Friday, May 14, 2010

एक जादुई गोली के पचास साल

राजकिशोर

उस गर्भनिरोधक गोली को, जिसे अंग्रेजी की दुनिया में पिल कहते हैं, आधिकारिक मान्यता मिले हुए पचास साल हो गए। यह अवसर खुशी मनाने का है। स्त्री स्वतंत्रता के पक्षधरों को कुछ खास खुशी होनी चाहिए, क्योंकि पिल ने स्त्री समुदाय को एक बहुत बड़ी प्राकृतिक जंजीर से मुक्ति दी है। अगर पिल न होता, तो यौन क्रांति भी न होती। यौन क्रांति न होती, तो स्त्री स्वतंत्रता के आयाम भी बहुत सीमित रह जाते।

बेशक यह जादुई गोली उतनी महत्वपूर्ण नहीं है जितना पेनिसिलिन का आविष्कार, जिसने चिकित्सा के क्षेत्र में एक चमत्कार का काम किया। पिल का महत्व एसपिरिन या पैरासिटामोल जितना भी नहीं है। लेकिन ये दवाएं हैं। पिल कोई दवा नहीं है। वैसे गर्भनिरोधक गोली का आविष्कार भी स्त्रियों में बांझपन का इलाज खोजने की प्रक्रिया में हुआ था। आज भी पिल का प्रयोग कई स्त्री रोगों का इलाज करने के लिए होता है, लेकिन अधिकतर मामलों में यह गर्भनिरोधक की तरह ही प्रयुक्त होता है और गर्भाधान कोई बीमारी नहीं है। लेकिन अनिच्छित गर्भाधान एक बहुत बड़ी समस्या जरूर है, जिसके कुफल स्त्री को ही भुगतने पड़ते हैं। कहा जा सकता है कि उसके लिए तो यह बीमारियों की बीमारी है। पिल ने उन्हें सुरक्षित और स्वतंत्र जीवन जीने का अवसर प्रदान किया है। इस मायने में यह छोटी-सी गोली जितनी जादुई है, उतनी ही क्रांतिकारी भी।

गर्भाधान की जिम्मेदारी सौंप कर प्रकृति ने स्त्रियों के साथ बहुत बड़ा अन्याय किया है। पुरुष के हिस्से सिर्फ आनंद और स्त्री के हिस्से आनंद के साथ-साथ एक बड़ी और लंबी जिम्मेदारी। इसी आधार पर अनेक स्त्रीवादी विचारकों का मत है कि स्त्री का शरीर तंत्र ही उसका सबसे बड़ा शत्रु है। रेडिकल मार्क्सवादी विचारक शुलामिथ फायरस्टोन मानती थीं कि जब तक स्त्री को गर्भाशय से मुक्ति नहीं मिलती, तब तक उसकी वास्तविक मुक्ति संभव नहीं है। गर्भाशय स्त्रियों को कई तरीकों से बाधित और कंडीशन करता है। यह उसके व्यक्तित्व को ही बदल देता है।

अनिच्छित गर्भाधान से छुटकारा पाने का प्रयास शायद उतना ही पुराना है जितना मानव संस्कृति का इतिहास। गर्भाधान न हो और हो जाए तो उससे छुटकारा पाया जा सके, इसके लिए अनेक तरीके खोजे जाते रहे। उनमें से कोई भी तरीका संतोषजनक नहीं था। कुछ तरीके तो ऐसे थे जिनसे स्त्री की जान पर बन आती थी। उस बेचारी को इज्जत और परिवार के सुख-चैन के लिए इस कठोर अग्निपरीक्षा से गुजरना पड़ता था। दुर्भाग्यवश आज भी दुनिया के बहुत बड़े इलाके में यह अग्निपरीक्षा जारी है। इन इलाकों में हमारा अपना देश भी शामिल है। हर साल हजारों या क्या पता लाखों स्त्रियां अनचाहे गर्भ से मुक्ति पाने की प्रक्रिया में भयावह यंत्रणा सहती हैं और उनमें से अनेक तो जान से भी हाथ धो बैठती हैं। स्पष्ट है कि मानव स्वाधीनता के औजार अभी भी कुछ खास देशों और एक खास वर्ग तक सीमित हैं। पिल भी ऐसा ही एक औजार है।

कुछ लोगों का मानना है कि पिल (और कंडोम) ने यौन अराजकता को बढ़ावा दिया है। अगर पिल न होता, तो स्त्रियां और पुरुष मर्यादा में रहते। पिल के कारण गर्भ निरोध की युक्ति इतनी आसान और इतनी कम खर्चीली हो गई है कि किसी को भी लंबे समय के रिश्तों में दिलचस्पी नहीं रही। मनुष्य पशुओं की तरह आचरण करने लगे हैं। व्यभिचारी स्त्री-पुरुषों की बन आई है। उन्हें अपने कर्म के परिणाम की चिंता नहीं रही, क्योंकि पिल है न।

यह आलोचना पूरी तरह निस्सार नहीं है, लेकिन इतना खतरा तो किसी भी नए आविष्कार के साथ जुड़ा हुआ होता है। सवाल यह है कि जब तक पिल बाजार में नहीं आया था, क्या दुनिया में व्यभिचार नहीं था ? या, यौन उच्छृंखलता नहीं थी? अपनी विवाहिता को साल-दर-साल गर्भवती करते जाना पुरुष सत्ता की यौन उच्छृंखलता नहीं थी तो क्या था? पिल का सबसे अहम योगदान यह है कि यह स्त्री को अपने शरीर पर नियंत्रण प्रदान करता है और इस तरह उसे स्वाधीन बनाता है। लेकिन यह कहना गलत है कि सिर्फ पिल ने स्त्री को स्वतंत्रता दी। सच यह है कि स्वतंत्रता का वातावरण और पिल, दोनों लगभग साथ-साथ आए। इसे सामाजिक विकास और वैज्ञानिक विकास का युग्म कहा जा सकता है। दोनों का ही ज्ञान और चेतना के प्रसार से गहरा संबंध है। ज्ञान की पुरानी अवस्था में न तो पिल की खोज की जा सकती थी और न चेतना की पुरानी अवस्था में इसका प्रयोग उतना व्यापक हो सकता था जितना आज है।

