Thursday, June 28, 2012

किसी मर्द का हाथ उठने से पहले ....


विदेशों मे बस जाने वाले पुरुषों की न ही मानसिकता बदलती है और न ही वहाँ ब्याह कर पहुँची लड़कियाँ पूर्वग्रह मुक्त हो पाती हैं  ।  कई भारतीय महिलाएँ  अमेरिका मे आकर भी माँबाप और समाज की झूठी  मान मर्यादा के लिए जीवन तबाह कर लेती हैं.| ...अंतर इतना है कि अमेरिका जैसे देश मे घरेलू हिंसा को छिपा सकना कठिन है। वर्षों से अमेरिका मे रह रहीं  हमारी मित्र सुधा ओम ढींगरा जी ने यह लेख चोखेरबाली के लिए भेजा है इसे यहाँ पोस्ट कर रही हूँ। 

 भारत में लड़की को होश सँभालते ही यह सुनने को मिलता है कि वह पराया धन है | पति का घर उसका अपना होगा | उस घर में डोली में जायेगी और वहाँ से अर्थी उठने तक उसे उस परिवार के साथ निभानी है, चाहे कुछ भी हो जाए, उसे मायके नहीं पलटना | स्वयं माँ -बाप भी उसे यही कहते हैं ..रोती हुई मत आना..मायके में हमेशा हँसती हुई आना..पिता की इज़्ज़त का ख़याल रखना, परिवार की मान- मर्यादा की लाज रखना | ससुराल में उसे दूसरे घर की समझा जाता है | लड़की से औरत बन कर भी वह अपने लिए धरती नहीं तलाश पाती | मनोवैज्ञानिकों की राय है कि ऐसे दबाब लड़कियों पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं और लड़कियों में आत्मविश्वास की कमी हो जाती है | प्रत्यक्ष रूप में यह दिखाई नहीं देती..ये दबाब धीमे ज़हर ( Slow Poisoning ) की तरह काम करते हैं | सुसराल में प्रताड़ित हो कर भी कई बार चुप रह जाती है, क्योंकि अवचेतन में पड़े, वे दबाब, उसके चेतन को अपने लिए खड़े होने से रोक लेते हैं |
     कई भारतीय महिलाएँ अमेरिका में आकर भी, माँ -बाप और समाज की झूठी मान-मर्यादा के लिए जीवन तबाह कर लेती हैं |

