Tuesday, May 4, 2010

निरुपमा के बहाने अब एक बार अपने भीतर झांकें, प्लीज़!

स्त्री का कोई धर्म नहीं होता और धर्म ने उसके लिए सिर्फ बेड़ियां बनाईं हैं, और धर्म के ठेकेदार और पितृसत्ता के चौकीदार हाथ मे हाथ मिलाए सत्ता की सीढियाँ चढते हैं और मिल बाँट कर 'धर्म विमुख औरतों' को सबक सिखाते हैं, और....सब मंजूर, सब सही। पर हम कब तक पुरुषों से मुखातिब रहेंगे? क्या अब समय नहीं आया कि एक बार अपनी तरफ नजरें घुमाएं, अपने भीतर देखें। एक बार!

निरुपमा का मामला लें तो इससे ज्यादा नृशंस, अमानवीय कुछ हो नहीं सकता था कि एक पढ़े-लिखे शहरी परिवार के लोग अपनी ही पाली-पोसी बेटी को मार दें चाहे किसी कारण से हो। गांवों में सामाजिक दबाव और मजबूरी, जकड़न ज्यादा होती है। पर शहर के लोग भी अपनी मानसिक जकड़न से नहीं निकल पाए हैं।

लेकिन निरुपमा अपनी मौत के पहले की स्थिति में किसी भी दिन मुझे मिलती तो कुछ स्वाभाविक सवाल मेरे मन में हैं जो मैं उससे करती। अपनी शादी का फैसला खुद करना और उस पर अड़ने की हिम्मत रखना वाकई साहस का काम है। पर बिन ब्याही मां बनना उसका ‘फैसला’ कतई नहीं था, यह मेरा सोचना है। और उसकी इस स्थिति का गुणगान आज उसकी हिम्मत बताकर किया जा रहा है, पर उसके जीते जी सब उसे क्या सलाहें देते? हम जो पुरुषों पर लगातार दोष धरती हैं, खूब तर्क-वितर्क करती हैं, मौके पर खुद क्या करती हैं, और किसी को ऐसे मौकों पर कोई सहारा, दिलासा दे भी पाती हैं?

मैं क्रांतिकारी नहीं हूं। मैं उससे सबसे पहले पूछती कि ये क्या हाल बना लिया? क्या अपना इतना भी ख्याल नहीं? क्या तुम सचमुच, जानबूझ कर बिन ब्याही मां बनना चाहती हो, ऐसे सामाजिक माहौल में? और मुझे लगता है कि वह इससे इनकार करती कि उसने चाह कर यह हालात अपने लिए बनाए हैं। यह उसकी हिम्मत नहीं, कायरता थी।

एक तो, वह पढ़-लिख कर भी खुद अपने शरीर के बारे में कुछ नहीं जानती। वह चाहती है, पर नहीं जानती कि इसका क्या करे? इस शरीर का सम्मान किस तरह करे। दुनिया भर की खबरें, लेख उसने पढ़े, एडिट किए, पर उसे इतना भी नहीं पता था कि अपने को इस हालत तक पहुंचाने से रोकने के कई तरीके हैं, और सब सहज और जायज है। वह दिल्ली शहर में आर्थिक रूप से आत्म निर्भर, अपने रोज के फैसले खुद करने वाली आज़ाद लड़की थी। और वह उसका प्रेमी भी, जो कि कोई अनपढ़ गंवार नहीं था और उसे इतनी अंतरंगता से जानता था, जो कभी उसकी हालत जान नहीं पाया तो क्या इस आशंका के बारे में सोच कर उसे आगाह भी नहीं कर पाया?

अच्छा, माना कि वह खुद इतनी हिम्मत नहीं रखती थी, डर गई थी, तो फिर स्वाभाविक था कि अपने उस साथी पर तो इतना भरोसा करती और उसे अपनी इस हालत के बारे में बताती तो सही। उसने क्यों ऐसा नहीं किया, वह भी कन्फर्म होने के कोई पांच हफ्ते तक भी? क्या उसे उस पर भरोसा नहीं था? क्या वह उसे ‘परेशान’ नहीं करना चाहती थी? अगर यह भी नहीं करना था तो फिर अफसोस तो नहीं करते रहना था कि इस समय जिंदगी सबसे बुरे दौर से गुजर रही है-

(NIrupama Pathak on Facebook: Deplorable, disgusting,disgrace ful, distructible, diminishing, dam it, deteriorating are the few derogatory words that I want to associate with my life at this juncture. March 26 at 12:00 am 2010- यह लगभग वही समय होगा जब उसे अपने गर्भवती होने का पता चला होगा)

कुछ तो करना था निरुपमा, कुछ तो!