सवाल यह भी है कि स्वतंत्रता का दुरुपयोग किसे कहेंगे? स्त्री के संदर्भ में क्या पुरुष अपनी स्वतंत्रता का दुरुपयोग हजारों वर्षों से नहीं करता आया है? लेकिन पिल ने अगर इन पचास वर्षों में स्त्री को यह चुनने की आजादी दी है कि जब वह चाहे, तभी गर्भाधान हो और औरत इसका लाभ उठाती है, तो किस तर्क से इसे स्वतंत्रता का दुरुपयोग कहा जा सकता है? वस्तुत: जिस यौन अराजकता की बात की जाती है, वह पिल की नहीं, वर्तमान उपभोक्ता संस्कृति की देन है। हां, पिल ने जिस एक महत्वपूर्ण सत्य से हमारा साक्षात्कार कराया है, वह यह है कि यौन समागम कोई उतनी बड़ी घटना नहीं है जितना इसे बना दिया गया है। यह वैसा ही एक मानव व्यवहार है जैसा खाना, पीना या चलना-फिरना। पिल का शुक्रिया कि उसकी मदद से हम एक बहुत बड़े मिथक से मुक्त हो पाए हैं, जिसने मानव जीवन को नरक बना रखा था।

यह शिकायत जरूर वाजिब है कि सत्ता और अर्थव्यवस्था की संरचना ने पिल तक औरतों की पहुंच को सीमित कर रखा है। यह इस बात का प्रमाण है कि गुलामी की कौन-सी बेड़ियां अभी तक मानव समाज के विकास को निरुद्ध किए हुए हैं। दूसरी ओर, पिल ने केवल स्त्री को ही नहीं, उसके साथी पुरुष को भी मुक्त किया है, जो इस बात का एक और प्रमाण है कि स्त्री मुक्ति और पुरुष मुक्ति दोनों साथ-साथ चलते हैं।

5 comments:

आर. अनुराधा said...

राजकिशोरजी से ऐसे उथले लेख की उम्मीद नहीं करती।
इस पिल पर कुछेक विचारों के टुकड़ों को जोड़ दिया लगता है।
"गर्भाधान की जिम्मेदारी सौंप कर प्रकृति ने स्त्रियों के साथ बहुत बड़ा अन्याय किया है।"

इस बात से मैं सहमत नहीं हूं। गर्भाधान की 'जिम्मेदारी' सौंपना कोई अन्याय का काम नहीं है। कोई महिला मां बन कर पीड़ित, अन्याय झेलने वाली तब होती है, जब उसे उम्मीद बराबर सहूलियत, दूसरों की भागीदारी इस काम में नहीं मिल पाती।
और-
"पुरुष के हिस्से सिर्फ आनंद और स्त्री के हिस्से आनंद के साथ-साथ एक बड़ी और लंबी जिम्मेदारी।" इस वाक्य में लगता है कि पैदाइश के अलावा परवरिश की भी जिम्मेदारी 'प्रकृति ने' स्त्री को दी। यह 'जिम्मेदारी' तो समाज ने लाद दी है स्त्री पर। वरना क्या पुरुष की बराबर भागीदारी नहीं होनी चाहिए परवरिश में? अगर इसे प्रकृतिजन्य माना जा रहा है, तो इसका अर्थ, इस सामाजिक षड्यंत्र का समर्थन भी किया जा रहा है।
मुझे गलत लगता है।

Arvind Mishra said...

कितना दुखद है की इस गोली की मौजूदगी के बाद भी कितनी ही निरुप- मायें अपने साथ एक निरपराध अबोध की भी बलि दे रही हैं ...कहाँ है नारी की समझ और स्वतंत्रता !

अजय कुमार झा said...

कहते हैं कि किसी भी मुद्दे को जिस नजरिए से आप देखना चाहते हैं या दिखाना चाहते हैं , यदि आपको मौका मिलता है तो वैसा ही दिखाते हैं । ये स्वाभाविक भी है , मगर इस तथाकथित गोली के कुछ कुपरिणाम भी हैं जिन्हें लेख में सिरे से दरकिनार कर दिया गया है । प्रकृति ने जो भी किया उसके मुकाबले गोली की प्रतिद्वंदिता दिलचस्प लगी । हां अनुराधा जी और अरविंद जी पोस्ट के लिए पूरक बातें और वाजिब प्रश्न तो उठा ही दिये हैं । आगे की टिप्पणियां देखने की उत्सुकता बनी रहेगी ।

Unknown said...

दुनिया मे हर अच्छी चीज के साथ कुछ अपवाद स्वरूप बुराईया जुड हे जाती है. अनचहे गर्भ की आशन्का से मुक्ति निश्चित रूप से कहा सकरात्मक है वही अवैध सम्बन्धो और अनाचार को जो इससे बढावा मिलता है वो सोचनीय है लेकिन फिर भी कमसेकम नारी को इसके कारण इनके बुरे परिणाम नही भोगने पडते.

Unknown said...

आपको नही लगता की स्त्री को कम करके आंकना समाज की भूल है।

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