      शिष्ट, आकर्षित कम्प्यूटर इंजीनियर किटी पर्ल दो प्यारे बच्चों के साथ अमेरिका के शहर सेन फोर्ड में रहती है और कम्प्यूटर की प्रतिष्ठित कम्पनी आईबीएम में अधिकारी है | दस साल पहले उसकी शादी डेविड से हुई थी, जो उसी के साथ आईबीएम में काम करता था | शादी के बाद कुछ वर्ष बहुत सुहाने बीते | इस दौरान उसे दो बच्चों का मातृत्व सुख भी मिल गया | शादी के फौरन बाद उसने महसूस किया कि डेविड को गुस्सा बहुत जल्दी आता है, पर वह शीघ्र ही उस पर काबू भी कर लेता था  | अत: किटी ने उस के स्वभाव के इस पक्ष को अधिक महत्त्व नहीं दिया | पिछले पाँच सालों में डेविड के स्वभाव में तेज़ी से परिवर्तन आया | उसने किटी के साथ बदसलूकी करनी शुरू कर दी | वह गुस्से में बेकाबू हो कर घर की चीज़ों को ज़मीन पर फैंकना शुरू कर देता | 
     अमेरिका की आर्थिक स्थिति ख़राब होने से कई कंपनियों ने अपने कर्मचारी निकालने शुरू कर दिए थे | आईबीएम ने भी अपने काफी कर्मचारियों की छटनीं की | उसी में डेविड की नौकरी चली गई | पहले तो कुछ समय किटी यही सोचती रही कि, नौकरी जाने की वजह से डेविड निराशा में है, मन खिन्न है, इसलिए छोटी -छोटी बात पर गुस्सा हो जाता है | वह उन क्षणों को पहले की तरह लापरवाही में टाल जाती | उसे प्यार से समझाती | धीरे -धीरे डेविड का गुस्सा हिंसा में बदलने लगा | एक दो बार तो डेविड ने उसके चांटे और घूंसे भी लगा दिए | वह यह सोच कर सह गई कि बेचारे के पास नौकरी नहीं, शायद निराशा में कुंठित हो गया है, क्योंकि किटी को अमेरिका के इस आर्थिक संकट में भी तरक्की (प्रोमोशन) मिल गई थी | डेविड उससे प्यार करता है, उस पर बुरा समय चल रहा है, वह अपनी असफलता की पीड़ा कहाँ उड़ेले, नौकरी मिल जायेगी तो सब ठीक हो जायेगा, यही सोच -सोच कर, वह डेविड के साथ सहानुभूति रखती, उसकी ज़्यादती बर्दाश्त कर जाती |
     दो साल बेकार रहने के बाद, डेविड को नौकरी तो मिल गई | पर उसका हर शाम शराब पीना, बात -बात पर किटी से लड़ना और फिर हिंसक हो जाना, बढ़ता ही गया | अब किटी को बहुत बुरा लगने लगा | वह अपनी तरफ से, कोई ऐसा काम नहीं करती थी, जिससे डेविड को गुस्सा आए | डेविड मार -पीट करने का बहाना ढूँढ ही लेता था | वह बच्चों की परवरिश लड़ाई -झगड़े वाले माहौल में नहीं करना चाहती थी, स्थितियाँ उसके नियंत्रण से बाहर हो रही थीं | बच्चे प्रतिदिन वही देखते | रोज़ की किच-किच, पिच -पिच में बड़े हो रहे बच्चे, उससे तरह -तरह के प्रश्न पूछने लगे | बच्चों की पढ़ाई पर असर होने लगा | स्कूल से अध्यापकों की शिकायतें आने लगीं | वह बौखला गई | जिन बच्चों और घर को समेटने में वह लगी हुई थी, उसे बिखरता देख उसका दिल रोने लगा, हृदय विदारक पीड़ा महसूस करने लगी | ख़ैर उसने बच्चों की पढ़ाई की बागडोर अपने हाथ में ली, और घर के सारे काम अकेली माँ की तरह सँभालने शुरू कर दिए | 
     एक दिन डेविड ने किटी को पीटना शुरू किया तो बच्चों ने पुलिस को बुला लिया | अगर घरेलू हिंसा का केस बन जाता तो डेविड को नौकरी से हाथ धोना पड़ता | उसने डेविड पर केस नहीं बनने दिया | पुलिस वाले भी हिदायतें दे कर चले गए | डेविड ने उस समय तो पुलिस के सामने माफ़ी माँग ली | कुछ दिनों बाद फिर झगड़ा करना शुरू कर दिया | झगड़ा किसी कारण से नहीं, बेवजह शुरू हो जाता | उसने उसके इस बदलते व्यवहार का कारण जानना चाहा, डेविड बता नहीं पाया | किटी एक शिक्षित महिला है, उसने इसका हल निकालने की सोची | इस तरह पूरा जीवन नहीं जिया जाता और बच्चों को अच्छा, सुखद और स्वस्थ्य माहौल नहीं दिया जा सकता | हार कर उसने डाक्टर से बात की और पारिवारिक सलाहकार ( फैमिली काउंसलर ) की सेवा ली | कुछ दिन अच्छे बीते, फिर वही बात -बात पर मार- पीट शुरू हो गई | किटी ने प्यार -मोहब्बत यहाँ तक कि गुस्सा हो कर भी, हर तरह से, हर तरीके से डेविड को समझाना चाहा | स्वावलंबी हो कर भी वह उसे तलाक नहीं देना चाहती थी, उसका सुधार चाहती थी | 
     भारत में अक्सर लोग सोचते हैं कि अमेरिका के लोग संस्कारी नहीं, उनकी कोई संस्कृति नहीं | ऐसा नहीं है, हर देश के पास कुछ न कुछ होता है, जिस पर उसे गर्व होता है | वह एक संस्कारी महिला है और शादी की संस्था में बहुत विश्वास रखती है | वह बच्चों को उनके पिता से अलग नहीं करना चाहती थी | तलाक को वह अंतिम विकल्प मानती, गृहस्थी चलाने के लिए समझौता और क़ुरबानी देनी ही पड़ती है, यही सोचती रही |
