Sunday, May 9, 2010

सवाल तो हैं ही, निरुपमा के लिए भी और प्रियभांशु के लिए भी

- प्रणव प्रियदर्शी

(निरुपमा मसले पर मेरी पिछली पोस्ट निरुपमा के बहाने अब एक बार अपने भीतर झांकें, प्लीज़! पर प्रणव प्रियदर्शी ने यह लंबी टिप्पणी मेल के जरिए मुझे भेजी। इसे एक नई पोस्ट की तरह लगाना ज्यादा सुविधाजनक रहेगा, यह मान कर इसे यहां दे रही हूं। प्रणव चोखेर बाली के नियमित पाठक, टिप्पणीकार और लेखक भी हैं।- अनुराधा)

अनुराधा, तुम्हारी पिछली पोस्ट धर्म पर नहीं है, फिर भी चूंकि तुमने शुरू में उसका उल्लेख कर दिया है, इसलिए मैं भी यह कहना चाहता हूं कि सिर्फ औरतों के लिए नहीं, धर्म ने उन सबको छलने में सत्तारूढ़ तबकों का साथ दिया है… लगातार… जो आज वंचित, पीड़ित, शोषित तबकों के रूप में नजर आते हैं।

दूसरी बात ( यह भी तुम्हारी इस पोस्ट की मुख्य बात नहीं है, पर है केंद्रीय महत्व की) जो तुमने स्त्रियों के लिए कही है कि कब तक हम पुरुषों से मुखातिब रहेंगे? यह बात भी स्त्रियों समेत सभी वंचित तबकों के लिए सच है कि जिन्हें हम अपना विरोधी मानते हैं उन्हें ही संबोधित करते हुए अपनी उम्र गुजार देते हैं। अनुरोध करते हुए, अपील करते हुए, ज्ञापन देते हुए और सांकेतिक विरोध करते हुए भी हम उन्हें ही संबोधित करते रहते हैं। इस उम्मीद में कि शायद वह अपना रास्ता थोड़ा बहुत बदल लें और हमें चैन मिले। यह नहीं सोचते कि अपनी दुर्गति के लिए किसी और से ज्यादा हम खुद जिम्मेदार हैं, दूसरे हमें फॉर ग्रांटेड तभी लेते हैं जब हम इसकी गुंजाइश छोड़ते हैं। दूसरे अगर हम पर ज्यादती करते हैं तो उसके लिए उनसे ज्यादा हम जिम्मेदार होते हैं क्योंकि हम उस ज्यादती को बदार्श्त कर रहे होते हैं। इस हिसाब से दूसरों के मुखातिब होने के बजाय खुद को संबोधित करना ज्यादा जरूरी है क्योंकि तौर-तरीके बदलने की जरूरत दूसरों से ज्यादा उन तबकों को है जो खुद को पीडि़त, दमित, शोषित मानते हैं।

अपेक्षाकृत कम प्रासंगिक पर ज्यादा जरूरी इन दो बातों के बाद मैं तुम्हारी पोस्ट के मुख्य बिंदुओं पर आता हूं। निरुपमा से जो कुछ पूछने की तुम सोच रही हो, वह बिल्कुल सटीक है, पर काफी नहीं। हालांकि मैं न तो निरुपमा को व्यक्तिगत तौर पर जानता था और न ही प्रियभांशु को जानता हूं । इस मामले की मेरी जानकारी भी अखबारी रिपोर्टों तक सीमित है।

इसीलिए इन दोनों के रिश्तों पर मेरा टिप्पणी करना निजता के दायरे का उल्लंघन भी हो सकता है। सभी संबंधित पक्षों से अग्रिम माफी मांगते हुए मैं कहना चाहूंगा कि मेरी बातों को उन दोनों के सच के रूप में न लेकर ऐसे किसी भी मामले में मेरे नजरिए या मेरे सोचने के ढंग के रूप में लें।

इस निवेदन के बाद मैं कहूंगा कि मेरे हिसाब से निरुपमा ने अपने शरीर के बारे में ही नहीं, जीवन के बारे में भी, रिश्तों को समझने में भी, जीवन साथी के चयन में भी घोर लापरवाही बरती। अगर यह सच नहीं है तो फिर यही कहना होगा कि उसमें सही फैसला करने की शक्ति ही नहीं थी।

अगर सचमुच अपने किसी साथी से असुरक्षित यौन संबंध के चलते प्रेग्नंट होने के तीन महीने बाद भी वह साथी को यह बात नहीं बता पाती है तो उस रिश्ते की अर्थहीनता का इससे बड़ा सबूत दूसरा नहीं हो सकता। अगर वह साथी पता होते हुए भी अपनी खाल बचाने के लिए पता होने की बात छिपा रहा है तो फिर उसे साथी कहना ही बेकार है। उस स्थिति में इस पर कुछ और कहने-सुनने की जरूरत ही नहीं बचती।

