Monday, May 3, 2010

चुड़ैल

- अनामिका


"क्योंकर हुआ करते हैं उलटे पाव चुड़ैलों के ?
क्योंकर चुड़ैल बन जाती हैं
जच्चा-चर में टन्न बोल गयी औरतें? "

डरते डरते मैने नानी से पूछा था!

नानी थी फूलों की टोकरी!
जब भी हम घबराते उसमे ही ढूह लगाते।

ज़्यादातर प्रश्नों के उत्तर थे उसी टोकरी में
लेकिन जिन प्रश्नों के उत्तर नही थे
यह प्रश्न उनमें ही होगा
क्यो6कि उसने प्रश्न सुनते ही
नाक की नोंक से उठाया चश्मा
अपनी कमर सीधी की
और सुतरी खींच ली
मुंह के बटुए की !

ज़िन्दगी ऐसी कटी
मुझे रह रह कर आती रही याद नानी
और कभी छ्ट्ठी का दूध भी


अनुत्तरित प्रश्नों की पोटली
तकिए के नीचे धरे
एक दिन मै भी मरी,
और मरी भी कहाँ ?
जच्चा-घर में ही!
एक साथ ही मिल गए मुझको
मेरे उन प्रश्नों के उत्तर
जब उलटे पाँव लौट आई मैं दुनिया में!
लौटना ज़रूरी था
और ज़रूरी था देखना-
मेरी वह दुधमुँही सलामत तो है न!
दीए पर ठीक से पड़ा है कि नही पड़ा
उसका कजरौटा !

हाँ ,उलटे हैं मेरे पाँव,
पर दुनिया मे मुझको दिखा दो कोई भी औरत
जो उलटे पाँव नही चलती,
व्यतीत मे जिसके
गड़ा नही कोई खूँटा!
भागती नही औरतें-
लौट आती हैं उलटे पाँव,
अमराई के खाली झूले और पालने
लू के थपेड़ों से नही झूलते
ये ही झुलाती हैं उन्हें-
हर बार उलटे पाँव !

('हँस' ,मई 2010 से साभार्)

6 comments:

Unknown said...

वेहतरीन रचना

रेखा श्रीवास्तव said...

औरत ही तो है जो ममता, प्रेम, वात्सल्य और दायित्वों से जुड़ी है, तभी तो उलटे पैर वापस आने कि बात सिर्फ और सिर्फ उससे ही जुड़ी है.
कविता के गर्भ में छुपी सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता .

Amitraghat said...

"मर्मस्पर्शी कविता...."

सुशीला पुरी said...

बहुत ही पीड़ादाई कविता ......

राजकुमार सोनी said...

एक संवेदनशील रचनाकार ही इतने महीन तरीके से जीवन को देख सकता है। अच्छी रचना के लिए बधाई।

Asha Joglekar said...

डच्चाघर में चल बसेगी तो बच्चे के ेखातिर उल्टे पांव ही तो लोटेगी ।

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