Monday, May 17, 2010

एक काल्पनिक पत्र निरुपमा का, मां के नाम

युवा पत्रकार अनुपमा की पत्र शैली में यह प्रतिक्रिया निरुपमा हत्याकांड से जुड़े पहलुओं को समझने की कोशिश करती है। मोहल्ला लाइव पर प्रकाशित यह मां के नाम बेटी निरुपमा का काल्पनिक पत्र मन को छूने के साथ ही, वो सारे सवाल भी उठाता है, जो निरुपमा की स्थिति में पड़ने वाला या उसकी हालत को समझने वाला कोई भी समझदार व्यक्ति सहज ही करता।- अनुराधा

मेरी प्यारी मां,
तुझे बहुत-बहुत-बहुत सारा प्यार!
मां, परसों मदर्स डे था न। मुझे यहां स्वर्गलोक में जरा भी अच्छाप नहीं लग रहा था मां। सोचा क्योंो न पापा की चिट्ठी का जवाब लिखूं, जो दुनिया से विदा होने के पहले उन्होंने मुझे लिखी थी। लेकिन तू तो जानती है न मां कि मैं पापा से ज्या,दा बातें नहीं कह पाती। जो कहना होता है, तुमसे ही कहती हूं। तो मदर्स डे के दिन अपने अजन्मे बच्चेी के साथ दिन भर यूं ही तुझे याद करती रही और कुछ-कुछ लिखने की कोशिश करती रही।

मां, मुझे अच्छा नहीं लग रहा कि तू मेरे कारण परेशान है और फजीहत झेल रही है लेकिन मैं अब कुछ कर भी तो नहीं सकती न! बहुत दूर हूं मां। अगर करने की स्थिति में होती, तो तुम्हें कष्ट न होने देती। ऐसे भी तुझे पता है न कि मैं अपनी मां पर जान छिड़कती हूं, उसे कितना प्यार करती हूं, यह शब्दोंक में बयां नहीं कर सकती। तू ही बता न कि अगर मैं मां-पापा से प्या,र न करती और भरोसे का कत्ल करना चाहती तो क्यों सिर्फ यह पूछने के लिए दिल्ली से कोडरमा जाती कि क्या् मैं प्रिभयांशु से शादी करूं। मां उसके साथ पति-पत्नी के रिश्ते के बीच जितने भी तरह के भाव होते हैं, उन सभी भावों से तो गुजर ही चुकी थी न, सिर्फ एक सामाजिक मान्यता मिलनी बाकी थी।

मां, प्रिभयांशु के साथ मैं एक दोस्त या प्रेमिका की तरह नहीं बल्कि हमसफर की तरह ही रह रही थी। और फिर मुझे आपलोगों के भरोसे का कत्ल करना होता तो मैं अपनी अन्य सहेलियों की तरह कोर्ट में शादी करने के बाद बताती कि मैंने शादी कर ली। तब आपलोगों की मजबूरी होती मां कि अपनी सहमति की मुहर लगाएं। लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया। मैं दो वर्षों के प्या र पर जीवन देने वाली मां और पालन करने वाले पिता के प्यार को हल्का नहीं करना चाहती थी। उसका मान कम नहीं करना चाहती थी।

यह भरोसा था मुझे मां कि जब आपलोगों ने झुमरी तिलैया से मुझे पढ़ाई करने के लिए दिल्ली् भेजा है, अखबारी दुनिया में नौकरी करने की छूट दी है तो फिर अपने तरीके से, अपनी पसंद के लड़के के साथ जिंदगी भी गुजारने देंगे। मैं कानूनन सब करने में सक्षम थी मां, लेकिन मैं कानून से ज्यादा आपलोगों की कद्र करती थी। आपलोगों पर भरोसा करती थी। इसलिए सहमति की मुहर लगाने कोडरमा पहुंची थी। और सुनो न मां, अब तो दो-दो जिंदगियां बरबाद हो ही चुकी हैं। मैं और मेरी संतान ने दुनिया से अलग कर लिया है खुद को। अब प्रियभांशु को भी बरबाद करने के लिए दांव-पेंच क्यों चले जा रहे हैं मां।