     बहुत कोशिशों के बावजूद डेविड, बदला नहीं | वह पहले से भी अधिक निडर हो गया था | अब वह बिना बात के बच्चों को डांटने- फटकारने लगा | उसके अमानवीय व्यवहार ने किटी को भीतर से तोड़ दिया | वह अपना आत्म सम्मान तो खो ही चुकी थी, आत्मविश्वास भी खोने लगी | दृढ़ निश्चयी किटी हर समय परेशान, उलझी -उलझी बेख़बर सी रहने लगी | उसकी इस मानसिक अवस्था का उसके काम पर भी असर होने लगा है | कम्पनी में कई बार उसे काम ठीक न करने की वजह से शर्मिंदा होना पड़ा | किटी ने डेविड के लिए मनोवैज्ञानिक का परामर्श भी लिया | उसने और फैमिली काउंसलर ने उसे समझाया कि वह डेविड से तलाक ले ले, वह सुधरने वाला नहीं, क्योंकि वह सुधरना चाहता ही नहीं | उसने अपने दादी और माँ को इसी तरह पिटते देखा है और अपने बच्चों को ऐसा माहौल देना उसे बुरा नहीं लगता | डेविड को यह स्वभाव आनुवांशिक मिला है | वह स्वयं चाहे तो इससे छुटकारा ले सकता है पर उसे तो कुछ भी बुरा नहीं लगता था | अमेरिका में सहायता के कई केंद्र हैं, जिसमें जाकर वह अपना इलाज करा सकता था | इसी बात पर झगड़ा बढ़ जाता, जब किटी उसे सुधार केंद्र में जाने को कहती |
     एक दिन उसने बच्चों पर भी हाथ उठा दिया | उस दिन किटी पूरी तरह टूट गई | अगर बच्चे पुलिस को फ़ोन कर देते या उनके स्कूल में किसी तरह यह बात पहुँच जाती तो स्कूलों में सरकार की तरफ से नियुक्त की गई समाज सेविका बच्चों को उनसे दूर पोषक गृह (Foster Home ) में भेज देती | वह डेविड को खो चुकी थी, बच्चों को खोना नहीं चाहती थी | बच्चों ने भी माँ को प्रोत्साहित किया और किटी ने तलाक ले लिया | अब वे सुखद जीवन जी रहे हैं | डेविड बच्चों को सप्ताह में एक बार कुछ घंटों के लिए मिलने जाता है |
     यह कहानी सिर्फ किटी पर्ल की नहीं, अमेरिका की बहुत सी स्वतंत्र और स्वावलंबी महिलाओं की है | वे अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हैं, पति का दुर्व्यवहार एक सीमा तक सहती हैं, गृहस्थी को जल्दी किए टूटने नहीं देती | अगर पति अति कर देता है तो अलग होना बेहतर समझती हैं | अमेरिका में बच्चों की परवरिश के लिए माहौल को बहुत महत्त्व दिया जाता है | मानुषी जीवन की बहुत कद्र की जाती है | यह ज़रूरी नहीं, सभी शिक्षित और आत्मनिर्भर महिलाएँ ऐसी स्थिति का हल निकाल सकती हैं | बहुत सी महिलाओं में हिम्मत और हौंसले की कमी होती है | पुरुष ढाल की तरह होते हैं, के पूर्वग्रहों से ग्रसित होती हैं | पति से अलग हो कर सामाजिक चुनौतियों का सामना करने से घबराती हैं, चाहे पति के साथ गृहस्थी की गाड़ी वे अकेले ही चला रही होती हैं |                 
    अमेरिका में पारिवारिक एवं सामाजिक ढांचा ऐसा है, जो घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाओं को प्रोत्साहित कर उनका और उनके बच्चों का जीवन नष्ट होने से बचाता है | यहाँ तलाक प्राप्त महिलाओं को हेय दृष्टि से नहीं देखा जाता | पुरुष तलाक शुदा औरतों को उनके बच्चों सहित स्वीकार कर लेते हैं | परिवार, समाज, पुरुष वर्ग तलाक को बुरा नहीं मानते, जीवन को बेबुनियादी मान्यताओं, रूढ़ियों, मर्यादाओं की बलि नहीं चढ़ाते |
     एक बात बताना ज़रूर है,अमेरिका बहुत परम्परावादी,रूढ़िवादी,धार्मिक और संस्कारी देश है | परिवार और शादी की महत्ता को बहुत मानता है | इसके विपरीत यूरोप बहुत आज़ाद और मान्यताएं तोड़ने वाला समाज है | भारत में यूरोप का प्रभाव अधिक है और उसे देख कर ही भारतीय सोचते हैं कि अमेरिका में भी यही होता होगा |
     वर्षों से अमेरिका में रह रही हूँ, पूरी दुनिया का भ्रमण कर चुकी हूँ और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लोगों से जुड़ी हुई हूँ, एक बात निस्संकोच कह सकती हूँ कि अच्छे- बुरे लोग पूरे विश्व में, एक जैसे ही हैं | 
     अमेरिका में हर वर्ष ३२४,००० औरतें घरेलू हिंसा का शिकार होती हैं | जिसमें १२४,००० हाईस्कूल से भागी हुई होती हैं यानि अमेरिका के आंकड़ों अनुसार अशिक्षित|
     इससे यह स्पष्ट होता है कि पुरुष प्रधान समाज, उसका वर्चस्व, उसका स्वभाव, देश, परिवेश से प्रभावित होकर, थोड़ी फेर बदल से, तक़रीबन एक सा है और पूरी दुनिया में महिलाएँ प्रताड़ित होती हैं, चाहे वे विकसित देश की हों या विकासशील देश की | 
     पश्चिम में पारिवारिक हिंसा की रोकथाम, इससे पीड़ित महिलाओं और बच्चों की सहायता एवं सुरक्षा के लिए सरकार के कड़े नियम हैं | उनका सख्ती से पालन किया जाता है | कई सरकारी और सामाजिक संस्थाएँ भी इस दिशा में काम कर रही हैं |
     
