Friday, June 3, 2011

महिलाओं की आजादी की शुरुआत रसोई से ही होती है

(कल ही फेसबुक पर एक परिचित ने फिर कुछ पाक कला के नमूने पेश किए और उस पर उसे खूब तारीफ मिली। मैं जानती हूं कि वह कलाकार है, सिर्फ रसोई घर में नहीं, कागज़ और कैमरे पर भी। लेकिन उसकी लगातार इस तरह की पोस्ट्स देखकर लगा कि कहीं वह इसी में अपनी सारी ऊर्जा तो नहीं खर्च कर दे रही है? तब लगा कि रसोईघर ही स्त्रियों को घर से सबसे ज्यादा बांधता है। वहां से मुक्ति मिले तो वह बाकी के संसार पर नजर डाले। वरना उसी के बीच, उसी संदर्भ में तारीफों और चर्चाओं में वह जीवन गुजार दे तो भी आश्चर्य नहीं। यह लेख रिजेक्ट माल ब्लॉग में 2008 में लिखी एक पोस्ट का एक बड़ा हिस्सा है। इसे फिर से याद करने का मन हुआ और आपसे साझा करने का भी। स्थितियां वैसे भी 3-4 साल में क्या ही बदलती हैं! इसके लिए तो पीढ़ियां खर्च होनी होती हैं।-अनुराधा)

मेरे जैसी मध्य वय, मध्य वर्ग की कामकाजी महिलाओं को आजादी महसूस करने के मौके कम ही मिलते हैं। एक मनपसंद किताब पढ़ने, बुनाई-सिलाई, या कोई और शौक पूरा करने के लिए थोड़ी-थोड़ी आजादी कई किश्तों में चुरानी पड़ती है। रविवार को जब आम तौर पर घर के सभी लोग छुट्टी मना रहे होते हैं, गृहणी को सबकी छुट्टी अच्छी तरह मन जाना सुनश्चित करने के लिए इंतजामात करने में व्यस्त रहना पड़ता है।

रसोई में पति-बच्चों का फर्माइशी कार्यक्रम, आने वाले हफ्ते के लिए खुद अपने और सभी के लिए रसोई से लेकर दफ्तर तक की तैयारी और सामाजिकता निबाहने का जिम्मा उसी के कंधों पर होता है। यह ब्यौरा अगर जिंदगी का एक टुकड़ा नहीं तो कई टुकड़ों का सच्चा कोलाज जरूर है।

त्यौहार के दिन घर में भारी माहौल है। गृहस्वामिनी नहा-धो कर धार्मिक नियमों का पालन करते हुए उपवास रख कर सुबह से त्यौहार के मुताबिक तरह-तरह के पकवान बना रही है, पूजा की तैयारी कर रही है, पूजा कर रही है, घर सजा रही है, संभाल कर रखे गए नए बर्तन निकाल रही है, सबकी सुविधाओं का ख्याल रख रही है, वगैरह-वगैरह। मेहमानों, मिलने-जुलने वालों की खातिर में कोई कसर न रह जाए। घर के बाकी सब लोग सज-धज कर घूम रहे हैं, फोन पर शुभकामनाओं का लेन-देन कर रहे हैं, आस पड़ोस में मिल-जुल रहे हैं।

दोपहर तक त्यौहारी भोजन अनुष्ठान के बाद वह निढाल हो चुकी है। फिर भी उसे उठना है। रात को पति के मित्र का परिवार खाने पर आ रहा है। उनसे 'अपने हाथों का लज़ीज़ खाना' खिलाने की चिरौरी और फोन पर मेहमानों से उनकी पाक कला का बखान भी पति कर चुके हैं। अब कोई सुनवाई नहीं, बचाव का कोई रास्ता नहीं। बात रख कर पति का सम्मान बढ़ाने का दारोमदार भी तो उसी पर है।

आखिर डिनर भी बीता, भले ही आधी रात हो गई। और इस तरह त्यौहार और छुट्टी का एक और दिन तमाम हुआ। अगले दिन सुबह की रोजाना वाली भागमभाग के बाद आखिर दफ्तर में लंच ब्रेक में ही उसे राहत के दो पल मिल पाए, जिसकी तलाश उसे पिछले पूरे दिन रही थी। अगर वह ये परंपराएं छोड़ कर फुर्सत काटने की सोचे तो किसी के कहने के पहले खुद ही अपराध बोध महसूस करने लगेगी। उसकी ग्रूमिंग इसी तरह हुई है।

बचपन से यही संस्कार उसमें भरे गए हैं। इनसे अलग कोई भी व्यवहार उसे गलत लगता है। आखिर उसके जीवन का मकसद ही है परिवार को संभालना ताकि सब आगे बढ़ें और वह स्थिर रहे चट्टान की तरह। पर कभी किन्हीं कमजोर पलों में उसे लगता है कि न तो वह पत्थर की तरह मजबूत है और न ही निर्जीव। वह भी जीती-जागती इंसान है। लेकिन अपने संस्कारों के घेरे से बाहर उसकी सोच भी जवाब दे जाती है।

11 comments:

मनोज कुमार said...