मुझे अचरज इस बात पर भी हुआ कि निरुपमा की मौत (हत्या) के बाद भी कुछ समय तक प्रियभांशु मीडिया में आने से बचता रहा, क्योंकि वह सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रहा है और शायद उसे उसके कुछ दोस्तों ने सलाह दी कि इस केस में सामने आने से उसका करियर प्रभावित हो सकता है। पता नहीं, यह बात कितनी सच है, लेकिन अगर इसमें जरा सी भी सच्चाई है तो निरुपमा और प्रियभांशु के रिश्तों को इससे बड़ी गाली कुछ और नहीं हो सकती।

हत्या भूल जाएं अगर निरुपमा की मौत भी मान लें तो भी यह असहज मौत तो थी ही, उसके बाद अगर प्रियभांशु यह सोचते हैं कि अब जो होना था वह हो चुका, अब तो अपने बारे में सोचें तो वह रिश्तों को किस स्तर पर जीते हैं, यह बात स्वतः सिद्ध है।

यहां मेरा मकसद बड़ी-बड़ी बातें करना नहीं, सिर्फ यह बताना है कि रिश्तों को दूसरे स्तर पर जीने के भी उदाहरण अपने इसी समकालीन समाज में हमारे सामने बिखरे पड़े हैं।

जेसिका लाल की बहन सबरीना लाल भी इसी दुनिया, इसी जमाने में हमारे ही बीच रहती है, जिसने बहन की हत्या के बाद उस लड़ाई को पूरी निष्ठा के साथ अंजाम तक पहुंचाया। नीतीश कटारा की मां नीलम कटारा भी ऐसी ही महिला है। अगर कोई इन्हें खून का रिश्ता मान कर खारिज करना चाहे तो उसके लिए रुचिका गिरहोत्रा की दोस्त आराधना को याद करना चाहिए। डीजीपी राठौर ने जब रुचिका के साथ बदमाशी की थी तब (आराधना) भी १३-१४ साल की ही थी। तीन साल बाद रुचिका ने खुदकुशी कर ली, पर आराधना ने यह नहीं सोचा कि अब अपने भविष्य का खयाल किया जाए। बीस साल तक वह लगभग हारी हुई यह लड़ाई लडती रही और आखिर डीजीपी राठौर को सजा दिलवाई। बेशक, आराधना के माता- पिता और पति भी अभिनंदन के पात्र हैं, लेकिन आराधना इस पूरे प्रकरण में केंद्रीय पात्र बन कर उभरती है।

अब हम-आप चाहें तो इस पर भी माथा पच्ची कर सकते हैं (और हमें करनी भी चाहिए) कि समकालीन समाज से अनायास लिए इन तीनों उदाहरणों में मिसाल बनकर उभरने वाली तीनों पात्र महिलाएं ही क्यों है?

6 comments:

निशांत मिश्र - Nishant Mishra said...

बहुत उपयोगी विमर्श. ऐसे ही बहुत से प्रश्न शायद अनुत्तरित हों.
जवाबों की कमी से भी ज्यादा सालते हैं ये प्रश्न.

विजय प्रकाश सिंह said...

मुझे यह देख कर आश्चर्य हो रहा है कि देश का युवा पत्रकार वर्ग किस तरह लंपट जैसा व्यवहार कर रहा है । पूरे प्रकरण मे रंजन का चरित्र बेहद संदिग्द्ध है । कुछ बातें हजम होने वाली नहीं हैं :

१. यह कैसे संभव है कि निरुपमा तीन माह की गर्भवती थी और रंजन को पता ही नहीं था और तो और भा‌ई यह कह रहा है कि शायद निरुपमा को भी नहीं पता था । इस बात पर विश्वास करने के लि‌ए आ‌ई आ‌ई एम सी का प्रोफेसर , छात्र या कम से कम पत्रकार होना बहुत जरूरी है किसी और को यह बात हजम नहीं हो सकती ।

२. आज के युग मे जब परिवार कल्याण के साधन उपलब्ध हैं और वह भी ७२ घंटे बाद तक , उस परिस्थिति मे गर्भ धारण का निर्णय , उसके बाद परिणाम के भयावह होने की स्थिति मे अनभिज्ञता का प्रदर्शन , क्या शब्द लिखा जाय , ऐसे महापुरुष के लिए ।

३. वह व्यक्ति बार बार एस‌एम‌एस दिखा रहा है जो कि निरुपमा ने भेज कर कहा कि तुम को‌ई खतरनाक कदम मत उठाना ( यानी आत्महत्या जैसा ) । इन महाशय का को‌ई कदम या मनोभाव इस स्तर के दुख का लगता तो नहीं है ।

