Monday, May 2, 2011

ये हुई ना बात....!

अपने लैपटॉप मे दिक्क्त की वजह से प्रतिभा जी स्वयम यह पोस्ट नही डाल पायी है। आपकी राय-मत का स्वागत है -


फेसबुक के संसार में पिछले दिनों एक लड़की ने दिल जीत लिया. अपने मैसेज बॉक्स में अश्लील मैसेज भेजने वाले शख्स को पहले तो डपटा, आगाह किया फिर भी न मानने पर उन मैसेजेस को अपनी वॉल पर डालकर दोस्तों की राय मांगी. आने वाली तमाम राय में ज्यादातर यही थीं कि आपको उसे तुरंत ब्लॉक कर देना चाहिए. कुछ ने सुझाव दिया कि अनजाने लोगों से दोस्ती नहीं करनी चाहिए और कुछ ने साइबर कानून की मदद लेने की बात भी कही.
मैं सबसे पहले उस लड़की को बधाई देती हूं, जिसने हिम्मत दिखाई उसे दुरुस्त करने की और उसे बेनकाब करने की. आमतौर पर ब्लॉक करना सबसे आसान है. ऐसे लोगों को, ऐसी हरकतों को इग्नोर करना तो हम लड़कियों को घुट्टी में पिलाया जाता है. लेकिन ब्लॉक करने से क्या होगा. वही हरकत वो शख्स फिर करेगा, किसी और के साथ. लगातार इग्नोर करते आने से ऐसे लोगों की हिम्मत बढ़ती जाती है. इसलिए मैं इग्नोर ऑप्शन को एकदम खारिज करती हूं. सबक ही सिखाना चाहिए. जब हम हिम्मत करते हैं, चुप रहने की बजाय पलटकर वार करते हैं तो ऐसे लोगों की हिम्मत टूट जाती है. जहां तक ब्लॉक करने की बात है तो वो ऑप्शन तो खैर है ही. अब दूसरा सुझाव सुनते हैं वो ये है कि आप अपने दोस्त सोच-समझकर बनाइये. जानने वालों को ही फ्रेंडलिस्ट में शामिल करिये. यही सुझाव तो सदियों से मिलता रहा है. अनजाने लोगों से बात मत करो. अनजानी राहों पर कदम मत रखो. किसी अजनबी की तरफ देखो भी मत. कोई सामने पड़ जाये तो पर्दा कर लो न जाने उसकी निगाह कैसी हो? कैसी बंदिशों की बू है इन ताकीदों में. हम घर से बाहर निकलते हैं तो एक अनजानी दुनिया में ही तो कदम रखते हैं. हमारे सबसे करीबी दोस्त पहले अजनबी ही तो थे हमारे लिए. तो ये ताकीद कैसे और क्यों मानी जाए. हां, कुछ चीजें तो देखनी जरूरी होती हैं लेकिन उतना भर काफी होता है क्या? दूसरी बात जिन लोगों को हम जानते हैं, उन्हें सचमुच जानते हैं क्या. शक तो इस बात का भी है कि हो सकता है कोई जानने वाला ही चेहरा बदलकर परेशान कर रहा हो. जिस समाज में सगे रिश्तों पर सवालिया निशान लगते रहते हों, वहां भला किसे जानना और किसे न जानना. जानने के लिए ही तो हम बाहर निकले हैं. फिर इस सुझाव के भला क्या मायने? साइबर क्राइम की मदद लेना लाजिमी है. लेकिन सबसे जरूरी काम तो वो लड़की कर ही चुकी है बिना यह परवाह किये कि लोग उसे क्या कहेंगे...कहने वालों ने कहा भी कि जरूर उस लड़की ने ही उसे उकसाया होगा...अब ऐसे कमेंट्स पर सिर्फ हंसा ही जा सकता है. दुनिया कहां की कहां पहुंच गयी लेकिन कुछ चीजें कभी नहीं बदलतीं. मुझे अचानक उन कश्मीरी लड़कियों के चेहरे याद आते हैं, जो ताइक्वांडो के कैम्प में लखनऊ आई थीं. कोई बारह बरस की थी वो लड़की जिसने बताया था कि सब्जी मंडी में किस तरह एक लड़का रोज उसे तंग करता था. एक रोज उसने घुमाकर लात जब उसके पेट पर मारी, उसके बाद वो कभी न$जर नहीं आया. घुमाकर लात पेट पे दे मारी...कहते हुए उसकी आंखों की चमक बढ़ गई थी जिसे देखना यकीनन सुखद था. कश्मीर की वादियों की इन चिनगारियों को बाहों में भरते हुए उस आंच को अपने सीने में महसूस किया था. वो आंच सबको चाहिए.
किसी को परेशान करना हमारी फितरत नहीं है लेकिन कोई हमें परेशान करेगा तो हम बख्शेंगे भी नहीं. मैंने उस बहादुर लड़की का नाम यहां नहीं दिया. देने में कोई बुराई भी नहीं क्योंकि जो लड़की खुद नहीं घबराती उसकी पहचान छुपाने का भी क्या अर्थ. नाम न देने का कारण सिर्फ इतना है कि उस नाम की जगह अगर आप स्त्री हैं तो आप अपना नाम भर लें और पुरुष हैं तो अपनी किसी प्रिय स्त्री का नाम भरकर देखें. महसूस करें उस दंश को और सहें नहीं, पलटकर वार करें. ऐसा कि दोबारा उस शख्स और उस जैसे तमाम लोगों की हिम्मत धराशाई हो जाए.