हर शनिवार रविवार को श्रीमती जी की यही शिकायत रहती है कि छुट्टी के दिन भी हमें छुट्टी नहीं मिलती ... उल्टे और भी ज़्यादा काम हो जाता है।
साच में “ आखिर उसके जीवन का मकसद ही है परिवार को संभालना ताकि सब आगे बढ़ें और वह स्थिर रहे चट्टान की तरह। पर कभी किन्हीं कमजोर पलों में उसे लगता है कि न तो वह पत्थर की तरह मजबूत है और न ही निर्जीव। वह भी जीती-जागती इंसान है। लेकिन अपने संस्कारों के घेरे से बाहर उसकी सोच भी जवाब दे जाती है।”
हर पुरुष को यह पोस्ट पढ़ना चाहिए। शायद कुछ सीख मिले।

vandan gupta said...

गृहिणी की ज़िन्दगी बयाँ कर दी।

rashmi ravija said...

बिलकुल सही बात कही है...अपनी माँ-चाची- बुआओं को आँगन में होली खेलने आए लोगो से जरा देर को होली खेल, वापस रसोई में चढ़ी कढाई का ध्यान रखते, देखते हुए ही बड़ी होती है लडकियाँ...और ये बात अंदर तक पैठ जाती है कि परिवार के बढ़िया खान-पान कि पूरी जिम्मेवारी उनके ऊपर ही है.
आज वे घर से बाहर निकल रही हैं....ऑफिस जा रही हैं,पर ये भावना पीछा नहीं छोड़ती...
दुसरो की क्या कहूँ...जब से ब्लॉग्गिंग में व्यस्त हो गयी हूँ...केक...गुलाब-जामुन...गुझिया बनाना बहुत कम हो गया है...ये अपराध-बोध जब तब मन को सालता रहता है.

hamaarethoughts.com said...

so sweet...I love the whole post!
I also pity the women since her liberation is jus not working outside but she is very much attached with the daily chores which doubles her work.

प्रज्ञा पांडेय said...

rasoyin men bahut samay jaata hai .. stree ka bahumooly jeewan rasoyiin ki bhent chadh jaata hai .

SM said...

every home has a same kitchen.
and same story to go with it.

राजन said...

फिर भी बहुत सी महिलाओं को तो तारीफ के बजाए ताने ही सुनने को मिलते है.इतना सब करने के बाद भी वे बचा खुचा ही खाती है और अपने स्वास्थ्य की परवाह नही करती जबकि पति या बच्चों की कोई फरमाईश पूरी करने में कोई कसर रह गई तो खुद ही अपराध बोध से भर जाती है.

archana said...

लगता है कभी कभी, परन्तु वह पल क्षणिक है. घर का काम, अगर थकान से चूर न कर दे तो करने में भी कोई हर्ज़ नहीं है. ज्यात्दी तब होती है जब काम करने की इच्छा न होते हुए काम करना पड़े. मैं उनीवेर्सिटी में पढ़ाती हूँ, विभागाध्यक्षा हूँ और कलम के साथ साथ कलछी और झाड़ू भी चलाती हूँ. हाँ! अगर मैं नहीं करना चाहती तो अलग बात है. काम बोझ तब बनता है जब वो अपनी क्षमता से बाहर हो जाये.

Unknown said...

सच में ऐसा ही है .. अच्छा लगा आपका लेखा पढ़ कर ! शुक्रिया
मेरी नयी पोस्ट पर आपका स्वागत है : Blind Devotion - स्त्री अज्ञानी ?

आर. अनुराधा said...

ये टिप्पणियां पढ़कर और समाज में देखकर इतना तो समझ में आता है कि लोग समझ रहे हैं कि कुछ गड़बड़ है। यह महत्वपूर्ण है। इसी से आगे रास्ता निकलता है, इस गड़बड़ को ठीक करने की कोशिशों का और उन पर आम सहमति बनने का। तभी यह गड़बड़ी, चाहे सोच में हो या करने में, ठीक हो पाएगी। उम्मूद है, जल्द ही।

व्योम said...

बहुत सुन्दर और प्रभावक लिखा है।

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