Wednesday, December 28, 2011

DIRTY PICTURE : आदमी को भला दिखाने के लिए स्त्री को बुरा बनाना ही पड़ता है


यह इत्तेफाक ही रहा कि माधवी (भीष्म साहनी का नाटक) जिस दिन पढा उसी के अगले दिन DIRTY PICTURE देखने का मौका मिला जिसका मुझे बहुत दिनों से इंतेज़ार था। यह इत्तेफाक कोई आम बात ही थी पर शायद मेरे लिए नही।दो साल से जिसने कलम नही उठाई वह इस इत्तेफाक के कारण लिखने पर मजबूर हो जाए तो इसे सामान्य घटना नही माना जा सकता।राजकुमारी माधवी कष्ट उठाकर कईं कठोर बलिदान करके ऋषिपुत्र गालव का विश्वामित्र को दिया गुरुदक्षिणा का वचनपूरा करने का माध्यम बनती है।तीन बच्चे खोती है खूबसूरती और जवानी खोती है पर अंत मे उसे गुमनामी ,दर्द और अकेलेपन केअलावा कुछ नही मिलता। गालव उसे अंत मे इसलिए अपनाने से इनकार कर देता है कि वह अनुष्ठान करके चिरकौमार्य के वरदान का इस्तेमाल पुन: नही करना चाह्ती और जिस रूप मे है उसी रूप मे आज गालव उसे अपनाए यह चाहती है।वह गालव के साथ कहीं भाग जाना चाहती थी लेकिन दीक्षांत समारोह के दिन वह अपनी यह इच्छा अकेले ही भाग कर पूरी करती है ....वह कहाँ भाग गयी ?.......क्यों भाग गयी ?......उसका क्या हुआ ? .....
माधवी के पिता ययाति जिन्होने माधवी को दान मे गालव को दे दिया इसलिए कि उनका दानवीर होने के यश को क्षति न पहुँचे ...।वे महान दानवीर हैं .. विश्वामित्र अपने शिष्य गालव की ऐसी परीक्षा ली वह महान है .....गालव सच्चा साधक है ,होनहार है .......माधवी की चर्चा कहीं नही है .....!माधवी अंत मे कटाक्ष करती है -“गालव तुम ज़रूर एक दिन ऋषि गालव बनोगे !”
गन्दी पिक्चर की गन्दी,घटिया वैम्प सिल्क को सिल्क बनाने वाली फिल्म इंडस्ट्री को यह बरदाश्त नहे होता कि हीरो-प्रधान दुनिया मे एक वैम्प के एक गाने के सहारे ठंडे डिब्बे मे बन्द फिल्में भी चल रही हैं।गन्दगी बनाने वाले कोई और देखने वाले कोई और लेकिन वे सब भले हैं केवल सिल्क बुरी है।पत्रकार नायला सब जानती है और मानती है कि आदमी को भला दिखाने के लिए स्त्री को बुरा बनाना ही पड़ता है।वह अपनी समीक्षाओं मे हमेशा सिल्क को बुरा गन्दा और घटिया कहती है।
सिल्क अपने ज़माने की विद्रोही थी। बिन्दास !जिस शरीर को लेकर समाज की मानयताएँ इतनी विडम्बना ग्रस्त हैं उस समाज मे सिल्क ने अपने शरीर का इस्तेमाल बेहद निर्लिप्त भाव से टूल की तरह किया। वह जानती थी आदमी कितना भला दिखे पर उसे यही चाहिए।जो वह लुक छिप के देखता है उसने उसी को खुलेआम कर दिया। जो शर्मनाक रहस्य ,फंतासी केवल बेडरूम तक महदूद थी उसे बेहद निर्मम तरीके से सिल्क ने स्क्रीन पर उघाड़ कर रख दिया।
वह बिन्दास थी ,दुविधा-मुक्त ! अपनी शर्तों पर जीने वाली। भला पुरुष-प्रधान समाज को ,हीरो-वरशिप करने वाले उद्योग को कैसे सहन होती ?आखिर वह एक खलनायिका ही तो थी? उसका इतना घमण्ड !! पुरुष -अहम ने उसे तोड़ना शुरु किया ....उस हद तक तोड़ा कि उसने 35 की उम्र मे आत्महत्या कर ली। बेहद गरीब परिवार से आई सिल्क का धाकड़ अन्दाज़ और सफलता दक्षिण भारतीय सिनेमा के इतिहास मे दर्ज है। फिल्म समीक्षक जानते हैं कि सिल्क ने हायरार्की के नियमो को तोड़ने की गुस्ताखी की थी।सज़ा तो उसे मिलनी ही थी।उसकी कड़ी मेहनत और लगन,काम के प्रति प्रतिबद्धताके बावजूद बाज़ार ने हमेशा उसकी प्रोमोशन सेक्स सिम्बल के रूप मे ही की।और इसी ने उसे एक इमेज मे कैद कर दिया। आज शीला की जवानी और मुन्नी की बदनामी सिल्क के तथाकथित ‘घटियापन’ से कहीं आगे निकल चुके।80 के दशक में सिल्क अपने समय से बहुत आगे थी। बॉडी-पॉलिटिक्स का जो विमर्श आज किया जाता है सिल्क उसी की उदाहरण है। स्त्री का शरीर न केवल कमतर है बल्कि उस पर उसका खुद का हक नही है।वह भले ही माधवी के रूप मे गालव का उद्देश्य पूरा करने मे अपनी खूबसूरती और यौवन का बलिदान दे दे या सिल्क के रूप मे स्त्री शरीर से जुड़े सारे टैबू तोड़ दे ...उसे मिलता अकेलापन ,गुमनामी और पीड़ा है।
इस देह -विमर्श की कितनी लानत-मलामत की जाए पर सच है कि स्त्री का शरीर उपनिवेश है।सत्ता , ताकत ,राजनीति और अर्थतंत्र इसका इस्तेमाल करते हैं।इसी से मुक्ति देह-मुक्ति है!