10 comments:

डॉ .अनुराग said...

अभी अभी पढ़ रहा था ..किसी शबनम नाम की सोशल एक्टिविस्ट का ब्यान उस फैसले के मुताल्लिक जिसमे अपनी बेटी के साथ रेप करने वाली रेपिस्ट को केमिकल कास ट्रेशन के खिलाफ वो कहती है ..."ऐसे फैसले किसी सभ्य समाज को रिप्रेसेन्ट नहीं करते.."
सभ्य समाज ??...
कुछ लोग ऐसी ही भाषा समझते है ..!!!! मेरी दोस्त ने तो उसका पीछे करने वाली की मोटरसाइकिल ठोक डाली थी अपनी गाडी से .....

आर. अनुराधा said...

@ डॉ. अनुराग- "कुछ लोग ऐसी ही भाषा समझते है ..!!!! मेरी दोस्त ने तो उसका पीछे करने वाली की मोटरसाइकिल ठोक डाली थी अपनी गाडी से ....."
माफ करें, मेरे ख्याल से इन दोनों उदाहरणों में बेसिक फर्क है।

मैं सहमत हूं उस लड़की से जिसने अभद्र कमेंट पब्लिक करके उस शख्स की पब्लिकली और पब्लिक से मरम्मत करवाई वाह, यही लोकतांत्रिक तरीका है किसी गलती के खिलाफ। और जिसने कराटे का दाव जमाया, उसकी हिम्मत भी काबिले-तारीफ है। लेकिन बड़ी बात यह है कि इसके लिए पहले उसने प्रशिक्षण लिया था, सीखा था। ऐसी किसी भावी घटना की जानकारी के साथ नहीं, बल्कि उसकी संभावना और अपने बचाव के लिए खुद को तैयार रखने के लिए। उसकी हिम्मत के साथ-साथ कौशल भी जुड़ गया। लेकिन अनुराग जी की बताई घटना में मोटरसाइकिल से ठोकना तो किसी से भिड़ जाने जैसा है, बिना कोई कायदे का वार जाने। इसमें कुद को भी उतना ही नुकसान होता है, चोट लगती है। ऐसा त्वरित प्रतिक्रिया में कोई करता है, सोच-समझ कर नहीं।

डॉ .अनुराग said...

अनुराधा जी....जाहिर बात है....जानता हूँ....उसे चोट भी लगी थी....उद्देश्य सिर्फ उस विरोध को ..उस भावना को दिखाना था ....जहाँ किसी भी प्रकार की असभ्यता से असहमति है ....जहाँ मौन रह कर या अवोइड करके निकल जाने के खिलाफ एक फितरत है ....
पूरी बात को संदर्भ सहित जानने के लिए यहाँ पढ़िए

http://anuragarya.blogspot.com/2009/10/blog-post_14.html

कविता रावत said...

लातों के भूत बातों से नहीं मानते! ऐसे लोगों को मुहंतोड़ जवाब देकर फ्रेंडशिप लिस्ट से डिलीट कर देना ही अच्छा है..

Unknown said...

ठीक किया. यही करना चाहिए.

mukti said...

मैं भी सबक सिखाने में विश्वास रखती हूँ, पर पूरी सावधानी के साथ.इसके लिए मेरे ख्याल से हर लड़की को सेल्फ डिफेन्स का कोर्स करना चाहिए. इससे ना सिर्फ़ किसी मुसीबत का सामना करने में मदद मिलती है, बल्कि आत्मविश्वास भी बढ़ता है.
पहले तो हमें 'लोग क्या कहेंगे?' के डर से बाहर आना चाहिए. 'भली लड़की' की इमेज चाहे जितनी अच्छी लगती हो, पर सबसे ज्यादा नुक्सान हमारा ही करती है. खासकर जो लड़कियाँ बाहर निकलकर कुछ करना चाहती हैं. अपनी राह खुद बनाना चाहती हैं.

राजन said...

मुक्ति जी की बात से सहमत हूँ.लडकियों को सेल्फ डिफेंस का कॉर्स करना चाहिये.जो लोग इस तरह की हरकत करते है उन्हें किसी अक्रामक प्रतिक्रीया की उम्मीद बिल्कुल नहीं होती.जरा सा विरोध हुआ नहीं कि ये खुद को संभाल नहीं पाएँगे.परंतु फिर भी ऐसे मामलों में थोडी सावधानी तो बरतनी ही चाहिये.

रेखा श्रीवास्तव said...

लड़कियों के लिए स्वरक्षा के लिए प्रशिक्षण शिक्षा के प्राथमिक स्तर पर ही शुरू कर दी जानी चाहिए. ये साइबर क्राइम तो बहुत बाद में शुरू होता है. आज के हालात में jo घटनाएँ बच्चियों के साथ घट रहीं हैं उन पर अंकुश और स्वरक्षा के लिए ये आवश्यक हो चुका है.

Ajayendra Rajan said...

badhiya laga...

Pratibha Katiyar said...

मुक्ति जी बिलकुल सही कह रही हैं, आधी लड़ाई तो हम उसी वक़्त जीत लेते हैं जब हम 'लोग क्या कहेंगे' वाले सिंड्रोम से बहार आ जाते हैं. सेल्फ डिफेंस तो बहुत ज़रूरी है.

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