      
     उदाहरणार्थ एक किस्सा दे रही हूँ...
     विद्या भानु श्री, दक्षिण भारत के एक पूर्व मंत्री की बेटी है | पंद्रह साल पहले शादी के बाद जब वह अमेरिका आई तो उसे यहाँ आने के बाद पता चला कि उसका पति किसी अमरीकन महिला के साथ रहता है और उसने आपनी माँ की ख़ुशी के लिए विद्या से शादी रचाई थी | विद्या ने बहुत कोशिश की अपनी गृहस्थी ज़माने की, पर असफल रही | जब भी वह उसे उस लड़की के पास जाने से रोकती तो नीरज उसे मारने- पीटने लगता  | विद्या ने अपने पिता से शिकायत की और वे आकर उसे ले गए | पर एक वर्ष के भीतर ही उसे नीरज के पास वापिस छोड़ गए | यह जानते हुए भी कि वह किसी अमरीकन लड़की के साथ रहना चाहता है और वह तन-मन से किसी और का है | नीरज की माँ के ज़ोर डालने से ही यह शादी हुई थी | फिर उन्होंने ऐसा क्यों किया ..? अपनी ही बेटी को अजनबी देश, पराये लोगों में ऐसे पुरुष के हवाले कर गए जिसके मन में उसकी कोई चाह नहीं | कारण...सामाजिक दबाब, प्रतिष्ठा, दो बेटियां कुँवारी बैठी थीं, उनकी शादी में अड़चने आने लगी थीं | बड़ी बेटी पति का घर छोड़ मायके में बैठी थी | विद्या को बहनों के लिए अपनी कुर्बानी देनी पड़ी | विद्या की सास उसके पास आ गई और उसकी गृहस्थी जम गई | नीरज अपनी माँ से डरता था और उसने अमरीकन लड़की को छोड़ दिया | नीरज की माँ तो भारत वापिस लौट गई | नीरज अपनी सारी निराशा, अमरीकन लड़की से सम्बन्ध विछेद का क्षोभ, वर्षों से, विद्या पर निकाल रहा है | विद्या को प्रताड़ित करना अब उसकी आदत बन चुकी है और शोषण सहना विद्या का स्वभाव | जब वह उस पर हाथ उठाता है,विद्या की सास भी बेटे को कुछ नहीं कहती  | उन्हें वह सब स्वभाविक लगता है, क्योंकि उनके पति भी उन्हें समय - असमय पीट लेते थे | विद्या भारत से अंग्रेज़ी में पीएच. डी करके आई थी | पर नीरज ने उसे नौकरी नहीं करने दी | स्वावलंबी बन जाती तो नीरज उसे दबा न पाता | मन और आत्मा से पीड़ित अपनी तीन बेटियों के साथ गृहस्थी की गाड़ी खींच रही है | बेटियां कई बार उसे इस शादी से निकलने के लिए प्रोत्साहित कर चुकी हैं | वह आज भी परिवार की झूठी मान -मर्यादा, प्रतिष्ठा और समाज क्या कहेगा, की सोच लेकर बैठी है | उल्लेखनीय है कि भारत में पूर्व मंत्री साहब, उनका परिवार सभी ख़ुशी -ख़ुशी अपना जीवन जी रहे हैं और विद्या के दर्द का एहसास तक नहीं करते | कई बार वे विद्या के पास आ चुके हैं और उसकी अवस्था देख कर भी अनदेखा कर जाते हैं |
      विद्या जैसी अनगिनत  भारतीय लड़कियाँ पूर्वग्रहों से गर्सित अमेरिका आती हैं | कई भारतीय पुरुष तो यहाँ भी वही मानसिकता लिए हुए हैं | यहाँ के माहौल में जब वे प्रताड़ित होती हैं तो कई विकल्प उनके सामने खुलते हैं | कुछ लड़कियाँ विकल्प चुन लेती हैं और कई विद्या की तरह माँ - बाप और समाज का मुँह देखतीं अपना सारा जीवन  होम कर देती हैं | पूरे अमेरिका में साऊथ एशियंज़ प्रताड़ित महिलाओं की सहायता के लिए संस्थाएँ हैं-आसरा, मैत्री, नारिका, सहारा, स्नेहा, रक्षा, अपनाघर, आशा, सहेली, मानवी, सखी, सवेरा और अन्य कई |
     अमेरिका में घरेलू हिंसा का अगर पड़ौसियों को पता चल जाता है और वे पुलिस को बुला लेते हैं तो भारतीय परिवारों और बच्चों पर बुरा असर पड़ता है | भारतीय यहाँ भी अपनी भारतीयता के साथ ही रहते हैं | कानूनन बच्चे परिवार से अलग कर दिए जाते हैं | ये संस्थाएँ प्रताड़ित महिलाओं और भारतीय संस्कृति, परम्पराओं, मान्यताओं, धार्मिक आस्थाओं की रक्षा करते हुए कानून से उन्हें बचाती हैं और बुरी स्थिति में तलाक भी करवातीं हैं और बच्चों तथा माँ का भविष्य सुरक्षित करने में पूरी  सहायता करती हैं |
     भारत हो या विदेश, घर और बच्चों के लिए महिलाएँ मर मिटती हैं | भारत में महिलाओं को स्वतंत्रता का बीज मन्त्र दे भी देंगे और उन्हें उनके अधिकारों के प्रति शिक्षित कर भी देंगे, तो क्या होगा...?जब तक समाज और पुरुष वर्ग की संकुचित मानसिकता की युगों की बंद अँधेरी कोठरियों में परिवर्तन की रौशनी नहीं पहुँचती, तब तक स्त्री विमर्श बस विमर्श ही रह जायेगा | पुरुष वर्चस्व के पूरे ढाँचे को जागृत करने की आवश्कता है | भारत में आवश्कता है, महिलाओं की महिलाओं के प्रति संवेदनशीलता जागृत करने की | रिश्तों में बंधीं महिलाएँ परिवार में ही एक दूसरे के साथ मर्द का हाथ उठने से पहले अगर खड़ी हो जाएँ तो धीरे -धीरे इस मानसिकता से छुटकारा पाया जा सकता है | महिलाएँ ही महिला को शिक्षित करने और उनके कानूनी अधिकार बताने की पहल भी करें |

