Tuesday, August 23, 2011

मैं अन्ना नहीं होना चाहूंगीः अरुंधती राय


"अन्ना की मांगें गांधीवादी नहीं हैं।" अरुंधती राय की राय सोचने को मजबूर कर देने वाली हैं। 22 अगस्त को द हिंदू में छपे लेख का अनुवाद एक ब्लॉग पढ़ते-पढ़ते में मिल गया तो यहां लिंक दे रही हूं। मनोज पटेल ने खुद ही इसका अनुवाद किया है। साभार।

10 comments:

एक स्वतन्त्र नागरिक said...

सामायिक बात.जरा एक और मुद्दे पर पढ़ें और कृपया अपनी राय अवश्य दें. सचिन को भारत रत्न क्यों?
http://sachin-why-bharat-ratna.blogspot.com

राजन said...

एक तरफ तो अरूंधति जी इरोम शर्मिला के अनशन को जनसरोकारों से जुडा बता रही है और उनकी उपेक्षा से दुखी है वही एक 74 साल के बुजुर्ग द्वारा भ्रष्टाचार के खिलाफ किये जा रहे अनशन को धमकी या ब्लैकमेलिंग बता रही है.अब ऐसे गालबजाऊ बुद्धजीवियों की ये ही तो कमी है.वैसे अब तक अरूंधति को पता चल गया होगा कि खुद इरोम शर्मिला ने भी अन्ना के आंदोलन का समर्थन किया है.

राजन said...

जहाँ तक बात है कश्मीर या पूर्वोत्तर की तो यहाँ मामला अलगाववाद का है!जो कि देश की एकता और अखँडता के लिए खतरा है.हाँ मानवाधिकार हनन के मामलों में दोषियों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई होनी चाहिये और सैन्य शासन में कुछ हद तक ढील दी जानी चाहिए परंतु सेना को पूरी तरह हटाना या उनके विशेषाधिकार खत्म करना वहाँ की स्थानीय जनता के लिए भी खतरनाक हो सकता है फिर आज की तुलना में दुगने निर्दोष मारे जाएंगे(क्योंकि अरूंधति या राजेन्द्र यादव जैसे खुद तो आतंक से निपटने के लिए वहाँ जाने से रहे).लेकिन किसी भी पृथकतावादी सशस्त्र आंदोलन का समर्थन नहीं किया जा सकता.जबकि जनलोकपाल के लिए जो कुछ किया जा रहा है वह न सिर्फ अहिंसक है बल्कि संविधान के दायरे में है.कश्मीर में विकास कार्य न हो पाने और नक्सल समस्या के मूल में भी कहीं न कहीं भ्रष्टाचार भी है(हालाँकि तब भी मैं हिंसक विरोध का समर्थन नहीं करता) तब इसके खिलाब एक देशव्यापी आंदोलन को समर्थन देने में अरुंधति को क्या समस्या है.और पता नहीं जनलोकपाल में उन्होंने ऐसा क्या देख लिखा जिससे उन्हें तानाशाही की आहट सुनाई दे रही है या जिसके कारण ये आंदोलन उन्हें भारतीय राज्य व्यवस्था को उखाड फैंकने जैसा लग रहा है.

राजन said...

मेरा स्पष्ट मानना है कि ये हमारी जिम्मेदारी है कि हम इरोम शर्मिला का अनशन तुडवाने की पहल करे.सरकार यदि वहाँ सेना के अधिकारों में कुछ कमी कर देती है या मानवाधिकार हनन की शिकायतों पर प्रभावी कार्रवाही का आश्वासन दें तो इसे पर्याप्त मान लेना चाहिये फिलहाल सेना और इंटेरलिजेंसियों पर विश्वास करने के अलावा कोई चारा नहिं है.

राजन said...

वैसे कभी मैं भी अरुंधति की बातों को बहुत गंभीरता से लेता था.

RAJANIKANT MISHRA said...

१. फुर्सत के क्षणों में भ्रष्टाचार पर चिंता ज़ाहिर कर इतिश्री कर लेने वाली शहरी मध्यमवर्गीय ज़नता भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाने को सड़क पर उतरी... क्या देश के लोकशाही के लिए यह अच्छा लक्षण नहीं है ?