अब निरुपमा नहीं है, पर हम अपने शरीरों का क्या कर रहे है? हममें से कितने हैं जिन्हें इच्छाओं और सपनों का तो छोड़ ही दे, यह भी पता है कि देह का कौन सा दर्द मीठा है, बर्दाश्त करने लायक है और कौनसा कड़वा-कसैला?

19 comments:

Admin said...

शायद यह गलत डोर कों पकड़ कर खींचने का प्रयास है. निरुपमा की आत्मा कों प्रभु शांति दे और उसे न्याय.

honesty project democracy said...

समाज में सत्य और न्याय के प्रति लगाव को बढाकर ही इस दुखद स्थिति को रोका जा सकता है /

सुजाता said...

आपकी बात बिलकुल सही है। हम यह नही जानते कि निरुपमा के लिए ऐसे हालात क्योंकर बने, लेकिन यह जानते हैं कि निश्चित रूप से उसका पालन इस भरोसे के साथ नही हुआ था कि माता- पिता उसके साथ हर मोड़ पर हैं।यह बड़ी बात है।कितनी लड़कियाँ हैं जो इस तरह से पाली-पोसी ही नही जातीं कि वे ऐसे नाज़ुक मोड़ पर फैसले ले सकें।आप और मैं भी शायद उम्र के इस मुकाम पर आकर समझ पा रहे हैं कि स्त्री के इर्द गिर्द बुना गया दुष्चक्र क्या है, क्यों है?
यह पुरुष से मुखातिब होना भर नही है कि हम धर्म के स्त्री के खिलाफ हथियार की तरह इस्तेमाल होने की बात कर रहे हैं , यह खुद अपनी डीलर्निंग के लिए बेहद ज़रूरी है कि हम स्त्रियाँ यह समझें कि किन बातों पर ईमोशनल नही होना है क्योंकि उनका अस्तित्व स्त्री को दबाने के लिए ही है।
यह कहा जा सकता है कि ऊंची शिक्षा प्राप्त करने वाली लड़की भी वक्त पड़ने पर तार्किक तरीके से ,धर्म की बनाई वर्जनाओं और नियमों से मुक्त होकर फैसले नही ले पाती ।
इसलिए बेहद ज़रूरी है कि अपने 'बनने'को वे समझें और उलटने का साहस जुटाएँ।यह तब तक नही होगा जब तक माता-पिता उनका पालन पोषण परायी अमानत या अपनी जागीर की तरह करते रहेंगे।
इस नज़र से मै हमारी शिक्षा पद्धति मे भयंकर दोष मानती हूँ कि वह इस एक जेन्डर के मोर्चे पर अब भी नाकाम साबित हो रही है!
कौन सा दर्द मीठा है, बर्दाश्त करने लायक है और कौनसा कड़वा-कसैला----यह एक 20 -22 साल की या कई बार उससे भी छोटी लड़की को कौन सिखाएगा-समझाएगा ?(धर्म, समाज के नाम पर डराए बिना,लोग क्या कहेंगे के खौफ के बिना , उसके शरीर के लिए क्या सही नही है यह तर्क देकर )
पैदा होने से बुढाने तक समाज उसके लिए मायाजाल ही तो बुनता है , कितने ही लोग यह चाहते होंगे कि उनकी बेटी 'चोखेरबाली 'जैसा कुछ पढ न ले ,सीख न ले !!ऐसे में जब तक हमारी खुद की मंशा साफ नही है निरुपमाएँ या तो आत्महत्या करेंगी या उनकी हत्या होगी !और खुशनसीब रहीं तो आपकी मेरी तरह ब्लॉगिंग करेंगी और अपनी आपबीती ,किताबों और ऑब्ज़र्वेशन से सीखा हुआ लिखेंगी !

Rangnath Singh said...

हम कैसे गुनहगार हैं हमसे न पूछिए

आर. अनुराधा said...

सही सुजाता, पर मैं कह रही हूं कि इन सबके बाद भी, अपनी जिम्मेदारी खुद उठाना हम कब शुरू करेंगे। फिर सिर्फ इसलिए कि उसके पालन में माता-पिता ने भरोसा नहीं दिलाया..., एक पहलू है। पर उससे अलग भी तो उसका एक व्यक्तित्व, अपना सर्कल, समाज, समझ सब था न!

Rangnath Singh said...
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रेखा श्रीवास्तव said...