     हाल ही में मानसिक रोगों के सर्वे की रिपोर्ट छपी है जिसमें डॉ. रॉबर्ट विंटरहॉल ने लिखा है कि अधिकतर घरेलू हिंसा वाले परिवारों में पलने वाले बच्चों में धीरे -धीरे हिंसात्मक प्रवृत्ति पनपने लगती है और फिर यह पीढ़ी दर पीढ़ी चलती है | डेविड और नीरज के दादा और पिता दोनों अपनी पत्नियों को पीटते थे | डेविड और नीरज में आनुवांशिक वही प्रवृति आ गई है |

     क्या आप चाहती हैं कि आप के बच्चों में हिंसक प्रवृत्ति पनपे | नहीं न.. तो उठिए..जागृती का पहला कदम उठाएँ...अपने ही घर में बहू या बेटी पर किसी मर्द का हाथ उठने से पहले उसके साथ खड़ी हो जाएँ और बचाएँ अपनी भावी पीढ़ी को ग़लत संस्कारों से,जो अनजाने ही बच्चों में पड़ जाते हैं .....

सुधा ओम ढींगरा 
101 Guymon Court, Morrisville, NC--27560 USA 
sudhadrishti@gmail.com 

15 comments:

रेखा श्रीवास्तव said...

अभी कुछ ही दिन पहले सत्यमेव जयते ' के एपिसोड में आमिर खां की इस विषय पर प्रस्तुतीकरण सिर्फ एक विद्या क्यों और भी कई विद्याओं के विषय में बता रही थी. हम कहें कि ये प्रवृत्ति सिर्फ अल्प शिक्षित या आर्थिक दृष्टि से कमजोर वर्ग में संघर्ष और तनाव के कारण होती है ऐसा नहीं है - ये प्रवृत्तियां जैसे कि सुधा ने कहा है कि ये अनुवांशिक और घर में मिल रहे संस्कारों से मिलता है. वह नारी जो स्वयं आर्थिक तौर पर पुरुष पर निर्भार करती है वह मजबूर होती है यह सब बर्दास्त करने के लिए क्योंकि उसे अपने पिता के घर से भी कोई सहयोग या शरण नहीं मिल पता है. विवाह के बाद कैसे कोई माता पिता अपने बच्चियों को यह सब सहन करने के लिए छोड़ सकते हें. लेकिन ऐसा हो रहा है और इसके प्रति जागरूकता लानी होगी वे असमर्थ कतई नहीं है, अगर वे शारीरिक रूप से स्वस्थ है तो अपने और अपने बच्चों के लिए श्रम करके एक सुरक्षित और शांतिपूर्ण जीवन दे सकते हें.
इसके लिए नारी संगठन जो काम कर रहे हें तो ऐसा भी देखा है मैंने कि लड़की के घर वाले उन पर आरोप लगा देते हें कि ये उनके घर को तोड़ने के लिए कोशिश कर रही हें. इसके लिए सबसे पहले हिम्मत पीड़ित को करनी होगी और उसके बाद नारी में नारी के प्रति सहानुभूति होनी चाहिए . कई घरों में अगर बेटा बहू को पीटता है तो बहुत खुश होती हें कि बेटा उनके कब्जे में है या फिर वह जोरू का गुलाम नहीं है. कई बार तो वह स्वयं ऐसे हालात पैदा कर देती है कि बेटा बहू को मरे या फिर उसका तिरस्कार करे. घर बचाए रखना , बच्चों को उनके पिता का साया बना रहे इसके लिए अपनी और अपने बच्चों की बलि देने के प्रति जागरूकता लानी होगी. बच्चों को उज्जवल भविष्य पिता के साये में नहीं बल्कि अच्छे वातावरण में दिया जा सकता है.

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indianrj said...