२. अभी तक देश और समाज के प्रति निरपेक्ष बने रहने के कारण उचित ही आलोचना का पात्र रहा शिक्षित युवा डिस्को,पब,इंटरनेट - मोबाईल चैट से परे सामाजिक और अनिवार्यतः शासन के मुद्दे पर अपनी राय बना रहा है.. बहस कर रहा है...प्रदर्शन कर रहा है.. देश की जनतांत्रिक प्रणाली के लिए क्या यह शुभ संकेत नहीं ?

३. चुनाव के चुनाव प्रतिनिधियों का चेहरा देखने वाली जनता आज अपने सांसद से सवाल कर रही है.. अपनी बात समझा रही है.. अपनी मांगे रख रही है.. केवल निजी फायदे के लिए एम्.पी, एम्.एल.ए. से पास जाने वाला आम आदमी से लेकर कभी भी उनके पास न जाने वाले बुद्धिजीवी तबका अपने सांसद से भ्रष्टाचार के खिलाफ एक कड़ा और प्रभावी कानून मांग रहा है. विधायिका सदस्यों से कार्यपालिका के कामों जैसे की सड़क या हैण्ड पम्प की मांग से परे कानून बनाने को जिम्मेदार लोगों से कानून की मांग करना क्या संसदीय लोकतंत्र की परिपक्वता का परिचायक नहीं है ?

४. आपको याद है पिछली बार कब कोई आन्दोलन बिना बस के सीसे चकनाचूर किए संचालित हुआ था ? स्व संयम और अहिंसा का जो पाठ यह देश इस आन्दोलन में पढ़ रहा है, क्या वह भावी किसी भी आन्दोलन का आदर्श नहीं होना चाहिए ? जब सब मान बैठे हों कि बहरी सरकारें केवल तोड़ फोड़, आगजनी या बम्ब बारूद कि भाषा समझती हों तब एक आन्दोलन निष्ठां, मेहनत सांगठनिक कौशल और आहिंसा के रास्ते सरकार को पानी पिला देता है. अन्य आवश्यक मुद्दों पर संघर्ष करने वाले समूहों और व्यक्तिओं के लिए क्या यह नज़ीर नहीं है ? यह आन्दोलन क्या अपनी प्रबंधकीय क्षमता और आदर्शों के अद्भुत मेल के लिए अकादमिक संसथानों में पढाये जाने योग्य नहीं है?

५. भ्रष्टाचार के खिलाफ और लोकपाल के समर्थन में चलने वाले आन्दोलन को मिला जन समर्थन दलितों , आदिवासियों और अन्य वंचितों को लेकर चलने वाले आन्दोलनों को कमज़ोर तो नहीं करता..बल्कि उनकी सफलता का भी दरवाज़ा खोलने की कोसिस ही करता है.. क्या यह महज़ इर्ष्या है या कई सम्माननीय लोग सतासीन दल के हांथो में खेल रहे है?

५. यह सही है की केवल कानून कुछ नहीं कर सकता है.. समाज जैसा होता है सरकार वैसी ही होती है.. पर व्यवस्था में सुधार संभव है या देश के हर नागरिक को पूर्ण रूप से नैतिक बना देना. और क्या समाज के पूरी तरह से नैतिक होने के इंतज़ार में हम बैठे रह सकते हैं ? और क्या यह नैतिक समाज का यूटोपिया राज्य की 'आधुनिक' व्यवस्था को खारिज नहीं कर देगा ?

६. राष्ट्रीय अस्मिता के चिन्हों को समाज को पुनः लौटा रहा है यह आन्दोलन.. गांधीवादी कहा जाना गाली नहीं है .. बंदेमातरम को दक्क्षिणपंथीओं के हाथ से तो इन्कलाब जिंदाबाद को वामपंथीओं से वापस ले राष्ट्र को सौंप रहा है यह आन्दोलन... क्या अपने राष्ट्र प्रतीकों को वापस क्लेम करना आन्दोलन कि प्रतिगामिता है ?