11 comments:

rashmi ravija said...

स्त्री का शरीर न केवल कमतर है बल्कि उस पर उसका खुद का हक नही है।

सही है...बहुत समय लगेगा समाज की ऐसी सोच को बदलने में....और क्या कभी बदलेगा भी...

kishor said...

अब एक तो बात तय तौर पर रखी जा सकती है सुजाता जी, अति उत्तपत्ति ( वस्तु/विचार/सिद्धान्त/राजनीति/शोषण/दुख इत्यादि सभी की ) के इस आधुनिक या उत्तर-आधुनिक युग में, पुरुष हो या स्त्री हर किसी को माधवी के अकेलेपन के कष्ट को संवेदनशीलता की हद तक खुद ही सहना सीखना चाहिए.

Unknown said...

i agree with you....rajendra kashayap

आर. अनुराधा said...

"इस देह -विमर्श की कितनी लानत-मलामत की जाए पर सच है कि स्त्री का शरीर उपनिवेश है।सत्ता , ताकत ,राजनीति और अर्थतंत्र इसका इस्तेमाल करते हैं।" --
एकदम से नब्ज़ पर हाथ रखा है सुजाता आपने। लेकिन इसी मुक्ति की उम्मीद में जाने कितनी सदियां बिता लीं, स्त्री ने, देह के साथ। इंतजार और अभी।

आर. अनुराधा said...

@ Kishore- 'चाहिए' वाली सारी अपेक्षाएं स्त्री से ही क्यों, और उसकी तकलीफों, कष्टों कीमत पर बाकी लोग अपना हित साधते रहें, क्यों और कैसे न्यायसंगत है?

सुजाता said...

आप सही हैं किशोर लेकिन स्त्री के लिए यह अकेलापन जानबूझ कर निर्मित किया है।जब भी वह खुद के लिए तय मानकों से हटकर चलने की कोशिश करती है तभी अस्वीकार्य,असह्य हो जाती है।'हीरोइज़्म' तो पुरुष मे ही हो सकता है न स्त्री हीरो बनने की कोशिश करेगी तो या कम से कम हीरो को हीरोबनाने का क्रेडिट भी लेने की कोशिश करेगी तो उसकी नियति या सिल्क स्मिथा की हो जाएगी या माधवी की सी।यही चिंता का विषय है।इसलिए मैने माधवी और सिल्क आमने सामने रखा है ।
जो आज हम कर रहे हैं उसका नतीजा आज-कल आने वाला नही .....उसे भी एक सदी तो लगेगी ही।

ra said...

aapne bahut sahi baat likhi hai .. maine kal hi dirty picture dekhi .. aur usmein sachchaai dikhaai hai ..

silk smitha sahi mein bold thi aur woh bani bhi bold in shareef logon ke kaaran thi aur baad mein poori akeyli pad gayi!!!

