Tuesday, July 5, 2011

देसी संस्कृति के ठेकेदार चेतें- सुरेंद्र प्रताप सिंह

सुरेंद्र प्रताप सिंह या एस पी सिंह। वही, आजतक वाले! नहीं याद आया..."तो ये थी खबरें आजतक इंतजार कीजिए कल तक..." अब तो अच्छी तरह याद आ गया होगा चश्मे वाला एक भाव-प्रवण पारदर्शी चेहरा जो अपने खास लहजे की हिंदी के साथ-साथ खबरें बेहतरीन ढंग से देने के लिए भी बेहद लोकप्रिय हुआ। शायद उससे ज्यादा पॉपुलर पत्रकार भारत ने नहीं देखा है। वे पत्रकारिता के पहले और आखिरी सुपर हीरो थे।

उन्हीं एसपी के आलेखों-साक्षात्कारों और आजतक की कुछ कड़ियों और उनके लिखे फिल्म 'पार' के संवादों के ट्रांसक्रिप्शन को एक किताब में समेटा गया है। 'पत्रकारिता का महानायक- सुरेंद्र प्रताप सिंह संचयन' का संकलन-संपादन आर. अनुराधा ने, यानी मैंने किया है। 27 जून को उनकी 14 वीं बरसी पर उनकी याद में आयोजित कार्यक्रम में इस किताब को प्रथम अवलोकन के लिए रखा गया।

महानायक पत्रकार सुरेंद्र प्रताप सिंह की रचनाओं का यह पहला संचयन बाजार में आ गया है। इसे राजकमल प्रकाशन ने छापा है। पेपर बैक में पृष्ठ संख्या है- 460 और कीमत है-250 रुपए। जल्द ही यह पुस्तक ई-खरीद के लिए भी उपलब्ध होगी। फिलहाल ईमेल कर यह पुस्तक मंगवाई जा सकती है। (marketing@rajkamalprakashan.com)

इसी पुस्तक में शामिल, इंडिया टुडे हिंदी के उनके नियमित कॉलम मतांतर (15 सितंबर 1993, मतांतर, इंडिया टुडे) में प्रकाशित इस लेख की पृष्ठभूमि अभी के बवली-मनोज प्रकरण से बिल्कुल मिलती-जुलती है। ऐसी घटना पर एसपी के विचार एकदम साफ थे। एस पी महिलाओं और समाज के पिछड़े तबकों के साथ खड़े रहने से कभी पीछे नहीं रहे। उनका यह लेख भी इसी का सबूत है।
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मुजफ्फरनगर के गांव खंदराबली में छह अगस्त की शाम सरिता और सतीश की नृशंस हत्या का मामला अब और जटिल हो गया है। जटिल इसलिए कि उस अमानवीय हत्याकांड को वे लोग जायज ठहराने की कोशिश कर रहे हैं जो समाज के एक वर्ग के नेता माने जाते हैं और जिनसे अपेक्षा है कि वे अपनी नेतृत्व क्षमता से इस देश और समाज को एक रहने योग्य समाज बनाएंगे।

प्रारंभ में जब यह समाचार मिला, तो अनेक लोगों ने यह कहा कि इस तरह का काम मध्ययुगीन समाज में ही संभव है, यानी इस अपराध को दरिद्रता, अशिक्षा और पिछड़ेपन से जोड़ दिया गया। कहने का तात्पर्य यह था कि आधुनिक नागर सभ्यता के पढ़े-लिखे समाज में यह कुकर्म संभव नहीं और न ही इसे समाज की मान्यता मिल सकती है। हालांकि तब भी यह विश्लेषण अति सरलीकरण का शिकार था। इस हत्याकांड में सिर्फ एक परिवार के लोग ही शामिल नहीं थे। भले ही वास्तविक हत्या तीन लोगों ने की हो पर उस हत्याकांड का फैसला एक पंचायत ने किया था। पंचायत यानी कम से कम पांच लोग तो उसमें होंगे ही- गांव के सबसे प्रभावशाली पांच लोग, वहां सैकड़ों की संख्या में गांव वालों ने अपनी आंखों के सामने होते हत्याकांड को निर्विकार भाव से देखकर उस पर अपनी सहमति की मुहर लगाई। इसलिए इसे यह कह कर खारिज नहीं किया जा सकता कि यह एक देहाती, पिछड़े और मध्ययुगीन समाज की प्रतिक्रिया थी। निश्चय ही इसकी जड़ें कहीं बहुत गहरी हैं।

