Sunday, July 24, 2011

हंगामा है क्यों बरपा

किन्हीं कपड़ों में महिलाओं के शरीर के कुछ हिस्से कम या ज्यादा दिखाई पड़ते हैं, इससे समाज (स्त्री-पुरुष दोनों- ज्यादा पुरुष, थोड़ा-बहुत स्त्री) इतना विचलित होता क्यों दिखता है! क्या सबके पास अपने-अपने शरीर नहीं हैं? दोनों के शरीरों में क्या और कितना फर्क है कि वह किसी को इतना रहस्यमय लगे कि वह दिख भी जाए तो रोमांच हो उठे! स्त्री की एड़ी दिखे या कलाई, गलती से कपड़ा उलटने से दिखे या जान बूझ कर खुले-आम दिखाई जाए, सभी पुरुष की नजर में है और सभी पर सीसी टीवी कैमरे की तरह लगातार नजर रखी जा रही है।

स्त्री और पुरुष के शरीर में मूल फर्क सिर्फ देखने वाले की नजर में है। और अगर कपड़े पहनने के बाद तथाकथित रहस्य और गहरा हो जाता है कि जाने उसके पीछे-नीचे क्या है, तो भी यह देखने वाले के दिमाग और सोच की समस्या है।

Your own mind is a sacred enclosure into which nothing can enter except by your permission. – Arnold Bennett


ऐसिहासिक प्रमाण बताते हैं कि गर्म इलाकों में हमारे बूढ़-पुरनिए कुछ नहीं या न्यूनतम कपड़े पहनते थे। उसमें शरीर को छुपाने की नहीं बल्कि बाहरी कारकों से शरीर को सुरक्षा देने की बात थी। बल्कि आज भी पूर्वोत्तर, अंडमान, दक्षिण के मूल निवासी कपड़े नहीं पहनते। हां, कुछ मोती-मनका या पेड़-पौधों के हिस्सों से अपने शरीरों को सजाते-संवारते जरूर हैं।

जब इंसान अफ्रीका के गर्म इलाकों से ठंडे इलाकों की ओर बढ़ा तो मौसम की मार और चोट-खरोंच से बचने के लिए उसने जानवरों के चमड़े लपेटने शुरू किए फिर पेड़ों की छाल से, भेड़-बकरियों के फर से, ऊन से, कपास के धागों से बुन कर अपने शरीर को ढकने के लिए सुविधाजनक सामग्रियां बनानी शुरू कीं। मकसद था, ठंड से बचना, जंगलों-झाड़ियों, पत्थरों, हवाओं, जानवरों की चोट से, आग से, कीड़ों-मकोड़ों, जीवाणुओं, संक्रमणों से, जहरीले रसायनों, धूल-मिट्टी से, हथियारों से शरीर को बचाना, सुरक्षा देना।

फिर, जैसी कि मनुष्य और दूसरे जीवों की भी आदत होती है, कपड़ों के आधार पर भी वर्गीकरण होने लगे। ज्यादा शक्तिशाली, बलशाली, समृद्ध, सक्षम, समर्थ, सुदर्शन...। जब मानव ने बसना शुरू किया, परिवार बनाया तो उस समय दूसरे परिवारों के साथ कई बातों पर प्रतिस्पर्धा थी, संघर्ष भी था। ऐसे में कपड़े और पहनावा भी शक्ति और दूसरे मूल्यों से जोड़ा जाने लगा और उसके नियम-से बनते गए।

If most of us are ashamed of shabby clothes and shoddy furniture, let us be more ashamed of shabby ideas and shoddy philosophies…- Albert Einstein


कभी कम पहनना ताकत और शान की निशानी बना तो कभी ज्यादा पहनना। अपने परिवार, समूह, समुदाय की पहचान बताने और बनाने के लिए भी खास प्रकार के कपड़े पहने या न पहने गए। जब कपड़े भी परिवार-समाज में ऊंच-नीच के तहत बंट गए तो इसमें विनय-शील से लेकर दोस्ती-दुश्मनी और प्रेम-राग तक के प्रतीक नत्थी होते गए।

