Tuesday, April 20, 2010

वर्ना रोज़ कोई न कोई श्रीधरम अफसोस करेगा......

"माँ कहती है कि भगवान की लीला देखो । अपने गाँव के दुखी मियाँ की चौदह साल की बेटी सबीना की दो-ढाई वर्ष पहले शादी हुई थी ।वह गर्भवती हुई और प्रसव के दौरान ही चल बसी ।दो महीने के भीतर ही दुखी मियाँ ने अपने दामाद का गम दूर करने के लिए अपनी दूसरी बेटी रुबिना का निकाह उससे कर दिया ।जैसे प्रसव के दौरान सबीना मरी थी वैसे ही रुबिना भी अपने नवजात बच्चे सहित अल्लाह को प्यारी हो गयी।मैने माँ से पूछा कि दुखी ने डॉक्टर को क्यों नही दिखाया । माँ बोली - "कितने डॉक़्टर हैं तुम्हारे गाँव-जवार में?अगर डॉक़्टर होते तो मै ज़िन्दगी भर अस्पताल-अस्पताल भटकती ही रहती ।" कई ऑपरेशन झेल चुकी माँ अब शायद ओपरेशन नही कराना चाहती थी तभी डॉक्टर चिल्लाई - 'पता नही है तुमको कि कैंसर है ? सर्जरी नही करवाओगी तो कैसे झेलोगी इस बीमारी को ।।अभी तो खून रिस रहा है धीरे धीरे कीड़े पड़ जाएंगे ।बदबू फैलेगी।"
......
यह लेख लिखते हुए(अंतिम अरण्य में , जनसत्ता, 19 अप्रैल 2010) श्रीधरम बताते हैं कि एक सर्वेक्षण के अनुसार भारत में प्रति सात मिनट में एक औरत गर्भाशय के मुँह के कैंसर से मरती है। अब इस बीमारी का टीका उपलब्ध है। काश मेरी माँ और नानी यह टीका लगवा चुकी होतीं क्योकि नानी भी इसी बीमारी से मरी थी।

यह सच है कि सर्विकल कैसर (cervical cancer) अक्सर चुपचाप आता है और स्त्रियों के लिए मौत का कारण बनता है।कम उम्र के विवाह , कम उम्र मे गर्भधारण,बार-बार गर्भधारण (अक्सर बेटे की चाह में) के साथ साथ् और भी कई अन्य वजहों से।HPV वायरस जो बहुत आम है इस रोग का कारण बनता है और कभी भी किसी स्त्री को हो सकता है। लेकिन जो स्थिति चिंता मे डालती है वह यह कि स्त्री-स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही गाँवों मे अत्यधिक है। उस पर से स्वास्थ्य सुविधाएँ न के बराबर । अन्यथा श्रीधरम की माँ को यह कहने की आवश्यकता न पड़ती कि अगर डॉक़्टर होते तो मै ज़िन्दगी भर अस्पताल-अस्पताल भटकती ही रहती ।ग्रामीण समाज -परिवारों की शक्ति -संरचना मे स्त्री का स्थान सम्मानित मनुष्य का नही है ।जबकि वह न केवल परिवार के सभी काम करती है , बच्चे जनती और पालती है वरन खेतों मे भी अपनी सामर्थ्य -भर परिश्रम करती है।अपनी छोटी छोटी बीमारियों को छिपाती है , सहती चुप रहती और करती चली जाती है क्यों ? इसी लेख के अनुसार - "कोई माँ कैसे अपने बच्चों का पेट काटकर अपना इलाज करवा सकती है?"
शहरों में जागरूकता है । लेकिन क्या यहाँ भी पूरी तरह से स्त्रियाँ खुद के स्वास्थ्य और उनके परिवार वाले अपने 'कुलदीपकों' की माँओं के स्वास्थ्य के प्रति सचेत हैं ? नही ! क्या वे जानते हैं कि सर्विकल कैसर कितना आम है और क्या वे यह भी जानते हैं कि इस बीमारी को रोका जा सकता है और इस बीमारी का टीका अब बाज़ार मे उपलब्ध है ? जहाँ गरीबी , अशिक्षा , जहालत नही है क्या वहाँ भी पति , पिता , भाई अपनी बहनों , माताओं , पत्नियों के स्वास्थ्य के लिए सचेत हैं ? और पढी-लिखी , समझदार स्त्रियाँ भी खुद क्या इसकी जानकारी हासिल कर लाभ लेना चाहती हैं ? यदि नही , तो रोज़ कोई न कोई श्रीधरम अफसोस करेगा कि काश ! वह टीका मेरी माँ , नानी या पत्नी भी लगवा पाती !

8 comments:

अजित गुप्ता का कोना said...

सही बात है, लेकिन चिकित्‍सा सेवाओं की पेचीदगियों के कारण कई बार लोग घबरा जाते हैं और अस्‍पताल में जाना ही नहीं चाहते।

Unknown said...

महिला स्वास्थय के के लिये भुत जागरूकता और प्रयास की जरूरत है. सरकारे शायद कुछ भी नही कर पा रही है. एक आन्दोलन की जरूरत है.

mukti said...