मां, क्या- मैं बेवकूफ थी, जो मुझे पता नहीं चल सका था कि मेरे गर्भ में उसका बच्चा पल रहा है? मैं अबॉर्शन करा सकती थी न, लेकिन मैंने नहीं करवाया। मैं और कई उपाय भी अपना सकती थी लेकिन नहीं अपनाये। इसलिए कि मैं प्रिभयांशु को मन से चाहती थी, तो तन देने में भी नहीं हिचकी। मां उसने कोई बलात्कार नहीं किया और न ही संबंध बनाने के बाद मुझे बंधक बनाकर रखा कि नहीं तुझे बच्चे को जन्म देना ही होगा। यह सब मेरी सहमति से ही हुआ होगा न मां, तो उसे क्यों फंसाने पर आमादा है पुलिस। जरा इस बात पर भी सोचना तुम।

हां मां, अब यहां स्वर्गलोक में आ चुकी हूं तो यहां कोई भागदौड़ नहीं। फुर्सत ही फुर्सत है। ऐसी फुर्सत कि वक्त काटे नहीं कट रहा। धरती की तरह जीवन की बहुरंगी झलक नहीं है यहां, जीवन एकाकी और एकरस है। लिखने की आदत भी पड़ गयी है, तो सोच रही हूं कि आज पापा के उस आखिरी खत का जवाब भी दे दूं। पापा से कहना वो मेरे जवाब को मेरी हिमाकत न समझें बल्‍कि एक विनम्र निवेदन समझेंगे।

उन्होंने अपने पत्र में सनातन धर्म का हवाला दिया है। अब यहां स्वर्गलोक में जब फुर्सत है तो सनातन धर्म के गूढ़ रहस्यों से भी परिचित हो रही हूं। सनातन धर्म के बारे में पापा शायद ज्यादा जानते होंगे मां लेकिन मैं अब सोच रही हूं कि मैंने भी तो उसी धर्म के अनुरूप ही काम किया न। मां, सनातन धर्म ने तो प्रेम पर कभी पाबंदी नहीं लगायी और न ही जातीय बंधन इसमें कभी हावी रहा। देखो ना मां, कृष्णन की ही बात कर करो। जगतपालक विष्णुग के अवतार कृष्ण । प्रेम की ऐसी प्रतिमूर्ति बने कि रुक्‍मिणी को भूल लोग उन्हें राधा के संग ही पूजने लगे। घर-घर में तो पूजते हैं लोग राधा-कृष्ण को। फिर राधा-कृष्ण की तरह रहने की छूट क्यों नहीं देते अपनी बेटियों को? क्याण राधा-कृष्ण सिर्फ पूजे जाने के लिए हैं? जीवन में उतारे जाने के लिए नहीं? और यदि जीवन में जो चीजें नहीं उतारी जा सकतीं, उसे वर्जना के दायरे में रखा जाना चाहिए न मां। मां अपने कोडरमा वाले घर में भी राधा-कृष्ण की तस्वीर है, हटा देना उसे सदा-सदा के लिए।

हां मां, पापा से कहना कि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम की तस्वीर भी फेंक दें, वह भी सनातन धर्म की कसौटी पर पूजे जाने लायक नहीं हैं। याद हैं मां, बचपन से एक भजन मैं सुना करती थी – बाग में जो गयी थी जनक नंदिनी, चारों अंखियां लड़ी की लड़ी रह गयीं। राम देखे सिया और सिया राम को। चारों अंखियां लड़ी की लड़ी रह गयीं… फिर भाव समझाते थे प्रवचनी बाबा कि शिवधनुष तोड़ने से पहले का नजारा है यह। सीता जी फूल तोड़ने बाग में गयी थीं, राम से नैन लड़े तो दोनों एक दूसरे पर मोहित हो गये। जानती हो मां, इस भजन को याद आने के बाद मैं यह सोच रही हूं कि राम ने भी तो अपने पिता की मर्जी से सीता से शादी की नहीं थी। वह तो गये थे अपने गुरू के साथ ताड़का से रक्षा के लिए लेकिन जब नजरें सीता से मिलीं तो चले गये शिवधनुष तोड़ने। क्या राम को यह नहीं पता था कि धनुष तोड़ने का मतलब होगा शादी कर लेना। फिर क्यों नहीं एक बार उन्होंने अपने पिता दशरथ से यह अनुमति ली। दशरथ को तो बाद में पता चला न मां कि जनक की बेटी से उनका बेटा शादी करने जा रहा है। तो मां, क्या गुरु के जानने से काम चल जाता है। मेरे भी गुरू तो जानते ही थे न। दिल्ली में रहनेवाले सभी गुरु और मित्र इस बात के जानते थे कि मैं प्रिभयांशु से शादी करने जा रही हूं। फिर भी मैंने गुरु के बजाय आपलोगों की सहमति लेना जरूरी समझा। राम की तस्वीमर हटा देना मां उन्होंने भी अपने पिता से पूछे बिना अपना ब्यागह तय कर लिया था।