There is much to support the view that it is clothes that wear us and not we them; we may make them take the mould of arm or breast, but they would mould our hearts, our brains, our tongues to their liking. - Virginia Woolf


जो इस वर्गीकरण में नीचे हुए, वे ताकतवरों के लिए अपने ताकतवर होने का अनुभव कराने, अहं की तुष्टि- मनोविनोद, सेवा-सहूलियत का भी साधन रहे। दूसरी तरफ जर-जमीन की तर्ज पर जोरू भी संपत्ति की कतार में ला दी गई। तब उसे सुरक्षित रखने, दूसरों से छुपाने-ढकने और साथ ही संवार कर रखने का चलन चला। तब उसके लिए कपड़ों की ‘मर्यादाएं’ तय की गईं।

धीरे-धीरे कपड़ों, उनके प्रकार-आकार, रंग के सामाजिक-सांस्कृतिक अर्थ तय हो गए। लेकिन एक समाज-समुदाय में किसी पहनावे के एक कारक का जो अर्थ था, दूसरे समुदाय या समुदायों में भी वही अर्थ हो, यह भी कतई जरूरी नहीं था। भारत में कुछ सदी पहले तक भी कम कपड़े पहनना बेहद आम था। फिर ठंडे इलाकों से पुर्तगाली, मुगल, अंग्रेज आए और उन्होंने अपने वहां के ज्यादा कपड़े पहनने के चलन को यहां भी जारी रखा और हुकूमत करते हुए उसे लागू भी किया और राजा की देखा-देखी प्रजा के अपनाने से, सांस्कृतिकरण के जरिए प्रचलन भी शुरू किया।

आज भी कई तौर-तरीके अलग-अलग देश-समाज में भिन्न अर्थ रखते हैं। भारत में महिलाओं का निस्संदेह शालीनतम परिधान साड़ी नाइजीरिया में अश्लील कहलाता है और इस पर पाबंदी का कानून बनाने की कवायद चल रही है। कानून बन गया तो वहां साड़ी पहनने वालों को तीन महीने की जेल या 100 डॉलर जुर्माना!

लब्बो-लुबाब यह कि कपड़े हमने बनाए और इसे अर्थ भी हमने दिए और अपनी मर्जी से दूसरों के लिए भी अर्थ तय कर दिए। कपड़े पहनने का मूल मकसद कहीं गायब हो गया। महिलाओं के लिए यह एक और पाबंदी, बंधन का सबब बना, उनकी गुणवत्ता जांचने का एक और पैमाना बना। इन्हीं अधकचरे पैमानों पर औरतें जिस-तिस द्वारा, जब-तब नापी जाती हैं और उन पर फैसले जारी होते रहते हैं। उसी का नतीजा है कि समाचार के कारोबार के अलावा भी हर किसी क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं के काम का आकलन उनके कपड़ों पर ध्यान दिए बिना नहीं किया जाता। उनका परफॉरमेंस बनाम उनके कपड़े वाला सवाल इसीलिए महत्वपूर्ण बनाकर पेश किया जाता है।

और यह पैमाना घर पर, परिवार में भी पूरी तरह सक्रिय रहता है। बहन कॉलेज में क्या और किन रंगों के कपड़े पहन रही है, पत्नी किस मौके पर क्या पहने- पारिवारिक आयोजनों में अनिवार्यतः साड़ी, बच्चे के स्कूल के पेरेंट-टीचर मीट में ट्राउजर्स, सिनेमा-पिकनिक के लिए जींस... (ये पैमाना दिल्ली के मध्य वर्ग का है, दूसरी जगह दूसरा हो सकता है।) सब पैमाने पर नापा जाता है और उन परिणामों के आधार पर ही महिला के कुल व्यक्तित्व का आकलन होता है।