"पर उपदेश कुशल बहुतेरे" वाली कहावत यहाँ भी लागू होती है. हममें से कितने हैं, जो इस स्थिति को सहज स्वीकार कर सकते थे. इसके लिए साहस लड़की को कौन देता? उसके ठोस निर्णय लेने लायक कौन बताता? सही और गलत का निर्णय व्यक्ति खुद ही लेता है. जब हम लड़कियों को आत्म निर्भर बनना चाहते हैं कि अपने पैरों पर खड़े होकर खुद को मजबूत करें फिर उनको ये स्वतंत्रता क्यों नहीं देते कि अगर वे इस तरह कि स्थिति में फँस जाती हैं तो हम उनके उससे निकालने के लिए प्रयास भी करेंगे. जीवन देना इतना आसन नहीं होता? अगर सही मार्गदर्शन मिले तो जीवन तो दांव पर लगने कि जरूरत नहीं होती.
रही बात समाज की तो जब इंसान मुसीबत में होता है तो समाज अगर खड़ा नहीं होता, सिर्फ कटाक्ष करना जनता है. आपका जीवन आपका है और उसे आपको ही जीना है. हमारे फैसले हमें ही शर्मिंदा या गौरवान्वित करते हैं. लड़की के पीछे खड़े होने का अहसास तो दिलाइये, वह लड़ कर दिखा देगी. निरुपमा अकेली नहीं थी, उसके और भी रास्ते थे पर उसने निर्णय बहुत दबाव में आकार लिया या फिर उससे जीने का हक चीन लिया गया.
इतने धर्म और संस्कृति के अनुयायी तो लड़की को पैदा होते ही ख़त्म कर दें या फिर उनको घर में ही कैद रख कर अपनी इज्जत कि दुहाई देते हुए किसी से भी ब्याह कर अपने धर्म को पूरा कर उससे स्त्री धर्म पूरा करने देने कि शिक्षा भर देते रहें.

आर. अनुराधा said...

"20 -22 साल की या कई बार उससे भी छोटी लड़की को कौन सिखाएगा-समझाएगा ?(धर्म, समाज के नाम पर डराए बिना,लोग क्या कहेंगे के खौफ के बिना..."
अगर इस 'छोटी' (मैं इसे पर्याप्त परिपक्व उम्र मानती हूं) उम्र में उसने सही-गलत के दूसरे पाठ पढ़े थे, (और जरूर पढ़े होंगे, समाज से, घर से- प्रत्यक्ष नहीं तो अप्रत्यक्ष) तो फिर उसने अपने लिए सब कुछ 'सही' क्यों न चुना। और अगर समाज के 'गलत' को सही माना तो उसकी जिम्मेदारी लेने में क्यों घबराई? यह मैं निरुपमा से नहीं सबसे पूछ रही हूं, जो इस तरह सोचते और करते हैं। निरुपमा के प्रति मेरे मन में पूरा आदर है।

Rangnath Singh said...

अनुराधा जी आप की बहस को देखकर ऐसा लग रहा है जैसे निरुपमा ने आत्महत्या की है... !!

जबकि अब तक की खबरों से यह साफ हो चुका है कि उसकी हत्या की गई है।

आर. अनुराधा said...

कतई नहीं। मैं पूरी तरह कनविंस्ड हूं कि यह हत्या, ऑनर किलिंग का मामला है। और जैसा कि सुजाता ने भी कहा कि कोई रास्ता छोड़े बिना उस अंधे मोड़ तक पहुंचाना अपने आप में हत्या से कम नहीं।

फिर भी, मेरा कहना हत्या-आत्महत्या से आगे, उसके कारणों की, एक, बल्कि दो जानें बचाने की संभावनाएं तलाशने से प्रेरित है। और साथ में यह भी, जो मैं हमेशा कहती हूं, कि खुद को, अपने भौतिक शरीर को उसकी छोटी-छोटी बातों को ही हम नहीं जानते, नजर-अंदाज किए चले जाते हैं तो फिर बड़ी जिम्मेदारियां कैसे उठा पाएंगे? और इस अज्ञानता में स्त्रियां ही नहीं, भारतीय पुरुष भी बराबर के साझीदार हैं। हालांकि इसके कारण भी अँधविश्वास, धर्म, परंपराओं, रूढ़ियों, आदि से टकराते हैं।

rashmi ravija said...

