Wednesday, May 25, 2011

बैडमिंटन खेल है या तमाशा

अप्रैल में विश्व बैडमिंटन फेडरेशन ने एक नियम बनाया था कि सभी महिला बैडमिंटन खिलाड़ी शॉर्ट्स की जगह स्कर्ट पहनें। चीन, इंडोनेशिया, जेनमार्क, स्वीडन, मलेशिया, भारत सहित दुनिया भर की खिलाड़ियों ने इस मुहिम पर आपत्ति जताई है और इसे सेक्सिस्ट और पिछड़ी हुई बताया है। हमारे राष्ट्रीय महिला आयोग ने भी इसे गलत बताया। फिर फेडरेशन ने इसे लागू करने के लिए एक महीने की मोहलत दे दी। एक जून से इसे लागू होना है। लेकिन फिलहाल इस नियम में इतनी छूट है कि कोई खिलाड़ी चाहे तो स्कर्ट के नीचे पहले की तरह शॉर्ट्स भी पहन सकती है। नियम का पालन न करने पर 250 डॉलर का जुर्माना।

कहा गया कि “बैडमिंटन के आकर्षक प्रस्तुतीकरण को सुनिश्चित करने” (ensure attractive presentation of badminton) के लिए यह नियम बनाया गया है। फेडरेशन के उपाध्यक्ष पाइसान रांगसिकीट्फो का कहना है कि वे इस तरीके से महिलाओं के खेलों को बढ़ावा देना चाहते हैं जिनकी लोकप्रियता घटती जा रही है। यानी फेडरेशन के लिए ज्यादा प्रायोजक और ज्यादा पैसा।

प्रेरणा शायद टेनिस से मिली हो, जहां विलियम्स बहनों और यहां तक कि अपनी सानिया मिर्ज़ा का खेल भी कई बार इसी स्कर्टी कारण से देखा जाता है। कोई खेल का जानकार हो तो उसे पता होगा कि बैडमिंटन के मूव टेनिस से अलग होते हैं। चूंकि टेनिस ज्यादा पावर वाला गेम है, इसमें हमेशा घुटमे मोड़ कर शॉट्स लिए जाते हैं, जिसमें हमेशा कमर के ऊपर से ही गेंद को मारा जाना चाहिए। इसमें पूरे हाथ की ताकत लगती है। जबकि बैडमिंटन में शटल हल्की होती है, कोर्ट छोटा होता है, इसलिए सिर्फ कलाई के बल पर भी खेला जा सकता है। इसलिए बैडमिंटन में खुद को पोजीशन करने के लिए खिलाड़ी सहजता से एक लंबा डग भरकर भी शटल तक पहुंच सकता है। यानी पैऱ फैलाने को उसे ज्यादा जगह चाहिए जबकि टेनिस में कोर्ट कवर करने के लिए दौड़ना ज्यादा महत्वपूर्ण है। महत्वूर्ण बात यह है कि जब देखा गया कि महिला टेनिस खिलाड़ियों के खेल से ज्यादा कपड़ों की चर्चा होती है, और यह पॉपुलर हो चुका है (खेल नहीं खिलाड़िने!), तो बैडमिंटन को भी उसी स्तर तक पहुंचाने के लिए फेडरेशन खुलकर अपनी राय जता रहा है।

ख्याल रहे कि विश्व बैडमिंटन फेडरेशन की काउंसिल के 25 सदस्यों में से सिर्फ दो महिलाएं हैं।

पैसा फेक, तमाशा देख?

5 comments:

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

फेडरेशन वालॊं की सोच वाहियात है। इसका जोरदार विरोध होना चाहिए।

खिलाड़ी जिस वेश में सहज महसूस करे उसे वही पहनने की छूट होनी चाहिए। वर्जित करना है तो खेलों में कामुकता प्रदर्शित करने की व्यापारी प्रवृत्ति को ही वर्जित करना चाहिए। लेकिन यहाँ उल्टी गंगा बहाने की तैयारी है।

मनोज कुमार said...

इस सोच का विरोध होना चाहिए।

kushwaha said...

Purush pradhan samaj me aurat Bhog ki bastu hai

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

आपने अपनी पोस्टमें पुरुषवादी सोच का लेबल लगा रखा है....ये पुरुषवादी सोच का नहीं बाजारवादी सोच का परिणाम है. जिस तरह से हर उत्पाद को बेचने के लिए महिला मॉडल की जरूरत होती है....गानों में देखिये पुरुष कलाकार पूरे कपडे पहनता है और महिला के पास कपड़ों की नितांत कमी होती है......ट्वेंटी-ट्वेंटी मैच में देखिये चीयर्स लीडर्स लड़कियां ही हैं...सवाल ये उठता है कि क्या महिलाओं का काम बस पुरुष के लिए खुद को वस्तु बनाना ही रह गया है?
यही मानसिकता खेल में भी जारी है....इसे विरोध से नहीं व्यापक विरोध के बाद ही रोका जा सकता है...
जय हिन्द, जय बुन्देलखण्ड

Richa P Madhwani said...

http://shayaridays.blogspot.com

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