औरतों के कपड़े पुरुषों के लिए चिंता-विचार का मुद्दा हैं। पर क्या जरूरी है कि उस अरचनात्मक, नकारात्मक सोच का ख्याल करने में महिला अपनी ऊर्जा खर्च करे! कतई नहीं। और जड़ की बात तो यह है न कि पुरुष महिलाओं के कपड़ों पर (या कपड़ों की अनुपस्थिती पर) इतना ध्यान क्यों देते हैं। घर में जो अपनी महिलाओं को ढंक-तोप कर चलने की सलाहें देते हैं, खुद समुद्र किनारे नहा रहे विदेशी सैलानियों को आंखें गड़ाकर बेशर्मी से देखते हैं। अच्छा है कि वे विदेशी इन देसी नजरों की परवाह नहीं करते और कहीं न कहीं ऐसी घूरती आंखों को खिसियाने पर मजबूर करते हैं।

काश ऐसा हो कि औरतें इतना बदन उघाड़ें, इतना उघाड़ें कि पुरुषों की आंखें देख-देख कर थक जाएं, उकता जाएं। उन्हें ऐसे शरीर देखने की आदत हो जाए। और तब वे ऐसे घूरना बंद करेंगे, दूसरों के कपड़ों की कमी-बेशी की चिंता करना छोड़ काम के काम में ऊर्जा लगाएंगे।

29 comments:

उम्मतें said...

अच्छा आलेख !

राजन said...

हालाँकि सभी महिलाओं के लिए तो ये भी सहज नहीं होगा.लेकिन अब शायद ये ही एक तरीका रह गया है.वैसे साडी पहनने का वो तरीका जिसमें मिड्रीफ दिखाई दे यानी नाभि के नीचे साडी पहनने को भारत में भी खासकर छोटे शहरों मे गलत माना जाता है चाहें साडी को कितना भी शालीन परिधान क्यों न समझा जाता हो.

राजन said...

मैंने लगभाग दो साल पहले एक बार हंस में स्त्री की भाषा से संबंधित एक लेख पढा था जिसमे चोखेरबाली ब्लॉग का भी जिक्र था तब पहली बार इच्छा हुई थी इस ब्लॉग को देखने की.इस प्रकार हिंदी ब्लॉगजगत से मेरा परिचय चोखेरबाली के ही जरीये हुआ था.तब से अब तक काफी अच्छे लेख भी पढने को मिले.लेकिन पिछले कुछ समय से सभी सदस्य सुस्त पड गये है.सुजाता जी तो दिखाई ही नहीं देती.एक दो पोस्टें बीच में आई जरूर लेकिन माफ कीजिए इनमें वो पहले वाली बात नजर नहीं आई.एक अच्छे प्रयास को जारी रखना चाहिये.जब आप महिलाओं से जुडे किसी खास मुद्दे पर लिखते नहीं है तो अभी भी कई जगह कहा जाता है (नकारात्मक स्वर में ही सही)कि कहाँ है चोखेरबाली वाले वो चुप क्यों है.यानी इस ब्लॉग ने एक पहचान तो बनाई है,इसे बरकारर रखें.शुभकामनाएँ.

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

सटीक-सार्थक पोस्ट.
किसी भी बात को देखने के कई सन्दर्भ हो सकते हैं. महिलाओं के पहनावे को लेकर हमेशा से तर्क-वितर्क होते रहे हैं...वैसे इस मुद्दे पर पूवाग्रह्बहुत हैं इस कारण से इस तरह खुले रूप में अपने विचार व्यक्त करने बंद कर दिए हैं पर...
एक बार अपने आसपास की महिलाओं के पहनावे पर फिर से विचार करियेगा....कुछ अंगों को ढांक लेना ही वस्त्रों का काम है तो वो और भी कम कपड़ों से चल जायेगा. बहरहाल....सबकी अपनी सोच है....
जय हिन्द, जय बुन्देलखण्ड

मनोज कुमार said...