मां, पिताजी को माता कुंती की भी याद दिलाना न। सनातनी कुंती की। उन्हें तो कोई कभी कुल्टा नहीं कहता। उन्हें आदर्श क्योंस माना जाता है जबकि उन्होंने छह पुत्रों का जन्म पांच अलग-अलग पुरुषों से संबंध बनाकर दिया। और मां कर्ण वह तो विवाह से पहले ही उनके गर्भ से आये थे न। यह तो सनातनी पौराणिक इतिहास ही कहता है न मां। फिर कुंती को कुल्टाप क्यों नहीं कहते पापा। पापा की कसौटी पर तो तो वह चरित्रहीन ही कही जानी चाहिए।

और द्रौपदी, मां। कोई द्रौपदी को दोष क्योंप नहीं देता। अच्छात जरा ये बताओ तो मां कि परिस्थितियां चाहे जैसी भी हों, कोई एक स्त्री पांच-पांच पुरुषों के साथ कैसे रह सकती है। लेकिन वो रहती थी और उसे कोई दोष नहीं देता। पापा को कहना कि वह द्रौपदी को भी अच्छीद औरतों की श्रेणी में न रखा करें। एक बात कहूं मां, पापा ने शुरुआती दिनों में ही एक गलती कर दी थी। मुझे धर्म प्रवचन की बातें बताकर। उन्होंने ही एक बार बताया था कि इस जगत में ब्रह्मा की पूजा क्यों नहीं होती क्योंकि ब्रह्मा ने अपनी ही मानस पुत्री से शादी कर ली थी। छि: कितने गंदे थे न ब्रह्मा।

और मां, रामचंद्र के वंशजों में तो किसी की तस्वीकर घर में नहीं रखना, क्योंककि तुम्हें भी तो पापा ने बताया ही होगा कि धर्म अध्यात्म और सनातनी इतिहास के क्रम में भागीरथी कैसे दुनिया में आये थे। दो महिलाओं के आपसी संबंध से उत्पन्न हुए थे न मां वो। यानी लेस्बियनिज्म की देन थे। बताओ तो सही, भला नैतिक रूप से कहां आये थे वो? मैं भी गंदी थी मां। अनैतिक। इन लोगों की तरह ही अनैतिक। मैं कुतर्क नहीं कर रही और न ही अपने पक्ष में कोई दलील ही दे रही हूं मां। यह सब मन में बातें आयीं तो सोचा तुमसे कह दूं। खैर, एक बात कहूं मां, मुझसे तू चाहे जिंदगी भर नफरत करना, घृणा करना, लेकिन अब छोड़ दो न प्रिभयांशु को। उसने कुछ नहीं किया जबरदस्ती मेरे साथ। मैं बच्चीफ नहीं थी मां और न ही अनपढ़-गंवार थी। सब मेरी रजामंदी से ही हुआ होगा न मां।

और हां मां, मुझे फिर से धरती पर भेजने की तैयारी चल रही है। मेरे बच्चे को भी फिर से दुनिया में भेजा जाएगा। मैंने तो सोच लिया है कि इस बार अपने नाम के आगे पीछे कोई टाइटल नहीं लगाऊंगी। सीधे-सीधे नाम लिखूंगी। कोई पाठक, तिवारी, यादव, सिंह नहीं। सीधे-सीधे सिर्फ नाम। जैसे कि दशरथ, राम, कृष्ण… इन सबकी तरह। इनके नामों के साथ कहां लिखा हुआ मिलता है कि दशरथ सिंह, राम सिंह, कृष्णी यादव। मां मैं फिर आ रही हूं। इस बार फिर प्याार करुंगी। अपने तरीके से जीने की कोशिश करुंगी। फिर मारी जाऊंगी तो भी परवाह नहीं। पर एक ख्वाफहिश है मां, ईश्वर से मेरे लिए दुआ मांगना कि इस बार किसी अनपढ़ के यहां जन्म लूं… जो ज्यादा ज्ञान रखता हो। जो सनातनी हो लेकिन व्यावहारिक सनातनी, सैद्धांतिक नहीं। जो कम से कम अपने संतान को अपने तरीके से जीने की आजादी दे।

