Friday, December 9, 2011

गौरैया-सी पल्लवी की गुरुआई

- मंजुरानी सिंह

(मंजु दी गुरुदेव रबींद्रनाथ के बनाए शांतिनिकेतन विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग की विभागाध्यक्ष हैं। हाल ही में उनसे मुलाकात हुई और उन्हें जानने का मौका मिला था। उनकी एक रचना लघुपत्रिका 'अनौपचारिका' में छपी थी, जिसका यह हिस्सा सभी से साझा करने का लालच मैं रोक नहीं पाई- अनुराधा)

आज सवेरे पल्लवी जब रोज की तरह मुझे गुड मॉर्निंग कह अपनी गजदंती हंसी प्रदान करने आई, तब बाहर चिड़िया बोल रही थी, कई-कई आवाज और स्वर, समवेत संगीत- कौन इन्हें सुनें, कौन इन्हें गुने- किसे फुर्सत है? मुझ पर घड़ी की सुइयों का शासन चल रहा था। जरूरी कागज़ात व्यवस्थित कर बैग में रख रही थी, भूल न जाऊं कुछ, तभी पल्लवी ने पूछा- मम्मी कौनसी चिड़िया बोल रही है?


मेरा मन झल्लाया, दिल हुआ कि कहूं, चुप रहो अभी, डिस्टर्ब न करो, मैं भूल जाऊंगी कुछ जरूरी बातें, पर मैंने उत्तर दिया- बुलबुल। मैं जानती हूं, झल्लाकर जवाब दूं, तब भी पल्लवी के गजदंत हरसिंगार या चंपा के फूल बिखेरते रहते हैं, प्यार से बोलूं तब भी। मैं उसकी मानी हुई मम्मी हूं, किसी ने सिखाया नहीं, न ही उसके पास कोई चालाकी है। बल्कि कई बार मना किया गया है, बुआ कहने की हिदायत दी गई है, पर वह है कि मम्मी, मम्मू, सेली (सहेली मम्मी) आदि जो मर्जी संबोधन बनाती और गोदती रहती है।

अपनी कहूं तो झल्लाते मन को अंतस का कोई हमेशा सचेत करता, हिदायत देता चलता है। जब इतने पक्षियों को आप बोलने-गाने से रोक नहीं सकते तब इसी नन्हीं बच्ची को क्यों रोकना चाहते हैं। ढेर सारे में वह भी एक। आप बनती हैं- शिक्षित, विद्वान, प्रतिष्ठान और न जाने क्या-क्या, फिर मन की बनावट ऐसी विकृत क्यों? विद्यार्थियों को आए दिन वसुधैव कुटुंबकम का आदर्श याद कराने वाली प्राध्यापिका के लिए एक असामान्य बच्ची को पालना इतना कठिन क्यों होता जा रहा है?

सारे प्रश्न, सारे द्वंद्व मेरे हैं, वह निर्द्वंद्व है, सहज है, छल-प्रपंच से परे, तर्त-वितर्क से भी परे है। उसके साथ दो साल से रह रही हूं मैं। मैंने उसकी गुरुआई में अपनी सहनशीलता विकसित की है, नहीं के बराबर खीझने या झल्लाने की। फूल, तितली, चिड़िया, घास, पौधे, पेड़, मौसम, बादल किसी के स्वभाव पर तो मेरा नियंत्रण नहीं, इनका मनमानापन, इनका दीवानापन, इनका मतवालापन, इनका बेमतलबपन- सब हमारे जीवन के अंश हैं, अंग हैं। बस एक बच्ची को, उसके स्वभाव को अपने जीवन का अंग, अंश स्वीकार पाने में ही कृपणता? तुम समर्थ और वह निरीह, ‘ठुकरा दो या प्यार करो’ की-सी उसकी स्थिति-परिस्थिति, इसलिए क्या उसे अक्सर विजातीय तत्व होने का अहसास दिलाने का प्रयास?

अंतस में कोई जैसे हर क्षण गुरुआई करता रहता है और प्रत्यक्ष में मेरे हाथ पल्लवी को छाती से चिपका लेते हैं, उसके गौरैया से चेहरे को सहला देते हैं, बिखरे बालों को संवार देते हैं।

4 comments:

राजेश उत्‍साही said...

अनुराधा जी संध्‍या गुप्‍ता जी नहीं रहीं। शायद यह खबर आपके पास होगी ही। चोखेर बाली की वे लेखिका थीं। कम से कम उन पर एक पोस्‍ट तो यहां बनती है।

सुजाता said...

यह बेहद दुखद है, मुझे उनके बीमार होने की खबर तो थी लेकिन वे नही रहीं यह जानना बेहद हृदय विदारक है ।मेरे लिए बहुत शॉकिंग क्योंकि कल्ही चोखेरेबाली का ड्राफ्ट बॉक्स देख रही थी तो पता लगा कि 6-7 महीने पहले उन्होंने अपनी बीमारी के बारे मे कभी पोस्ट लिखने की कोशिश की थी जो अधूरी थी...यह जानकर मैने उन्हें मेल लिखा कि उम्मीद है आप स्वस्थ होंगी अब !

अफसोस !मै ड्राफ्ट बॉक्स की लम्बी लिस्ट मे छिपी यह अधूरी पोस्ट पहले क्यों नही देख पायी ।
परमात्मा से दिवंगत आत्मा की शांति केलिए प्रार्थना और उनके परिवार के लिए धैर्य की कामना है!

सुजाता said...

राजेश जी से अनुरोध है कि यदि वे सन्ध्या जी की कोई स्मृति हमसे साझा कर पाएँ तो हम आभारी होंगे।

आर. अनुराधा said...

उनके ड्राफ्ट पोस्ट को मैंने पहले भी देका था, लेकिन उम्मीद थी कि वे जल्द ही बीमारी से उबर कर उसे संशोधित करके पोस्ट करेंगी, इसलिए चुप रही। उन्हें इस बीच दो-एक मेल भी भेजे, पर जवाब नहीं आया, फोन नंबर खोजने के लिए भी एक टिप्पणी उनके ब्लॉग पर छोड़ी थी, पर वहां से भी जवाब नहीं मिला। अब जागरण की खबर से पता लगा है। सचमुछ हमें यह खबर पहले पता होनी चाहिए थी। अफसोस उनके जाने का। फिर भी वे अपने तईं काफी काम कर गईं। हम याद रखेंगे।

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