४. जिसके लिए न्याय मांग रहे हैं , उसका अंतिम दर्शन करने भी नहीं गये , अरे अकेले डर रहे थे तो अपने दो चार दोस्त साथ ले लेते , कैसे प्रेमी हो , तुम्हारी प्रेमिका को लगता था कि उसके वियोग में तुम आत्म हत्या तक कर सकते हो और तुम डर के मारे उसका अन्तिम दर्शन करने नहीं गये । क्या निरुपमा ने तुम्हे ठीक से पहचाना नहीं ।

शायद निरुपमा ने सबके - रंजन , उसके परिवार , अपने परिवार और समाज के बारे मे गलत अंदाजा लगा लिया ।और इसकी कीमत अपनी जान देकर चुकाई ।

५. रंजन ने शादी के लि‌ए अपने परिवार की रजामन्दी कब ली थी , और ६ मार्च की शादी के लि‌ए क्या अपने पिता का आशीर्वाद ले लिया था ।

६. प्रेम एक बात है , विवाह पूर्व योन संबन्ध दूसरी बात और इस उन्नतशील विचार पुरुष का बिना विवाह के बच्चे का पिता बनने का साहस तो क्रांतिकारी ही कहा जा सकता है ।

७. यह महाशय क्या अमेरिका मे पले बड़े हु‌ए या बिहार मे , भारत मे । क्या हमारे यहां यह एक सामान्य बात है । इनके परिवार की कितनी महिला‌एं या पुरुष अब तक बिना विवाह के माता पिता बन चुके हैं ।

८.हत्या जघन्य है लेकिन उसके लि‌ए परिस्थितियों का निर्माण करने का कार्य किसने किया ? क्या शुतुरमुर्ग की तरह गर्दन जमीन मे धंसा देने से यह देश अमेरिका बन जायेगा ।

प्रभांसु हीरो नहीं है, नहीं है, नहीं है । वह एक कायर है और उसे हीरो की तरह दिखाने का प्रयास निन्दनीय है ।

honesty project democracy said...

मैं आपके इस सोच में आपके साथ हूँ /

mukti said...

बहुत सही प्रश्न उठाये हैं प्रणव ने. निरुपमा ने अपने साथी को पहचानने में भूल तो की ही है. ये तर्क तो बहुत सटीक लगा--
"अगर सचमुच अपने किसी साथी से असुरक्षित यौन संबंध के चलते प्रेग्नंट होने के तीन महीने बाद भी वह साथी को यह बात नहीं बता पाती है तो उस रिश्ते की अर्थहीनता का इससे बड़ा सबूत दूसरा नहीं हो सकता। अगर वह साथी पता होते हुए भी अपनी खाल बचाने के लिए पता होने की बात छिपा रहा है तो फिर उसे साथी कहना ही बेकार है। उस स्थिति में इस पर कुछ और कहने-सुनने की जरूरत ही नहीं बचती। "
औरतें कभी-कभी इसी इमोशनल कमज़ोरी के कारण अनेक परेशानियाँ झेलती हैं और निरुपमा को तो जान तक से हाथ धोना पड़ा. किसी के व्यक्तिगत सम्बन्धों के विषय में बोलना सही नहीं होगा, पर मुझे लगता है हमें अपनी बेटियों को मानसिक रूप से बहुत मजबूत बनाने की ज़रूरत है.

राजन said...

mukti se sahmat

RAJANIKANT MISHRA said...

the questions are bigger and broader. the complex matrix today is result of primarily three things. the population explosion- have you ever noticed the age group in metro/dtc or in parks. the half of aabadi is below thirty. and hen there is rapid urbunasition or atleast mass youth movement toward cities for educational or livelihood purposes. second is the emergance of economic middle class with unrestricted acces to liberal thoughts being pro[ogated by conservative mass media, which without liberalising the society at core has lured the people to materialistic pleasure. then the middle class only dream now seems to bridge the gap through education of children- well evident with hese countless public schools and professional instt.
the parents are busy in making money through any means and allowing all the independence to children to shape their dreams. they dont have time and wish to transfer their value system which they believe in but know that is outdated. so the youth get their ideas from irresponsible maas media and dont have any value system what so ever. this coupled with freedom offered translate into a behaviour even they are not convinced.
such is a situation that a boy takes a challenge to bring a particular girl to bed and girl in consant depression of not having a partner is all too willing to taste the forbidden fruit. and as a fact both dont believe in value of freedom as such and still are guidede by caste consideration and dowary when marriage is upfront.
a very common belief of indian boys is never to marry a girl whome you make love to before allaince. i am pretty sure priyabhanshu would not be an exception, specially if girl is of a caste below in hierarachy.

the freedom to enjoy {be it through earning mney through any mean or having regular or multiple sex partners} has occupied its place in indian mind but prerequisite liberal values are not even discussed let alone be adopted by the society.
we are living in a valueless society now a days. earlier one gone and new one still not arrived.
anupama case is just one menifestation.

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