Sunday, January 23, 2011

शाबास बेटियों, तुमसे ही समाज कुछ सीखेगा!!

यह समाचार उन लोगों के लिए एक सबक हो सकता है जो आज के समय के भी लड़कियों को जन्म लेने से रोकते हैं। इधर देखने में आ रहा है कि पढ़े-लिखे लोग भी कन्याओं का जन्म लेना बोझ समझते हैं। ऐसे लोगों के लिए भी उत्तर प्रदेश के उरई शहर की इन पुत्रियों ने एक इतिहास रचा है। अमर उजाला दिनांक-22 जनवरी 2011 में प्रकाशित समाचार को संक्षेप में प्रस्तुत करते हुए इतना बताना है कि यहां लड़कियों ने अपनी मां को मुखग्नि दी।


समाचार-पत्र के अनुसार उरई के मुहल्ला उमरारखेरा के एक परिवार में तीन बेटियां और एक बेटा था। बेटा अपनी हरकतों के कारण अपने परिवार से अलग रह रहा था। परिवार की तीन लड़कियों में से दो की शादी हो चुकी थी। सबसे छोटी बेटी ही घर में रह कर अपने माता-पिता की सेवा करती थी।

तीन वर्ष पहले उनके पिता की मृत्यु हो गई थी। सबसे छोटी पुत्री ने अभी तीन दिनों पूर्व ही अपनी बीमार मां को जिला चिकित्सालय में इलाज के लिए भरती करवाया था। शुक्रवार की सुबह ही उसकी मां की चिकित्सालय में ही मृत्यु हो गई। इसके बाद अन्तिम संस्कार के लिए मुहल्ले के लोगों ने उस मृत वृद्धा के एकमात्र पुत्र को बुलाने को कहा। इस पर उस औरत की पुत्रियों ने मना कर दिया।

इसके बाद दिवंगत हुई महिला की तीनों पुत्रियों ने स्वयं ही उसको कंधा देने और मुखाग्नि देने का विचार किया। इसके बाद तीनों बहिनों ने अपनी माता के दिवंगत शरीर को कंधा दिया। श्मशानघाट में सबसे छोटी पुत्री शोभा ने अपनी मां को मुखाग्नि दी।

आज के दौर में जबकि कागजों पर तो लड़का-लड़की में कोई भेदभाव नहीं समझा जा रहा है किन्तु सामाजिक जीवन में इस भेदभाव को हम कदम-कदम पर देख रहे हैं। ऐसे में इन तीनों बहिनों के द्वारा यह उदाहरण आंखें खोलने वाला है, अनुकरणीय है।

-----------------------------
उरई में पहले भी इस तरह का अनुकरणीय कदम बेटियां उठा चुकी हैं, यहाँ क्लिक करके देखिये

13 comments:

Arvind Mishra said...

बेटियाँ लड़कों की बजाय मां बाप के प्रति ज्यादा सम्वेदन्शील होती हैं -और वे बेटों की तरह बहुओं की गिरफ्त में भी नहीं होती !

राजेश उत्‍साही said...

जिन बहुओं की बात की जा रही है,आखिर वे भी किसी की बेटियां हैं। इसलिए इस मुद्दे को बेटे बनाम बेटियों की शक्‍ल न दी जाए तो बेहतर है।

anshumala said...

जब ऐसा कोई उदाहरण बेटियों द्वारा सामने रखा जाता है तो हम उसे बस एक अपवाद समझ कर कुछ दिन बाद भूल जाते है पर वास्तव में ऐसा होता नहीं है असल में ये दूसरो को भी ऐसा करने की प्रेरणा और हिम्मत देता है | जो बेचारी बेटिया और माँ समाज के डर से ऐसा नहीं कर पाती थी और नालायक भाइयो और बेटो के सहारे ही रह जाती थी पर अब ऐसा नहीं है अब पुरुषो द्वारा किसी भी तरह की अवहेलना को माँ और बहने कोई भी बर्दास्त नहीं करता है और इस तरह की हिम्मत दिखाता है |

सचिन्द्र राव said...

आजकल एक फैशन हो गया है स्त्रियों का फेवर करने का बिना सच्चाई जाने हम तपाक से स्त्रियों के फेवर में बात करने लगते है ताकि लोगो के बीच एक उदार छवि बना सके. जितना पुरुष स्त्रियों की तरक्की से खुश होते है उतनी महिलाये ही महिलाओं से द्वेष रखती है और उन्हें निचा दिखने के लिए नकारात्मक बाते फैलती है. तुम लड़की हो लड़की जैसी ही रहो, अपनी मर्यादा में रहो, वगैरह वगैरह. महिलाओं की दुर्दशा के लिए खुद स्त्री समाज ही दोषी है. इन्हें कमजोर खुद महिलाये ही बनाती है जबकि एक स्त्री पुरुष के मुकाबले ज्यादा मानसिक और शारीरिक रूप से दृढ होती है.

vandan gupta said...

