Thursday, February 9, 2012

बुरी बात है

भवानी प्रसाद मिश्र

बुरी बात है
चुप मसान में बैठे-बैठे
दुःख सोचना , दर्द सोचना !
शक्तिहीन कमज़ोर तुच्छ को
हाज़िर नाज़िर रखकर
सपने बुरे देखना !
टूटी हुई बीन को लिपटाकर छाती से
राग उदासी के अलापना !

बुरी बात है !
उठो , पांव रक्खो रकाब पर
जंगल-जंगल नद्दी-नाले कूद-फांद कर
धरती रौंदो !
जैसे भादों की रातों में बिजली कौंधे ,
ऐसे कौंधो ।

3 comments:

vidya said...

बहुत बहुत खूबसूरत...

शुभकामनाएँ

व्योम said...

बहुत सुन्दर कविता

Pratibha Katiyar said...

Bahut khoob! Thanks Sujata.

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