Monday, May 3, 2010

बलात्कार के मामले में सबूत के तौर पर पीड़िता का बयान काफी है

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि बलात्कार के मामले में, खास तौर पर अगर पीड़ित निरक्षर है तो उसके बयान को पूरी तरह माना जाए। आरोपी को दोशी करार देने के लिए पीड़ित के बयानों की सत्यता की जांच करने की जरूरत नहीं है। साथ ही कहा गया कि अगर मामला देर से दाखिल कराया गया है, तब भी उस महिला के बयान को पूरी तरह स्वीकार किया जाए।

न्यायमूर्ति पी सदाशिवम और न्यायमूर्ति आर एम लोढ़ा की बेंच ने फैसला देते हुए कहा कि किसी स्वाभिमानी महिला के लिए बलात्कार का बयान देना अपने आप में अत्यंत अपमानजनक अनुभव है। और जब तक वह लैंगिक अपराध की पीड़ित नहीं होगी, वह वास्तविक अपराधी के अलावा किसी पर आरोप नहीं लगा सकती।

कर्नाटक के दक्षिण कनारा जिले की दो खान मजदूर बहनों के साथ 2004 में हुए बलात्कार के मामले में फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह बात कही। इस मामले में घटना के 42 दिन बाद रिपोर्ट लिखाई गई थी, जब तक मेडिकल सबूत नष्ट हो चुके थे। दोनों महिलाओं का कहना था कि उन्हें धमकाया गया था और उन्हें सहारा देने के लिए परिवार में कोई पुरुष सदस्य भी नहीं था। इसलिए उन्हें रिपोर्ट लिखवाने में देरी हुई। उन बहनों की मां ने भी बहनों के पक्ष में गवाही दी।

2 comments:

दिनेशराय द्विवेदी said...

सुजाता जी,
इस निर्णय को मैं ने पढ़ा नहीं है लेकिन जो लिंक आपने दिया है उस पर जा कर समाचार पढ़ा है। समाचार कहीं यह नहीं कहता कि बलात्कार की शिकार स्त्रियों के बयान की सत्यता की जाँच जरूरी नहीं है। वह तो जरूरी है और उस की जाँच तो उस महिला के बयानों के दौरान उस से हुई जिरह से हो जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि उस बयान के कोरोबोरेशन की आवश्यकता नहीं है अर्थात किसी अन्य साक्ष्य या बयान के समर्थन की आवश्यकता नहीं है। दूसरी ओर यह भी कहा गया है कि कोई भी स्वामिमानी महिला ऐसा मिथ्या बयान नहीं दे सकती। अर्थात किसी महिला के ऐसे बयानों को सही समझने के लिए यह साबित होना भी आवश्यक है कि महिला स्वाभिमानी है अथवा नहीं।
वैसे सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्णय बहुत सोच समझ कर दिया है। क्यों कि बहुत से ऐसे मामले वास्तव में अदालतों तक पहुँचते हैं जिस में पारिवारिक झगड़ों और अन्य कारणों से महिलाओं से इस तरह के मिथ्या मुकदमे दर्ज करा दिए जाते हैं। लेकिन ऐसे मामले निचली अदालत में ही असफल भी हो जाते हैं।

Asha Joglekar said...

अधिकतर मामलों में जब तक वह लैंगिक अपराध की पीड़ित नहीं होगी, वह वास्तविक अपराधी के अलावा किसी पर आरोप नहीं लगा सकती ।

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