बहुत ही अच्छी पोस्ट है सुधाजी. लेकिन अफ़सोस, मेरे लिए बहुत देर से लिखी गयी. पहले तो प्यार के नाम पर हम औरतें खुद को ठगना सीख लेती हैं. फिर तरह-२ के बहाने गढ़कर अपनी कमियों(?) को इसके लिए ज़िम्मेदार समझती हैं. मेरे पुत्र ने ये सब देखा और उसका मन पढाई से उचट गया. किसी तरह बड़ी मुश्किल होटल मैनेजमेंट किया लेकिन वो एक ऐसा course था जिससे वो ही संतुष्ट नहीं है. सो नौकरी के लिए उसे परेशां देखकर मन बड़ा दुखी होता है. आखिर मुझे इतना सहने की क्या ज़रुरत थी जब मेरा पुत्र बड़ा हो रहा था और वो emotionally भी परिवार में किसी से नहीं जुड़ पाया.

neelima garg said...

very correct and timely...

सुजाता said...

@indianrj
आपकी तरह हमारी आने वाले पीढी यह न कहे कि मुझे देर हो गयी....यही प्रयास करना होगा।अपने अपने स्तर पर ,काम की जगह पर,घर पर जहाँ कहीं स्त्री किसी भी तरह की हिंसा की शिकार है उसे प्रतिरोध करना शुरु करना होगा।
ज़रूरी नही कि आप अपनी बेटी को ही सिखाएँ ...बेटे को भी बताएँ कि वह अपनी मित्र,बहन,पत्नी और माँ को इसके लिए जागरूक बनाए।
यह बहुत अच्छा है कि आपको कम से कम अपनी बात अब कहने का मौका मिल रहा है।नही जानती कि आपका कोई ब्लॉग भी है या नही लेकिन स्वयम को अभिव्यक्त कर आपको स्वयम को और अपने बेटे को आतीत के हाथों से छुड़ा लेना चाहिए।

सुनीता शानू said...

सदियों से औरत पुरुष के द्वारा पिटती आ रही है। लेकिन ये वही औरतें हैं जो समाज के डर से या अपने परिवार या बच्चों की खुशी से यह अत्याचार सह रही हैं। जो जागरुक हो चुकी है उसने खुद को मजबूत कर लिया है। घरेलू हिंसा को बढ़ावा देना कानूनन ज़ुर्म है। हमे हर हाल में इसके खिलाफ आवाज़ उठानी चाहिये। आपका लेख बिलकुल सही और आज की स्थिती पर बिलकुल खरा उतरता है। औरत की इस स्थिती की जिम्मेदार औरत खुद है उसे इस दलदल से निकलना ही होगा।

राजन said...

विदेशों से बहुत सी चीजें ऐसी हैं जो हमें सीखनी चाहिए.ये बात तो हैं कि वहाँ घरेलू हिंसा को कोई पारिवारिक मसला नहीं माना जाता हैं बल्कि एक सामाजिक समस्या के रुप में देखा जाता हैं.और एक हम हैं इस मामले में संभवतः दुनिया के सबसे जाहिल समाजों में से एक.एक महिला को पीटना तो हमारे लिए कोई अनोखी बात हैं ही नहीं.इसे हमने समस्या माना ही कब हैं.
अब बताइये पुरुष को गुस्सा आए तो वो बेचारा कहाँ निकाले? पत्थरों पर तो निकाल नहीं सकता वर्ना खुद ही घायल हो जाए और बिना गुस्सा निकाले रहा भी नहीं जाता नहीं तो बेचारा अंदर ही अंदर घुटकर पागल न हो जाएगा.लेकिन जब पत्नी साथ हैं तो फिर इतना सोचना ही क्यों?
लेकिन आप ये न समझे कि लोग संवेदनशील नहीं है बल्कि लोग बडे दयालु हैं.आप सडक पर किसी गाय बछडे को भी मारेंगे तो भी दसियों लोग दसियों दयालु ह्रदय आपको रोकेंगे संस्कृति वगेरह की दुहाई देंगे कि मत मारो बेचारी को लग जाएगी या पाप लगेगा.लेकिन महिला के पिटने और चीखने चिल्लाने से कुछ फर्क नहीं पडता.क्योंकि हमें किसीने बताया ही नहीं कि महिला भी इंसान हैं और उसे भी दर्द होता हैं बल्कि हमने तो सुना हैं कि स्त्री धरती की तरह सहनशील होती है तो क्या थोडी पिटाई भी सहन नहीं कर सकती.

सुजाता said...

राजन said...लेकिन महिला के पिटने और चीखने चिल्लाने से कुछ फर्क नहीं पडता.क्योंकि हमें किसीने बताया ही नहीं कि महिला भी इंसान हैं और उसे भी दर्द होता हैं बल्कि हमने तो सुना हैं कि स्त्री धरती की तरह सहनशील होती है तो क्या थोडी पिटाई भी सहन नहीं कर सकती.

बिल्कुल सही राजन ..आपके शब्दों मे तीक्ष्णता दिखाई दे रही है .....कम से मुझे भविष्य़ के प्रति आश्वस्त होने का मन करता है।

indianrj said...