पोस्टमार्टम रिपोर्ट की वजह से,आज हमे निरुपमा की इस स्थिति का पता चल गया .जबकि कई बार समाज में इस तरह की स्थितियों से लडकियां गुजरती हैं . मैं इसकी वकालत नहीं कर रही...पर निरुपमा को दोषी ठहराने के पहले इन संभावनाओं पर गौर करना चाहती हूँ,कि निरुपमा को पता था कि उसकी शादी प्रियाभान्शु से होने वाली है. इसलिए सीमा का अतिक्रमण करने से वह नहीं हिचकी. यह सही नहीं हैं....पर आज के लिव-इन-रिलेशन के जमाने में इसे पूरी तरह गलत भी नहीं ठहरा सकते.
वह पढ़ी लिखी, अपने फैसले लेने वाली,जागरूक लड़की थी पर कभी कभी ऐसी स्थितियों में ऐसी लड़कियां भी वे अपनेआप को घिरा पाती हैं. फिल्म 'पा' की नायिका तो मेडिकल स्टुडेंट थी,फिर भी अनब्याही माँ बनान पड़ा उसे. और फिल्म की यह घटना कोरी कल्पना नहीं थी. कई बार, उच्च शिक्षित ,ऊँचे पद पर काम करने वाली लडकियां भी ऐसी अनचाही स्थितियों से गुजरती हैं. सवाल यह है कि अगर ऐसी स्थिति आ ही जाए फिर उसका सामना कैसे किया जाए? और निरुपमा ने सही तरह से उस स्थिति को संभालने की पूरी कोशिश की. वह अपने माता-पिता को मनाने के लिए ही घर गयी.जैसा प्रियाभंशु बता रहा है कि ६ मार्च को इनलोगों ने शादी की तारीख तय की थी. पर फिर निरुपमा ने कहा,एक और कोशिश करती हूँ ,माता-पिता को मनाने की.और उसके मन में कितना गिल्ट होगा,इसे समझा जा सकता है .कई लोगों को देखा है वे अंत तक चाहते हैं कि माँ-बाप मान जाए. और निरुपमा सपने में भी नहीं सोच सकती थी कि अपने जन्मदाताओं के हाथों मारी जाएगी.
किसे पता है, कि प्रियाभंशु सच बोल रहा है या झूठ? हो सकता है उसे निरुपमा ने बताया हो और वह शादी के लिए भी तैयार हो.अगर उसके माता-पिता अपनी सहमति नहीं भी देते और उसे वापस दिल्ली आने देते तो हो सकता था वे प्रेमी युगल शादी कर के ख़ुशी की ज़िन्दगी बिता रहें होते.
लड़कियों को सचेत रहना चाहिए,अपने शरीर का सम्मान करना चाहिए पर अगर गलती से कभी ऐसा कुछ हो जाता है...तो उसका हल ना हत्या है,ना आत्महत्या .

राजन said...

rashmi ji se puri tarah sahmat

आर. अनुराधा said...

"लड़कियों को सचेत रहना चाहिए,अपने शरीर का सम्मान करना चाहिए पर अगर गलती से कभी ऐसा कुछ हो जाता है...तो उसका हल ना हत्या है,ना आत्महत्या "

सहमत!

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

निरुपमा का दुर्भाग्य देखिए कि उसे लगातार धोखा हुआ। उसके प्रेमी ने उसके साथ अन्तरंग सम्बन्ध तो बना लिए लेकिन उसके माँ-बाप को मनाने-समझाने का भार खुद के बजाय उसके सिर पर ही डाल दिया। कापुरुष था वह।

निरुपमा ने अपने शरीर को उसके हवाले करने में जल्दबाजी की। शायद उसे अपने प्यार पर बहुत भरोसा रहा हो जिसने उसे समर्पण की राह दिखा दी। लेकिन उसका प्यार भी धोखे का शिकार हुआ।

सबसे बड़ा धोखा तो उसे जन्म देने वाले माँ-बाप से मिला जो उसके वयस्क निर्णय को स्वीकार नहीं कर सके और उसे काल के गाल में समाना पड़ा।

यह प्रकरण एक मिसाल है हमारे समाज की रूढ़ हो चुकी परम्पराओं और आधुनिक शिक्षा व पाश्चात्य शैली के उदारवादी समाज के सिद्धान्तों में हो रहे टकराव की और उससे उपजी सामाजिक संरचना में पड़ रही दरारों की।

हमारे बीच में ही ऐसा समाज भी है जहाँ बड़े-बड़े घरों की लड़कियाँ बाहर निकलते समय अपने पर्स में मोबाइल, लिपिस्टिक, कंघी इत्यादि के साथ निरोध का पैकेट भी लेकर चलती हैं। एक प्रेमी के बजाय लगातार बदलते ब्वॉय फ्रेण्ड्स के साथ ही कम्फर्टेबल फील करती हैं। कोई नैतिक प्रश्न नहीं खड़ा होता। इसलिए इस परिवर्तन शील समाज में कोई सार्वभौम बात कहना सम्भव नहीं है। यह सब बहुत सब्जेक्टिव मामला है।