सर्विकल कैंसर ही नहीं गाँवों की औरतों में पेट का कैंसर भी बहुत आम है, जिसके बारे में कोई जान ही नहीं पाता, ये बात अलग है कि ये केवल औरतों हे नहीं पुरुषों को भी होता है.
सर्विकल कैंसर धीरे-धीरे महामारी जैसा रूप लेता जा रहा है और गाँव में अधिकांश लोग इसके बारे में जानते ही नहीं. इसके लक्षणों को आम औरतों की बीमारी समझ लेते हैं. और जिस घटना का जिक्र ऊपर आया है, वैसा तो बहुत होता है..कम उम्र में लड़कियों का विवाह, माँ बनाने की जल्दी और दो बच्चों के बीच कम
अन्तर ...बहुत आम बात है. मैंने अपने गाँव में भाभी लोगों के शरीर की दुर्गत होते देखा है .

ZEAL said...

Lack of education and awareness is taking its toll but our government is trying its best. Situation will definitely improve.

Hoping for an aware , happy and healthy nation.

रेखा श्रीवास्तव said...

आज भी औरत का स्वास्थ्य तब देखने की फुरसत मिलती है लोगों को जब की वह बिस्तर से उठाने लायक नहीं हो जाती, नहीं तो आज भी आम घरों में होता है. ये जागरूकता उसके मामले में किसी में नहीं जागती.
गर्भवती को खाने की जरूरत नहीं होती. अगर पैरों में सूजन है तो ऐसा तो होता ही है, इसके कारणों में जाने की किसी को जरूरत नहीं होती. अगर वह मर भी जाती है तो दूसरी मिल जायेगी. पढ़े लिखे लोगों की बात करती हूँ. अगर तबियत ठीक नहीं रहती तो जाती क्यों नहीं डाक्टर के यहाँ? आखिर जिनकी वह सारे दिन खिदमत करती है , वे क्या सिर्फ निर्देश देने के लिए होते हैं? आप खुद जागरूक हैं तो दूसरों को भी कीजिये. अब हम नारी जाति के लिए खड़े हैं तो कुछ कर ही सकते हैं.

आर. अनुराधा said...

औरतें, खास तौर पर हिंदुस्तान और आस-पास के देशों में, अपनी सेहत को लेकर सचमुच इतनी नासमझ, लापरवाह और तवज्जो न देने वाली हैं कि उसके नतीजे देख-देख कर शर्म आने लगती है। सुजाता, आपने अच्छा मुद्दा उठाया।

हां, सर्वाइकल कैंसर भारतीय महिलाओं में सबसे आम है और World Health Organisation के अध्ययन के मुताबिक हर साल 1,32,082 महिलाओं में इस बीमारी की पहचान हो पाती है और इनमें से 74,118 मर जाती हैं। लेकिन एक और महत्वपूर्ण मसला ये है कि इस वैक्सीन की पहुंच कहां तक होगी, इसकी जानकारी, खरीद पाने की क्षमता जैसे अनगिनत सवाल हैं। इन सबसे ऊपर यह सवाल कि भारत में इसका ट्यालय अभी चल ही रहा है, ऐसे में अपने यहां इस वैक्सीन को प्रमोट करना कितना सही है? सुजाता, आपने जो लिंक दिया है, उसमें का एक हिस्सा है-
"Routine vaccination is recommended for all 11 and 12 year old girls.
The vaccination series can be started for girls as early as age 9.
Ideally, the vaccine should be given before first sexual contact, but females up to age 26 who are sexually active should still be vaccinated.
Vaccination is recommended for girls and women ages 13 to 26 who have not been previously vaccinated. However, a decision about whether to vaccinate a woman aged 19 to 26 should be made based on an informed discussion between the woman and her healthcare provider regarding her risk of previous HPV exposure and potential benefit from vaccination.
लेकिन हमारे देश में इन तथ्यों को दरकिनार कर हर उम्र की महिलाओं के लिए वैक्सीन को रामबाण दवा की तरह देखा जा रहा है। यहां तक कि कई सरकारी अस्पतालों में भी इसके विज्ञापन लगे निल जाते हैं जिसमें एक वयस्क, युवती कहती है कि मैंने यह टीका लगवाया है। यह सब भ्रामक और कतई गलत है। सबसे पहले तो डॉक्टरों और टीका लगवाने वालों को इसकी पूरी जानकारी दी जानी चाहिए। वरना खम्मम (आंध्र प्रदेश) के आदिवासी इलाकों में किशोरियों के मरने जैसी दुर्घटनाएं दोहराई जाती रहेंगी।

इस बारे में मेरा एक लेख नवभारत टाइम्स में छपा था, जिसे अपने ब्लॉग पर भी लगाया। लिंक यह रहा-
http://ranuradha.blogspot.com/2009/11/blog-post_07.html सर्वाइकल कैंसर की वैक्सीन कितनी कारगर होगी

sudama said...

bahut achchh hai . padhkar dil bhar gaya

Asha Joglekar said...

JANKARI KA DHANYWAD .

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