विचारणीय आलेख।

आर. अनुराधा said...

@राजन, धन्यवाद। आपने सही कहा कि अब चोखेर पर हलचल कम हो गई है। हमें भी यही लगता है कि इसकी जो पहचान बनी है, उसे कायम रखना है और इसके मकसद को सामने रख कर काम करते रहना है। और महिलाओं के खिलाफ जो मानस है, उसके खिलाफ तो बोलना-समझाना लगातार चलना चाहिए ताकि कुछ बदलाव आ सके, स्त्रियों को कुछ बेहतर माहौल मिल सके, समाज आगे बढ़े।

आर. अनुराधा said...

@डॉ. कुमारेंद्र सेंगर, अपने आस-पास के पहनावे पर मैं नजर नहीं डालती या उससे अलग होकर मैंने ये पोस्ट लिखी हो, ऐसा नहीं है। बल्कि उसी पर जब तरह-तरह की टिप्पणियां गंभीर जगहों पर भी देखने-पढ़ने को मिलीं तब इस मसले के मूल में जाने और मामले को समझने की कोशिश की।

और फिर कहना चाहूंगी कि कपड़ों का मकसद बाहरी भौतिक कारकों से रक्षा करना है, न कि नजरों, विचारों जैसे अभौतिक कारकों से। अगर किसी के कपड़े आपको कम लगते हैं तो क्यों? दरअसल हमारे गर्म देश (धुर उत्तर को छोड़ दें तो) में तो साल में 8 महीने कपड़ों का कोई मतलब नहीं है। लेकिन सांस्कृतिक कारणों से कपड़ों को और-और अर्थ हमने दे दिए। अब उन तथाकथित मानकों को इस स्तर तक पहुंचा दिया गया है। कई पेशों में महिलाओं को उसी काम के लिए रखा जाता है और उनसे यही उम्मीद की जाती है। और उसी आधार पर महिलाओं के काम का मूल्यांकन तक किया जाता है।

आप खुद सोचिए, कोई पुरुष क्वार्टर पैंट में, सैंडो बनियान पहन कर बाजार में चलता है, तो किसी को कोई दिक्कत नहीं, पर कोई लड़की (बड़ी महिलाएं अब भी कम ही ऐसा करती हैं) यह करे तो सब पाबंदियां याद आती हैं देखने वालों को। क्यों? लोग इसे लेकर सहज क्यों नहीं हैं?

SAJAN.AAWARA said...

Pta nahi kab is des me istri ko purush ke brabar darja diya jayega........?
Na ye smaaj kuch karta hai,
na ye neta kuch karte hai.
Ap bhi intjaar kijiye,
hum bhi intjaar karte hain...

Jai hind jai bharatPta nahi kab is des me istri ko purush ke brabar darja diya jayega........?
Na ye smaaj kuch karta hai,
na ye neta kuch karte hai.
Ap bhi intjaar kijiye,
hum bhi intjaar karte hain...

Jai hind jai bharat

Anonymous said...

(यदि संविधान का उलंघ्घन न हो) क्यों ना विदेशों की तरह न्यूड पार्क ही खोल लिए जाएँ?
सार्वजनिक न सही, निजी पार्क सही

यही बेहतर होगा समान विचारधारा वाले व्यक्तियों के लिए

आर. अनुराधा said...

@ बी एस पाबला- यही तो दिक्कत है। जो भी नई बात हो, लोग उसे गलत चश्मे से देखना चाहते हैं और गलत दिशा में ले जाना चाहते हैं। यहां मामला कपड़े (न) पहनने की आजादी से ज्यादा उसके और उउससे पहनने वाली के आकलन का है। और यह कोई 'विचारधारा' की बात नहीं है। एक सरल लेकिन जटिल बना दिए गए मसले के उलझाव दूर करने की जरूरत तो है। और इसका समाधान 'न्यूड पार्क' तो कतई नहीं है। वैसे, मेरे ख्याल से ऐसे मसलों का समाधा आप जैसे लोगों के जरिए ही निकलेगा।

डॉ .अनुराग said...