एक लड़की को सावधान रहने की सलाह जरूर दी जानी चाहिए क्यों कि प्रकृति की व्यवस्था के अनुसार एक ही प्रकार की गलती करने पर भी लड़के और लड़की का हश्र अलग-अलग होता है। नैतिकता का प्रश्न किनारे कर दिए जाने पर लड़का छुट्टा घूमता रहता है लेकिन लड़की भावना में बहकर आजीवन उस गलती का बोझ ढोती रहती है।

स्वप्नदर्शी said...

http://swapandarshi.blogspot.com/2010/05/blog-post.html

Anonymous said...

आपकी इस पोस्ट ने तो झकझोर कर रख दिया...
______________


'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर हम प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती रचनाओं को प्रस्तुत कर रहे हैं. आपकी रचनाओं का भी हमें इंतजार है. hindi.literature@yahoo.com

Renu said...

bahut sahi likha aapne, agar ham kuch ban na chahte hain to hame uske liye apne ko uthana hoga giraana nahi jo ajkal ladkiya kar rahi hain

Unknown said...

आर.अनुराधा से पूरी तरह सहमत। सारा दोष पितृसत्ता पर थोप कर स्त्रियाँ, खासकर पढ़ी-लिखी और रोजगारशुदा, अपनी व्यक्तिगत जिम्मेदारी से पलायन नहीं कर सकतीं।

amitesh said...

निरुपमा की मृत्यु या उसकी ह्त्या? यह विवाद उतना बड़ा नहीं है जितना की यह सत्य की निरुपमा अब इस दुनिया में नहीं है. प्रश्न कई सारे है जिन्हें वह अपने पीछे छोड़ गयी है.


सबसे अहम् की यह आत्महत्या है या ह्त्या?

मगर उससे भी अहम् प्रश्न यह है की क्या ज्ञान का अर्थ केवल सफलता प्राप्त करना है या फिर उसे आत्मसात करना. अगर सफलता माता पिता को संतुष्ट करती है तो उसी ज्ञान को आत्मसात करके अगर निरुपमा या उसके जैसे छोटे शहरों से आनेवाली कई निरुपमाये अपने निर्णय और सच के साथ अडिग रहने के फैसले से समाज इतना असंतुष्ट क्यों है?
निरुपमा के पिता ने पत्र में यह उल्लेखित किया कि सनातन धर्म संविधान से ज्यादा बड़ा है, मगर सवाल यह है की क्या हिन्दू धर्म किसी भी तरह से विचार की ह्त्या को प्रोत्साहित करता है? यहां तो प्रश्न न केवल विचार की ह्त्या का रहा बल्कि व्यक्ति की ह्त्या पर आकर ख़तम हुआ. और मुझे नहीं लगता की विश्वा का कोई भी धर्म इसे न्यायोचित ठहरा सकता है और सनातन धर्म तो कतई नहीं क्योंकि यहाँ विचार पर खुले अम्वाद की परम्परा रही है.

अत: मेरी अपील छोटे शहरों से आने वाले उन सभी निरुपमाओ से है जो बड़े शहर में आकर अपने विवेक और ज्ञान के बल पर जगह तो बनाती है मगर परिवार के दबाव में आकार अपने जीवन के सबसे बड़े फैसले में अपनी भूमिका को अनुपस्थित पाती है. समाज परिवर्तन के उस संक्रमणकाल में है जहा पर ऐसी सभी लड़कियों को अपने निर्णय के साथ डटकर खडा होना होगा. शर्त केवल इतनी है की निर्णय आवेग में ना लेकर बुद्धि के कसौटी पे कसा गया गया हो. ऐसा होना जरुरी है क्योंकि अब कोई और निरुपमा समाज, जाती और प्रतिष्ठा के कोरे दंभ की बलि ना चढ़े.

एक जरुरी बात कि बcपन से बड़े होने तक अभिभावक, धर्म, शिक्षा इत्यादि हमें प्रेम के लिए प्रेरित किया करते है पर क्या यह प्रेम बंधन में किया जाएगा उनके बताये अनुसार...
http://pratipakshi.blogspot.com/2010/05/blog-post_07.html

अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री को सिर्फ बाहर ही नहीं अपने भीतर भी लड़ना पड़ता है- अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री-विमर्श के तमाम सवालों को समेटने की कोशिश में लगे अनुप्रिया के रेखांकन इन दिनों सबसे विशिष्ट हैं। अपने कहन और असर में वे कई तरह से ...