Unknown said...

Why do males suffer from the male ego ? There is a deep set psychological reason to it. Man has always known & found himself sexually inferior to a woman. Its a proven fact that a woman can have successive orgasms whereas a man can have only one at best two. The woman has to bear the pains of labor hence nature has given her higher sexual quotient too. She has more, better & lasting pleasure. This fact is known to man and makes him feel inferior in the heart of his hearts. As a defense mechanism what has risen in the male behavior is known as 'male ego'. Do you see man's actions, words, thoughts & speech? He always tries to prove something, win something. What do you want to prove? So also men has tried to subjugate woman throughout.. why because he is afraid & want to compensate fear by being more aggressive .... I think so

राजन said...

इस तरह की बातें मुझे तो समझ में नही आती हैं. आपके अनुसार सिल्क बिंदास है,वर्जनाओं को तोडने वाली हैं,अपने शरीर को टूल की तरह इस्तेमाल करती हैं जिसके लिए उसके मन में कोई अपराधबोध भी नही हैं.देह से मुक्ति के मायने इससे अलग और क्या होंगे?लेकिन फिर भी ऐसा अंत .तब क्यों इस देह से मुक्ति पर इतना जोर दिया जाए? बाजार तो ऐसी महिला को एक समय के बाद बाहर का रास्ता दिखाएगा ही.दुनिया में उगते हुए सूरज को ही सलाम किया जाता हैं और ये बात पुरूषों के संदर्भ में भी सही हैं आप मानें या न मानें इसलिए किशोर जी ने जो कहा वो सही ही है.लेकिन एक बात में अंतर हैं.सिल्क या परवीन बॉबी या ऐसी ही कुछ और महिलाओं कि दर्दनाक कहानियों में प्रेम में धोखा भी ऐसे अंत का कारण बना है.पुरूष प्रेम जैसे एहसास को जीवन के दूसरे पहलुओं या सुखों से अलग करके देख सकता है लेकिन ज्यादातर महिलाएँ ऐसा नहीं कर पाती.उन्हें इस कमजोरी को दूर करना चाहिए.

सुजाता said...

प्रफुल्ल जी ,
स्त्री से भय तो है इसमे कोई दो राय नही !
राजन,
अंत ऐसा होता है इसलिए मुक्ति की कामना ही नही करनी चाहिये यही बात तो पितृसत्ता समझाना चाहती है कि मुक्ति-वुक्ति छोड़ो वर्ना तुम्हारा भी हश्र यही होगा। ठीक वही बात है कि अफ्रीकी काले गुलाम यदि भागने का प्रयास करते थे तो उन्हे उनके मालिक कड़ी सज़ाएँ देते थे तो इसलिए ताकि कोई भी गुलाम यह गुस्ताखी न करे।
पर यह गुस्ताखी तो करनी ही होगी।स्त्री जितना घर से बाहर निकल रही है उतना ही उसका शोषण बढ रहा है लेकिन यह सब उसे हतोत्साहित् नही कर रहा। एक पत्रकार स्त्री की हत्या के बाद न जाने कितनी और नई लड़कियाँ पत्रकारिता मे एड्मिशन लेने हर साल चली आ रही हैं।
मुक्ति के लिए मिलने वाली सज़ा हतोत्साहित करने ,दिल तोड़ने ,साहस को खत्म करने के लिए होती है।पंख टूट ही क्यों न जाएँ चिड़िया सलाखों पर सर पटकती ही रहेगी,जब तक कि वे खुल न जाएँ या टूट न जाएँ।

आर. अनुराधा said...

आज डर्टी पिक्चर के जल्दबाजी में, सरसरी तौर पर, लेकिन लगभग सभी महत्वपूर्ण सीन्स को देख ही डाला। रेशमी उर्फ सिल्क अगर फिल्मों में न आती याजब फिल्मों में नहीं थी, तब भी देह को देह ही समझती थी औरसही समझती थी।लेकिन समाज औरत की देह को जाने क्याकुछसमझता रहता है,सिवाय उसकी वास्तविकता के। जबकि पुरुष या औरत भी पुरुष की देह को कभी संदर्भ से परे नहीं देखते। इस स्तर पर समानता की दरकार है।

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