राजन जी ने ठीक कहा है ...कुछ सार्थक बहसों की ओर महत्वपूर्ण मुद्दों पर इस स्पेस के इस्तेमाल की आवश्यकता है ....बोल्डनेस की अधिक आवश्यकता लिबास में नहीं विचार ओर व्योवाहार में उन चीजों को उतारने में है जिसमे हर गलत बात के प्रतिकार करने हेतु आवश्यक साहस भी शामिल है ... आत्मनिर्भरता ओर शिक्षा भारत में स्त्रियों के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता है ....बाकी चीज़े उनके साथ आ जाती है .......एक बात ओर जब तक जीवन रहेगा पुरुषो के लिए स्त्रियों का शरीर भोग की वास्तु बना रहेगा ..ये एक तल्ख सच्चाई है ...(अमेरिका में सबसे ज्यादा रेप के केस है ...कहने को वो आधुनिक पढ़े लिखो का देश है .). भारत में ये एक सामाजिक समस्या है जिसके कई पहलु है ओर इसे दुरस्त होने में कई साल लगेगे . ओर इसके लिए घरो में बच्चो को बचपन से मां बाप के द्वारा स्त्रियों -बहनों के प्रति ज्यादा संवेदनशील रवैया रोपने की जरुरत है ......जिसे एक मां पिता , परिवार के बुजुर्ग ओर समाज ही कर सकता है .... सबकी भागीदारी की जरुरत है ..

Dorothy said...

विचारणीय आलेख...आभार.
सादर,
डोरोथी.

Asha Joglekar said...

सभी नंगे घूमें तब भी शायद पुरुष को स्त्री शरीर ( और उलट भी )का आकर्षण रहेगा ही । यह तो हारमोन्स का करिश्मा है ।

आर. अनुराधा said...

"जब तक जीवन रहेगा पुरुषो के लिए स्त्रियों का शरीर भोग की वास्तु बना रहेगा ..ये एक तल्ख सच्चाई है ..."???
तो क्या स्त्रियों की कोई गति नहीं? इत्मीनान से सड़क पर चलने, बिना डरे घर से निकलने भर की तो छूट चाहिए भई!

Anonymous said...

31 जुलाई को होने वाले Slut Walk में कितनी महिला ब्लॉगर जा रहीं हैं या कितने पुरूष ब्लॉगर अपने परिवार की महिलाओं-युवतियों-बच्चिओं को भेज रहे हैं यह आँकड़ा कहीं मिल सकता है क्या?

यह प्रश्न यहाँ इसलिए कि बात ब्लॉगिंग मंच पर हो रही

Slut का हिन्दी अर्थ यहाँ क्लिक कर देखा जा सकता है

Unknown said...
This comment has been removed by the author.
Unknown said...

@बी एस पाबला, सामंती दिमाग से उपजी शब्दावली का हवाला देने और अपनी समझ बताने के लिए शुक्रिया. क्या इस शब्दावली में पुरुषों के लिए भी इसी तरह का कोई शब्द है.

Anonymous said...

@ bharats

मेरी समझ का विश्लेषण करने से बेहतर होगा कि अनुराधा जी के आलेख पर अपना मत दें। हवालों और शब्दावलिओं की कमी नहीं है

batkahi said...

behad saahas aur spashtata ke sath uthaye gaye savalon se ru-b-ru karvane ke liye anuradha ji ko sadhuvaad....paridhan aur uske andar ki deh jarur bade mudde hain vimarsh ke...par dimag to kisi aavran ko nahin maanta...iski safai ki jarurat hai.....

yadvendra

dr amit jain said...

अरे भाई , इन औरतो को कपडे पहनने है या नहीं या कितने पहनने है ये उन का मसला है , हमें तो सिर्फ अपनी नजरो पर कण्ट्रोल रखना सीखना होगा जों अवसरवादी बन जाती है , घर में कुछ ,बाहर कुछ जब हम घर और बाहर एक ही नजर से देखेगे तो ये सवाल ही खतम हो जायेगा

आर. अनुराधा said...