मुझे लगता नहीं है की सरकारी लोकपाल बिल का खोखलापन किसी से छिपा है.. न ही इस बात को रेखांकित करने की ज़रूरत है की असाधारण समय असाधारण प्रयासों और विकल्पों की मांग करता है......

स्वप्नदर्शी said...

अरुंधती और बाकि सब लोगो का आन्दोलन पर सवाल उठाना ठीक है. मुझे लगा कि कुछ दूरबीन से देखने की कसरत उन्होंने की है, उसकी भी ज़रुरत है, शायद माइक्रोस्कोप से देखने की भी. भले ही इस आन्दोलन से कुछ हो या न हो, मैं इससे उत्साहित हूँ, लोग इतनी बड़ी संख्या में बाहर आये, साथ आये, पहली दफा उन्हें दूसरे लोग भीड़ और न्यूसेंस नही लग रहे है. अपने लग रहे है, अपनी शक्ति की तरह दिख रहे है. ये सकारात्मक है. नही तो पिछले २-३ दशकों से वोट डालने भी नही जा रहे थे. लोकपाल के पास होने और उसके प्रभावी होने न होने से भी ज्यादा ये बात अपने मायने रखती है कि जनतंत्र को लोगों ने नेताओं के पास गिरवी नही रखा है, उसमे भागीदारी कर रहे है. हर तरह के लोगों पर इस आन्दोलन ने रोशनी डाली है. जो सबसे ज्यादा क्रांति, सामाजिक बदलाव की बात करते थे, वों लोग कोनों में दुबक गए है. और गाली खाने वाला मध्यवर्ग सड़क पर है. हर तरह के लोग है, हर तबके, हर धर्म और भाषा के. सच तो ये है कि ९०% को नही पता कि लोकपाल क्या है, वों शायद इसीलिए जुड़े है कि अपने गुस्से और उम्मीदों के लिए उन्हें एक जगह मिल गयी है. मुझे उम्मीद है कि जब इतने विविध तरह के लोग एक जगह खड़े होंगे तो एक दूसरे से बहुत कुछ सीखगें, उनकी चेतना देर सबेर बदलेगी. सरकार और राजनैतिक पार्टियाँ अगर दर के मारे सिर्फ ५% अपराधियों को भी टिकट आने वाले चुनाव में नही देती, और उनकी जगह २५-३० अच्छे लोग संसद में पहुच जाते है तो ये भी भारी जीत होगी. करोड़ों लोगो के हिस्से कुछ सामाजिक लाभ आएगा.
किसी जनांदोलन को पहले से तय रास्तों पर नही चलाया जा सकता, न ही वों चलता है, समय और समाज के हिसाब से उसकी अपनी स्वतंत्र विकास की दिशा बनती है. मुझे लगता है, अरुंधती इस बात को भूल गयी है. और बहुत सारे दूसरे लोग भी सांस बांधे यही कर रहे है...
हमारी पीढ़ी ने उत्तराखंड का आन्दोलन देखा, वी पी सिंह के समय का मंडल देखा, उससे पहले आपातकाल के दरमियाँ हुये आंदोलनों के बारे में सिर्फ पढ़ा है. सब के सब बड़े समुदाय की ऊर्जा से चलने वाले, जाहिर तौर पर अराजनैतिक आन्दोलन थे, कुछ दूध में उबाल की तरह, कुछ बहुत थक जाने और परेशानी में उल्टी कर देने के बाद शांति जैसे मिलती है, उसी तरह जनाक्रोश का अंत हुआ. हो सकता है इस आन्दोलन का भी यही अंत हो..., पर इस बात की मुझे उम्मीद है कि कुछ गुणात्मक परिवर्तन देश की चेतना में ज़रूर आएगा.

राजन said...

अरूंधति को सवाल उठाने है तो उठाए लेकिन कम से कम झूठे तथ्यों का सहारा तो न ले.

SM said...

who gives the salary to this lady Arundhati?

सुजाता said...

किसी जनांदोलन को पहले से तय रास्तों पर नही चलाया जा सकता, न ही वों चलता है, समय और समाज के हिसाब से उसकी अपनी स्वतंत्र विकास की दिशा बनती है

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sahamat !

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