किसानों के नेता तथा जाट समुदाय के सिरमौर महेंद्र सिंह टिकैत ने जब बर्बर हत्याकांड को जायज ठहराया तो अधिकांश लोगों को आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि यह माना जाता है कि टिकैत मध्ययुगीन मानव मूल्यों में विश्वास करते हैं। महिलाओं, दलितों तथा आधुनिक युवाओं की महत्वाकांक्षाएं तथा जीवन शैली एवं टिकैत के मानव मूल्यों में कोई सामंजस्य नहीं है। टिकैत के अनुमोदन ने इसे उस ग्रामीण समाज का भी अनुमोदन प्रदान कर दिया है जो मानवीय संबंधों में इस तरह की विकृति का जवाब इसी भाषा और शैली में देने में विश्वास करता है। यह हमारे समाज की विडंबना ही है कि एक तरफ देश सैकडों कानूनों की मदद से कानून का राज स्थापित करने की चेष्टा में लगा रहता है तो दूसरी ओर उसके धुर विपरीत चलने वाली व्यवस्था को भी करोड़ों का मूक समर्थन मिलता रहता है। इस विरोधाभास को भी न्यायोचित ठहराने वाले लोग मौजूद हैं जो यह दावा करते हैं कि गांवों में बसने वाले भारत का शहरी इंडिया से कोई सामंजस्य नहीं बैठ सकता और उस दुनिया में तो वही चलेगा जो परंपरागत रूप से उस समाज की विशिष्टता रही है।

लेकिन उत्तर प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पंडित लोकपति त्रिपाठी भी उस जघन्य हत्याकांड को इस आधार पर जायज ठहराने लगे कि हमारे समाज से संबंधों की मर्यादा इस तरह के दुराचार की अनुमति नहीं देती तो इसका कोई क्या करे। पंडित लोकपति त्रिपाठी पिछड़े, दरिद्र और मध्ययुगीन समाज का प्रतिनिधित्व नहीं करते। आधुनिक जीवन के विभिन्न पहलुओं से उनका घनिष्ठ सरोकार रहा है। ऐसे स्वानमधन्य पंडित कमलापति त्रिपाठी के कुलदीपक यदि इस जघन्य तथा बर्बर व्यवहार का अनुमोदन करते हैं तो स्पष्ट है कि हमारे समाज के सोच में भारी विरोधाभास छिपा हुआ है उससे हम अपरिचित हैं।
खंदरावली के अनपढ़ ग्रामीणों की बात फिलहाल छोड़ देते हैं, लेकिन टिकैत और लोकपति जिन मानव मूल्यों की वकालत करते हैं, उस सोच के पीछे के कारणों की पड़ताल करना आवश्यक है। वरना बिहार के किसी गांव में अपने को घोर क्रांतिकारी कहने वाले राजनीतिक समूह के लोग अपनी बर्बर दंडसंहिता चलाते रहेंगे, तो राजस्थान के गांवों में आदिवासी तबके के लोग अपनी न्यायव्यवस्था को राष्ट्र-राज्य की न्याय व्यवस्था से ऊपर मान कर उसे तरजीह देते रहेंगे। और जिन्हें हम नागर तथा सभ्य और आधुनिक कहते हैं वे अपनी राजनीति चमकाने के लिए कभी परंपरा, कभी प्राचीन जीवन मूल्य और उनके आदर्श और शहरी सभ्यता के मुकाबले ग्रामीण सभ्यता को श्रेष्ठ सिद्ध करने के प्रयास में इन बर्बर प्रयोगों का अनुमोदन करते रहेंगे।

3 comments:

डा० अमर कुमार said...

यह पुस्तक अवश्य ही सँग्रहणीय होगी ।
प्राप्त करने का प्रयास करता हूँ ।
बहुत दिनों बास आप दिखीं,
अच्छा लगा !

डा० अमर कुमार said...

कृपया सुधार लें
बहुत दिनों बास आप दिखीं X
बहुत दिनों बाद आप दिखीं

आर. अनुराधा said...

हां अमर जी, इसी किताब और कुछ दूसरी पढ़ाई-लिखाई में व्यस्त थी। चाहती तो हूं लगातार इधर सक्रिय रहना, पर समय शायद ठीक से मैनेज नहीं कर पाती।
आप भी इस किताब को जरूर पढ़ें। उनके लेख और विचार आज भी उतने ही ताजा और सामयिक लगते हैं। समाज की कई कमियों-बुराइयों पर उनका लिखा सोचने को मजबूर करता है।

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