" हमें तो सिर्फ अपनी नजरो पर कण्ट्रोल रखना सीखना होगा जों अवसरवादी बन जाती है , घर में कुछ ,बाहर कुछ जब हम घर और बाहर एक ही नजर से देखेगे तो ये सवाल ही खतम हो जायेगा"

वाह, अमित जैन (जोक्पीडिया ) आप तो वाकई सूत्र वाक्य कह गए। धन्यवाद।

आर. अनुराधा said...

@ बी एस पाबला-
आपके लिंक ने जहां पहुंचाया, उम्मीद है, और लोगों ने भी वह अर्थ देखा है। और, आप जान लें कि जान बूझ कर इसे स्लट वॉक या हिंदी में बेशर्मी मोर्चा नाम दिया गया है।

Unknown said...

@ बी एस पाबला-
इस पोस्ट से एक दोस्त के साथ तीन दिनों तक हुयी बहस याद आ गयी. हम तीन दिनों तक ऐसे ही एक मसले पर भिड़ते रहे थे. उसे विदेश के किसी क्रिकेट स्टेडियम में बिकनी पहन कर बैठी लड़कियों (आई पी एल की चीयरलीडर्स के कपड़ों पर भी) पर एतराज था. मैंने उनके पीछे बिना टी शर्ट के बैठे लड़कों का हवाला दिया लेकिन वो लड़कियों की इस कम कपड़े पहनने वाली बात को पचा नहीं पा रहा था. वो चीयरलीडर्स का विरोध कर रहा था लेकिन उन्हें वहां पर पूरे कपड़ों में उछलते हुए देखना चाहता था. उसे महिलाओं के लम्बे बाल, उनका सजना-संवरना, गहने पहनना उनकी खूबसूरती बढ़ाने वाले कारक लगते थे. आज उस भाई ने शादी कर ली है, अफ़सोस कि एक लडकी के साथ की है. जिस समाज में बच्चों को मूर्तियों के आगे जबरन आंख बंद कर, हाथ जुड़वा दिए जाते हों, जहाँ फ्रॉक पहनने पर बच्चियों को अपनी चड्डी छुपाने की हिदायत दी जाती हो वहां ऐसे लोग 'पैदा हो जाना' अचरज नहीं है. मेहनत तो इससे बाहर आने में लगती है पाबला जी.

Anonymous said...

प्रतिक्रियाओं से कथा याद आई:

दो सन्यासी कहीं जाते हुए नदी पार करने पहुंचे. एक महिला नदी की उफनती धारा से सहमी दुविधा में खडी थी. दोनों सन्यासियों में से एक ने उस महिला को पीठ पर लाद कर नदी पार करवाई. फिर दोनों अपनी राह चल पड़े. दूसरा क्रोधित सन्यासी फूट पड़ा अपने साथी पर कि गुरू जी से शिकायत करूंगा क्योंकि तुमने नियम तोड़ा है?! पहला मुस्कुरा कर बोला " तुम उस महिला को अभी तक लादे फिर रहे हो? मैं तो उसे बीस मिनट पहले उतार आया हूँ!!

Unknown said...

पुरुषवादी व्यवस्था का विरोध करने वाली आधुनिक स्त्री आज अंतत: पुरुष के इशारे पर, पुरुष के लिए, पुरुष के अनुरूप खुद ही खुल और खोल रही है. -प्रभु जोशी
http://www.tehelkahindi.com/indinoo/national/924.html

आर. अनुराधा said...

" यह भारतीय समाज का पश्चिम के वर्जनाहीन खुलेपन की तरफ बढ़ने की प्रक्रिया का पूर्वार्द्ध है."