राजनजी की बातों से काफी उम्मीद दिखाई देती है. पहली बार मेरी पिटाई हुई थी जब मेरे विवाह को मात्र ३ वर्ष १० दिन हुए थे और मेरा पुत्र साढ़े ४ महीने का था. मैं बडौत (उ.प.) अपनी ससुराल एक शादी में शामिल होने गयी थी. हम लोग अपने देवर के घर में थे जो मेन रोड पर खेत में ही है (वहाँ हमारा कोई हिस्सा नहीं है). मेरे पति ने खूब शराब पी ली थी और जैसा कि तब तक मैं उनका स्वभाव ठीक से नहीं जानती थी. बस मैंने थोडा गुस्सा करके उनसे पूछा क्या आपने शराब पीने से पहले ये नहीं सोचा कि मैं सोऊँगी कहाँ. बस मेरा इतना कहना उनसे बर्दाश्त नहीं हुआ और मुझे खेत में ले जाकर उन्होंने अपने घरवालों के सामने खूब पीता. वो लोग खेत की मेड पर खड़े होकर सिर्फ तमाशा देखते रहे और उनके सामने मैं फुटबाल की तरह लातों घूसों से तब तक मारी जाती रही जब तक मेरे गाल की हड्डी से मेरे पति के हाथ में चोट नहीं लग गई. जो कार्टूनों में देखा करती थी कि पिटते समय चाँद सितारे आँखों के सामने नाचते हैं वो मैंने साक्षात् महसूस किया. यहाँ ये बता देना ज़रूरी समझती हूँ कि मैं ससुराल वालों से पर्दा करती थी फिर भी उन्होंने उस परदे की भी लाज नहीं रखी कि चलो जब छुड़ाना नहीं है तो तमाशा भी क्यूँ देखना. तिस पर जुल्म ये कि जब पति पिटाई का कार्यक्रम निबटाकर चले गए और मैं शरीर में जान नहीं होने के कारण तुरंत नहीं उठ पायी तो मेरे देवर ने आकर हुक्म सुना दिया "अब यहाँ पड़े२ नौटंकी क्या कर रही है, चल जा के कहीं पड़ जा, सुबह होते ही अपना दिल्ली का रास्ता पकड़ लियो". बस सुबह मन में बहुत दुःख लिए मैंने बस अड्डे से बस पकड़ी तो देखा मेरे पति भी उसी बस में चढ़ रहे थे. उसके बाद उन्होंने माफ़ी मांगी और भविष्य में कभी न दोहराने का वादा किया. बस मैं यहीं मार खा गई. अब २७ वर्षों से लगातार भुगत रही हूँ. हम औरतें बड़ी आदर्शवादी बन जाती हैं और सत्य तो ये है कि हमारे आदर्शों को कोई दो कौड़ी का भी नहीं समझता. मैं एक नौकरीपेशा महिला हूँ और मैंने अपने बच्चों को बराबर पढाया लिखाया है, फिर भी मेरी हालत घर में एक बेगार मजदूर जैसी भी नहीं है (कम से कम उसे पैसा तो कमाकर नहीं देना पड़ता). गाहे बगाहे मुझे उनके गुस्से और पिटाई का शिकार होना पड़ा.
शराब से हारकर मैं हर मोर्चे पर खुद को fail पाती हूँ. और अब जाकर मैं seriously पति से अलग होने का सोच रही हूँ. देर आयद लेकिन दुरुस्त नहीं. ५०वर्श की उम्र में खुद को ठगा और लुटा हुआ महसूस कर रही हूँ और सबसे बड़ी समस्या मुझे लगती है कि मैं सारी salary घर में ही खर्च करती रही, कभी घर बनाने का क्यों नहीं सोचा. अब इस उम्र में १० साल बाद retirement के बाद कहाँ जाऊंगी. लेकिन मुझे लगता है कि अपनी सेल्फ-एस्टीम वापस लाकर मुझे और किसी चीज़ की ज़रुरत नहीं रहेगी.

सुजाता said...

indianrj आपके विषय मे जान कर कष्ट हुआ।27 वर्ष एक बेहद लम्बा वक़्त है यह सब सहने के लिए।
आप बिल्कुल सही हैं कि आत्म विश्वास और आत्म सम्मान को वापस लाना बड़ी बात है।आशा करती हूँ कि आप ऐसा कर पाएंगी और आपकी यह अभिव्यक्ति और कुछ लोगों के लिए सबक भी बनेगी।
शुभकामनाएँ !

rashmi ravija said...

आज ये पोस्ट पढ़ी....
और सहमत हूँ...औरतों को ही अपनी बिरादरी के लिए कुछ करना है...बहने हों..ननदें हों..या पड़ोसी..या सहेली....घरेलू हिंसा से पीड़ित महिला के साथ उन्हें खड़े होने की शपथ ले लेनी चाहिए...और हर हाल में ऐसे वाकये रोकने की कोशिश करनी चाहिए.
बहुत पहले घरेलू हिंसा पर दो पोस्ट लिखी थी.... प्लीज़ रिंग द बेल : एक अपील
आँखों ,जुबां और कानों पर पड़े तालों को खोलने की....एक गुजारिश.