सराहनीय कदम्।

डॉ. पूनम गुप्त said...

बहुत अच्छी पहल है. इन बेटियों ने सचमुच कमाल कर दिखाया है. निस्संदेह इससे समाज को एक नई दिशा मिलेगी.

Dr. Zakir Ali Rajnish said...

धीरे धीरे ही सही, पर जमाना बदल रहा है।

-------
क्‍या आपको मालूम है कि हिन्‍दी के सर्वाधिक चर्चित ब्‍लॉग कौन से हैं?

रेखा श्रीवास्तव said...

बेटियाँ आगे बढ़ें और अपने दायित्वों को बखूबी निभाएं ये तो सबको अच्छा लगता है लेकिन उनके बारे में बखान करना कुछ लोगों को अच्छा नहीं लगता है. बेटे और बेटियाँ एक ही वातावरण में पले बच्चे होते हैं फिर क्यों बेटियाँ अधिक संवेदनशील होती हैं और बेटे कम. परिवार तो बेटियों के भी अपना होता है. यहाँ हमारी दी हुई शिक्षा ही काम आती है. हमें बेटियों को ये कभी नहीं सीखना चाहिए कि अपने सास ससुर कि उपेक्षा करो. दोनों ही दायित्वों को निभाना उनको आना चाहिए. बेटियों में हिम्मत होती है इसमें कोई दो राय नहीं.

SM said...

तीनों पुत्रियों
thanks for sharing one step in a direction towards equality between male and female.

Fauziya Reyaz said...

hamare zehan khulenge, tabhi naye raaste banenge...

सुधीर साहु said...

तेरी दुनिया

कसर तूने नहीं छोड़ी कोई मुझको रुलाने में
कि जैसे लुत्‍फ आता हो मुझे ऑंसू बहाने में

मेरे दिल, मेरे ख्वाबों, ख्वाहिशों की एक थी दुनिया
हुई है खाक वो दुनिया तेरे रिश्‍ते निभाने में

नहीं मालूम था आगाज है बरबादियों का ये
ये गफलत हो गई खोया था दिल मेंहदी रचाने में

नजर तेरी बहकती है तो इसमें भी खता मेरी
जवानी ढल गई मेरी तेरी दुनिया बसाने में

हमारा घर तुम्हारा हो गया बस एक ठोकर में
न पहले था न अब मेरा है कोई घर जमाने में
***
--सुधीर साहु

Manish Gorakhpur said...

sachin rao, jee ,likhatay hay apnay baaray mayमै एक सरकारी (असरकारी नहीं) नौकर हूँ. अपने बारे में लिखने लायक कुछ भी नहीं है.

bahut aachaa ..per janab ko larkee aur aurotoo kay baray may kahanay ko khub hay , 1 to janab savee auratoo kay baray may jo soach rakhatay hay kee SAB dhayan day sablog SAB Aurat log AURAT KE DUSMAAN HOTEE HAY ..jaysay aadmee to dhud kay dhulay hotay hay , aur een say sawall kiaa jayay ke sab aurat kay..? prefix laganay kay pahalay soch lay , aur inkoo kon adhikaar dia kee yay janab aurat , larkee kay baaray may tipnee karay , hum aadmee log to bilkul en ko adhikaar nahee diay, aur haa HAQ kee baat karnaa aur BANCHIT LOG kay saath kharaa rahanaa FASION nahee hay , kuch log aysaa kartay hay to hum un kay saath nahee hay , aur chand logoo kee wajah say hum saath kharaa rahanaa nahee choor sakatay,..इन्हें कमजोर खुद महिलाये ही बनाती है ...ees baat per kaya kahaa jaya janab ko , sachin jee sambhal jayeay bhai, apnee mansikataa or MARD logoo kay baray may apnee soch ko or saaf karnay ko women logoo say milay , barnaa deear ho jaygee bhai , likhnay ko to bahut karaa likhataa per kaya karuu may aap jaysaa असरकारी nahee hu naa ........
kripya ees post ko sab kay samnay aanay day please , aadhee duniya kaa sawal hay,

व्योम said...

बहुत अच्छा उदाहरण प्रस्तुत किया है तीनों बेटियों ने और ब्लाग पर यह समाचार देकर एक अनुकरणीय कार्य किया गया है....... वधाई ।
-डा० जगदीश व्योम

अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री को सिर्फ बाहर ही नहीं अपने भीतर भी लड़ना पड़ता है- अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री-विमर्श के तमाम सवालों को समेटने की कोशिश में लगे अनुप्रिया के रेखांकन इन दिनों सबसे विशिष्ट हैं। अपने कहन और असर में वे कई तरह से ...