किस पर और कैसी वर्जना की बात करते हैं ये श्रीमान? भारत में जहां महिलाओं की दो फीसदी आबादी भी अपनी मर्जी से नौकरी करने या न करने का फैसला नहीं कर पाती, परिवार की सदस्य होने के बाद भी एक बराबर की हैसियत नहीं रखती, कपड़े चुनने पहनने के पहले आस-पास के सभी 'अथॉरिटीज़' से सहमति चाहती है, वहां आप वर्जनाहीनता की तरफ बढ़ने की बात करते हैं। मैं इंतजार में हूं, वह शुभ दिन कब आएगा।

जिन विज्ञापन शूट्स का ये जिक्र इस गंभीर मसले पर इतने हल्के ढंग से करते हैं, वही जताता है कि उनकी सोच यहीं तक पहुंचती है। क्या नहीं जानते कि ये विज्ञापन भी पुरुषों को दिखाने के लिए ही हैं, जो अपने घर-परिवार की औरतों को कहें कि ऐसे कपड़े न पहनना (जो कि लेखक का भी आशय लगता है, कि महिला पाठकों, अगर अपने को 'शरीफ' कहलाना है तो इस तरह की जीन्स न पहनना) या जिनसे वे देह-सुख (या नेत्र-सुख) पाते हैं, उन्हें कहें कि ऐसे कपड़े प्राइवेट में पहनना- या छोड़ो, मैं ही ला देता हूं तुम्हारे लिए ऐसे कपड़े, तुम इन कपड़ों में कितनी खूबसूरत (read sexy) लगती हो! बाजार ने कई मुहावरे गढ़े हैं, सही है, लेकिन इन्हें गढ़ने और जबर्दस्ती लागू करने वाला और मनवाने वाला कौन-पुरुषवादी समाज। महिलाएं अभी उस सोच से मुक्त नहीं हुई हैं कि अपने पैमाने खुद गढ़ें।

क्या मणिपुर में सेना के अत्याचार के खिलाफ हर उम्र की महिलाओं का नग्न होकर आक्रोश में प्रदर्शन करना भी 'न्यूडिटी' पश्चिमी अंधानुकरण है? अगर ऐसा है, तो कृपया पुरुष ही बताएं और तय कर दें कि कौनसे विरोध के तरीके मान्य हैं, अपनाए जाएं कि पुरुषों को जोर का झटका लगे और वे समझें कि कहां गड़बड़ी है। औरतों को मुक्ति अपने कपड़ों से नहीं बल्कि इस विचार से चाहिए कि उनके लिए क्या ठीक है और क्या गलत। कोई और उन्हें क्यों बताए कि यह पहनने से उनके साथ रेप हो सकता है और यह पहनने से नहीं! क्या रेप करने वाले या ऐसा सोचने वाले पर कोई पाबंदी नहीं होनी चाहिए। सारी जिम्मेदारी पीड़ित पर ही? ये तो वैसा ही हुआ कि सड़क पर न चलो, दुर्घटना हुई तो तुम्हीं जिम्मेदार, वह तेज रफ्तार वाहन-चालक को तो हक है तेज चलाने और टक्कर करने का। हम ही बच कर क्यों नहीं रहे! हद है। और इस गारंटी की उम्मीद कतई न करें कि प्रस्तावित 'शालीन' कपड़े पहनने से वे पुरुषों के सरेआम दुर्व्यवहार से बच जाएंगी।

Akanksha Yadav said...

वाकई नजरिया बदलने की जरुरत है. प्रभावी आलेख.
__________________
'शब्द-शिखर' : स्लट-वाक और बे-शर्म लोग

सुजाता said...

औरतों को मुक्ति अपने कपड़ों से नहीं बल्कि इस विचार से चाहिए कि उनके लिए क्या ठीक है और क्या गलत।
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beshak , bilkul sahi.

tor potky chody said...

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अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री को सिर्फ बाहर ही नहीं अपने भीतर भी लड़ना पड़ता है- अनुप्रिया के रेखांकन

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