उसमे यही अपील की थी की अनजान घर से भी मार-पीट की आवाजें आएँ तो उस घर की घंटी बजने में संकोच ना करें.
उस पोस्ट पर कुछ पुरुषों के ऐसे कमेन्ट आए कि पढ़कर दंग रह जाना पड़ा...तथाकथित पढ़े-लिखे पुरुषों की सोच ऐसी है.

Asha Joglekar said...

हमारे यहां तो पुलिस भी स्त्री को संरक्षण नही देती । ऐसे में क्या आप चाहती हैं कि आप के बच्चों में हिंसक प्रवृत्ति पनपे | नहीं न.. तो उठिए..जागृती का पहला कदम उठाएँ...अपने ही घर में बहू या बेटी पर किसी मर्द का हाथ उठने से पहले उसके साथ खड़ी हो जाएँ और बचाएँ अपनी भावी पीढ़ी को ग़लत संस्कारों से,जो अनजाने ही बच्चों में पड़ जाते हैं .....

Dr. Sudha Om Dhingra said...

indianr जी आप के बारे में जानकार कर बेहद पीड़ा हुई | आप इतने वर्ष कष्ट सहने के बाद भीतर की बची हई औरत को और टूटने से बचाने के लिए खड़ी हुईं हैं, मेरी शुभकामनाएँ आप के साथ हैं | ऐसा साहस जुटाना आसान नहीं होता | मेरी एक कहानी है 'क्षितिज से परे' जिसकी नायिका ४० वर्ष बाद तलाक लेती है | अमेरिका जैसे स्वतंत्र देश में ही उसे गृहस्थी, बच्चे, परिस्थितिओं, भारत में रह रहे परिवार और सबसे बढ़ कर उसे अपने बनाए दायरों से भीतर की पीड़ित, प्रताड़ित औरत को इन बन्धनों से छुड़ाने में समय लग गया | आप तो २७ वर्ष के बाद अपना आत्मविश्वास, आत्मसम्मान वापिस ला रही हैं | अगर उचित समझें तो हरियाणा की पत्रिका हरिगंधा के जुलाई अंक में मेरी यही कहानी 'क्षितिज से परे 'छपी है, पढ़ लें |

Dr. Sudha Om Dhingra said...

एक बात स्पष्ट करना भूल गई, पत्रिका का जुलाई अंक अभी आया है |

सुनीता शानू said...

सुजाता जी ऎसी क्या परेशानी थी जो आपने मेरा कमैंट हटा दिया? कोई परेशानी है तो कृपया बतलाये।
सुनीता शानू has left a new comment on the post "किसी मर्द का हाथ उठने से पहले ....":

सदियों से औरत पुरुष के द्वारा पिटती आ रही है। लेकिन ये वही औरतें हैं जो समाज के डर से या अपने परिवार या बच्चों की खुशी से यह अत्याचार सह रही हैं। जो जागरुक हो चुकी है उसने खुद को मजबूत कर लिया है। घरेलू हिंसा को बढ़ावा देना कानूनन ज़ुर्म है। हमे हर हाल में इसके खिलाफ आवाज़ उठानी चाहिये। आपका लेख बिलकुल सही और आज की स्थिती पर बिलकुल खरा उतरता है। औरत की इस स्थिती की जिम्मेदार औरत खुद है उसे इस दलदल से निकलना ही होगा।

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Posted by सुनीता शानू to चोखेर बाली at June 28, 2012 6:38 PM

सुजाता said...

सुनीता जी , आपका कमेंट मैने नही हटाया।
आपका कमेंट तो मैने अपने मेल मे देख लिया था लेकिन यह नही जानती थी कि वह यहाँ नही दिख रहा।

एक और कमेंट मेरे मेल बॉक्स् मे पड़ा है जो न जाने क्यों यहाँ मुझे नही दिखा उसे भी पोस्ट कर रही हूँ -

rashmi ravija has left a new comment on your post "किसी मर्द का हाथ उठने से पहले ....":

आज ये पोस्ट पढ़ी....
और सहमत हूँ...औरतों को ही अपनी बिरादरी के लिए कुछ करना है...बहने हों..ननदें हों..या पड़ोसी..या सहेली....घरेलू हिंसा से पीड़ित महिला के साथ उन्हें खड़े होने की शपथ ले लेनी चाहिए...और हर हाल में ऐसे वाकये रोकने की कोशिश करनी चाहिए.
बहुत पहले घरेलू हिंसा पर दो पोस्ट लिखी थी.... प्लीज़ रिंग द बेल : एक अपील
आँखों ,जुबां और कानों पर पड़े तालों को खोलने की....एक गुजारिश.

उसमे यही अपील की थी की अनजान घर से भी मार-पीट की आवाजें आएँ तो उस घर की घंटी बजने में संकोच ना करें.
उस पोस्ट पर कुछ पुरुषों के ऐसे कमेन्ट आए कि पढ़कर दंग रह जाना पड़ा...तथाकथित पढ़े-लिखे पुरुषों की सोच ऐसी है.

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