बस मां! अभी इतना ही । शेष फिर कभी। तुम अपना ख्याल रखना मां और पापा का भी। भाई-मामा को प्रणाम कहना। जल्दी ही मिलती हूं मां। नाम बदला हो सकता है लेकिन तू गौर करती रहना… तुम मुझे पहचान ही लोगी।

तुम्हारी बेटी
निरुपमा

(अनुपमा। झारखंड की चर्चित पत्रकार। प्रभात खबर में लंबे समय तक जुड़ाव के बाद स्वतंत्र रूप से रूरल रिपोर्टिंग। महिला और मानवाधिकार के सवालों पर लगातार सजग। देशाटन में दिलचस्पी‍। प्रभात खबर के लिए ब्लॉगिंग पर नियमित स्तंभ लेखन।)

-साभारः मोहल्ला लाइव

15 comments:

रेखा श्रीवास्तव said...

निरुपमा के प्रश्नों के उत्तर उसके माँ-बाप तो दें ही, साथ ही इस समाज का वह वर्ग भी दे जो उस लड़की की हत्या या आत्महत्या को सौ फीसदी उचित बता रहा है कि ऐसा ही होना चाहिए. हमें बेटियों को घर से बाहर निकालने के पहले ये बता देना चाहिए की तुम्हारी सीमायें ये हैं. उनकी डोर पतंग की तरह अपने हाथ में कस के थाम के रखनी चाहिए ताकि जब भी चाहे उसे खींच लें. वो हमारे मर्जी की ही गुलाम रहे. निरुपमा ने जो भी सवाल किये सब सार्थक ही हैं.
लड़कियों को उड़ने के लिए छूट नहीं देनी चाहिए. हमें अपनी मानसिकता के अनुरूप ही उन्हें शिक्षा दीक्षा देना चाहिए. काफी है कि आप बी ए , एम ए करवा दें और शादी कर दें.

अर्चना said...

ye kaise maan-baap hai jinhen apani beti our ajanme naati ki hatya ki jara si glaani nahin hai!balki uske premi- jisane usase apane rishte ki baat swikaar kar apane prem ki satyata ka pramaan diya hai- ko fansa kar maan-baap par beati ke wiskwas ko our kalankit karane ke liye yaiyaar hain.

Pratibha Katiyar said...

स्तब्ध हूं ये पत्र पढ़कर. बहुत ही करीने से सारे सवालों को किनारे लगाया है इस पत्र ने और नये सवाल उठाये हैं. सचमुच बहुत शानदार. अनुराधा जी का शुक्रिया इसे यहां लगाने का और अनुपमा जी की ती जितनी प्रशंसा की जाए कम है.

रवि कुमार, रावतभाटा said...

परिस्थितियों को खंगालने का यह अंदाज़ कई मुद्दों पर एक साथ इशारे कर रहा है...और निरूपमाओं की मानसिकता को समाज के बरअक्स बख़ूबी रख रहा है...दिल को छूने और मथ देने बाली बात...

Sachin Agarwal said...
This comment has been removed by the author.
Sachin Agarwal said...

एक जबरदस्त और जन्ख्झोर के रख देने वाला लेख ! इसे किसे मेन स्ट्रीम प्रेस में छपवाने का प्रयास करना चाहिए. op-ed पेज पर |

स्वप्नदर्शी said...

मुझे ये लेख जमा नहीं. धर्म का और समाज का एक लंबा इतिहास रहा है और कई तरह के प्रयोगों के बाद जहां हम आज है वहाँ है. अच्छे और बुरे का पता नहीं पर आज का समाज कई तरह से जटिल है. इसीलिए स्त्री को अपने व्यवहार और आचरण के लिए मॉडल ढूँढने का काम ५००० साल पीछे लौटकर नहीं करना है. उनके दलदल में फिर-फिर फंसने के नए गड्डे बनते जाते है. सीता, द्रुँपदी , और कुंती का जीवन पूज्य होते हुये भी लगातार असहायता और अपमान का सबब बना रहा, ये भी कौन भूला है? आज मैं तो उस जीवन को सिर्फ इसीलिए नहीं चुन सकती, कि कल को किसी वजह से पूज्य बन जाऊं. अभी केस सोल्व नहीं हुया है और बिना ट्रायल के नतीजे तक पहुंचना हर हालात में खतरनाक ही है, और सही जानकारी के लिए हर उस व्यक्ति से पूछताछ ज़रूरी है जो निरुपमा से जुडा हुया था.

