्त्रियों को कब? कहाँ? और किसने अहमियत दी है...सच है स्त्री का धर्म बस पति को परमेश्वर समझाने तक ही सीमित कर दिया है....अच्छी प्रस्तुति

Unknown said...
This comment has been removed by the author.
Unknown said...

धर्म स्त्रियों के लिए ही नहीं, पुरुषों के लिए भी त्याज्य है। धर्म दुनिया का सबसे बड़ा धोखा है। ईश्वर ने चाहा, तो हम मिल-जुल कर उसका बाजा बजा देंगे। - राजकिशोर

ghughutibasuti said...

मैं भी इस बात को बार बार कहती रही हूँ कि धर्म स्त्री के लिए नहीं बने वे पुरुष द्वारा पुरुष की सुविधा के लिए बने हैं।
घुघूती बासूती

mukti said...

मैं भी इस बात से पूरी तरह सहमत हूँ कि धर्म न सिर्फ़ स्त्रियों को बल्कि गरीबों को भी दबाकर समाज की पदसोपानीय व्यवस्था में नीचे पायदान पर बनाये रखता है...धर्म सिर्फ़ उच्चवर्गों के फ़ायदे के लिये है. दुनिया का कोई भी धर्म औरतों या दलितों का पक्षधर नहीं है.
फ़िरदौस के साहस की मैं भी प्रसंशा करना चाहूँगी कि वे धर्म के ठेकेदारों से तार्किक ढंग से लड़ रही हैं...हम सब इस लड़ाई में उनके साथ हैं.

Ashok Kumar pandey said...

"स्त्री का कोई धर्म नही होता ,हर धर्म ने उसके लिए सिर्फ और सिर्फ बेड़ियाँ ही बनाई हैं''

पूरी तरह सहमत

अर्चना said...

meri jaankaari men shaayad ek bhi wrat aisa nahin hai jo stri ke dirgh jiwan ke liye kiaa jata ho. kya yah parampara yah bataane ke liye nahin hai ki stri ko hi har haal men puroosh ke sanrakhsan ki aawyasakata hai? sach hai"dharm se takaraaye bina stri ka bhala hone waala nahin hai."

अजय कुमार झा said...

हमेशा की तरह पहलू को एक अलग दृष्टिकोण से देखा और दिखाया आपने । मैं तो पहले भी अपना ये मत व्यक्त कर चुका हूं कि आज समय आ गया है कि धर्म जाति आदि सभी चीजों तो पाताल में गाड देना चाहिए । मगर एक पक्ष को इस बहस में भी अनदेखा किया आपने , जहां तक मेरी जानकारी है कि हिंदू धर्म में जितने देव हैं उतनी ही देवी और माताएं हैं , और सभी को एक विशिष्ट शक्ति का प्रतीक माना गया है । हां इनकी उत्पत्ति में पुरुषवादी सोच का विश्लेषण जरूर ही दिलचस्प होगा । आभार , आपको पढना एक अलग अनुभव रहता है हर बार

Mohammed Umar Kairanvi said...

आपसे अनुरोध है कमेंटस माडरेट लगालो फिर झूठ ही कह सकोगी मुझे ध‍मकियां दी जा रही हैं, सच कहने की आवश्‍यकता ही नहीं रहेगी अपने आप दूसरों को दिखायी देंगी ध‍मकिया

Sanjay Grover said...

मां बचपन में ब्रहमराक्षस नामक किसी विलेन की कहानी सुनातीं थीं। कहीं उसका असली नाम धर्मराक्षस तो नहीं था ! स्त्रियों की यथासंभव दुर्दशा तो इसने की ही है, अपनी सोच रखने वाले और अपनी तरह से जीने वाले पुरुषों का भी कम ख़ून नहीं पीता यह ...

रेखा श्रीवास्तव said...

सुजाता जी,

सबकी बात को अपने शब्दों में ढाल कर जो बात कही है, वह शत प्रतिशत सही है. अपनी जगह और अपनी लड़ाई की बागडोर जब तक खुद नहीं संभाली तब तक जंग जीती कहाँ जाती है? जिसने हिम्मत की वह काल और समाज से डरा नहीं, अपनी हिम्मत से इतिहास लिख गया. रानी लक्ष्मी बाई ने उस समय साहस किया था. तब नारी की स्थिति क्या थी? अब तो बहुत से रास्ते खुल चुकेहैं.

@अजय जी.
आपने सही कहा है, देवताओं के साथ देवियाँ भी हैं और वह भी देवताओं द्वारा पूजिता भी रही हैं किन्तु अब देवता नहीं रहे हैं क्योंकि समाज की सत्ता के ठेकेदार तो आज भी हाशिये में रखने के पक्षधर हैं. नहीं तो सिर्फ ३३ pratishat आरक्षण के लिए संसद में यों अपमान न होता. वैसे आपका मत सही हैकि जाति, धर्म और वर्ग को जमीदोश कर देना चाहिए. सिर्फ और सिर्फ एक ही पहचान मानव के रूप में हो.

Dr. Amar Jyoti said...

सही,सार्थक विवेचन।

Asha Joglekar said...

सही बात ।

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