आर. अनुराधा said...

@ स्वप्नदर्शी,
आपकी आखिरी बात के मुताल्लिक- निरुपमा से जुड़े हुए व्यक्ति से हम लगातार संपर्क में हैं।

दूसरी बात, इस पत्र में पुराने चरित्रों को ही इसलिए सामने लाया गया है क्योंकि निरुपमा के पिता का जो आखिरी पत्र पब्लिक हुआ है, उसमें पहले से लेकर आखिरी वाक्य तक लगातार उसी परंपरा, संस्कृति, पौराणिक तथाकथित महान चरित्रों को उदाहरण के तौर पर रख कर निरुपमा को समझाने की कोशिश की गई है कि वह इस संबंध को तोड़ ले क्योंकि यह धर्म विरुद्ध है और इस धर्म विरुद्ध कार्य के नतीजे विनाशकारी होते हैं।

"...तुमने जो कदम उठाया है या उठाने जा रही हो, हमारे धर्म के खिलाफ है। जब लोग धर्म का पालन करते हैं तो यह उन्हें सभी दिक्कतों से बचाता है, लेकिन जब वे इसके विपरीत चलते हैं, तो यही धर्म उन्हें नष्ट कर देता है।" ...‘किसी भी व्यस्क को अपनी पसंद के युवक/युवती से विवाह करने की इजाजत देने वाला हमारा संविधान महज 60 वर्ष पुराना है, परंतु चिरकाल से चला आ रहा हमारा धर्म, सनातन धर्म कहता है कि जब एक उच्च वर्ण की लड़की किसी निम्न वर्ण के लड़के से विवाह करती है तो नतीजे विनाशकारी होते हैं।"

इस आधार पर मुझे उचित ही लगा कि इस काल्पनिक पत्र में उसी सनातन धर्म के आदर्शो के सहारे बात रखी गई।

प्रज्ञा पांडेय said...

सिर्फ इतना बता दीजिये औरत ही हमेशा क्यों मरती है ??????

आर. अनुराधा said...

यही तो सवाल है!!

JAGDISH BALI said...

औरत इस लिए मरती है क्योंकि वह यह नहीं पूछ्ती वही क्यों मरे ! सच्च जो भी हो, पर एक लेखक के रूप में आप का ये लेख ह्र्दयविदरक है !

poonam bisht negi said...

lajwaaab, vartamaan me har pragatisheel ladki ke bheetar bhi kuch aisa hi dwand chal raha hai. shukriya aap dono ka ise yaha pesh karne ke liye. nirupama ki aatma ko shaanti mile aur samaj ko sadbuddhi.

poonam bisht negi said...

lajwaaab, vartamaan me har pragatisheel ladki ke bheetar bhi kuch aisa hi dwand chal raha hai. shukriya aap dono ka ise yaha pesh karne ke liye. nirupama ki aatma ko shaanti mile aur samaj ko sadbuddhi.

RAJANIKANT MISHRA said...

kaun manaa kartaa hai aapko kunti/ draupadi ko adarsha maan kar unhi ka jivan apanaane se? lekin ye double standard kyon ki kabhi to pitravaad ko gaaliyo se nawaze ek ladaki ko draupadi ya kunti banaane ke liye aur kabhi unhi ki duhaayi? ye to aap bhi manengi ki draupadi aur kunti banaayi gayi thi.
fir agar bachho ko apani manyataon ke hisab se chunane ka adhikaar hai to maa baap ko aswikaar karne ka. no one has right to impose hiss will unilaterally, be it the girl or parents? in the case apparently the girl has tried to impose her choice even by taking her own life.

शिखा शुक्ला said...

निरुपमा क्या किसी की माँ भी इन सवालो के जवाब नहीं दे पायेगी. अब प्रियाभंशु को तो छोड़ ही देना चाहिए. उसे तो दोहरे मानसिक प्रताड़ना से गुजरना पड़ रहा होगा .शायद यही निरुपमा की आत्मा को शांति देगा.शेष क्या बोलूं खुद भी गुजर रही हूँ इन हालातो से

अनुप्रिया के रेखांकन

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