Sunday, July 1, 2012

आवाज़ उठाना कोई गलत बात नहीं


पेशे से ज्वेलरी डिज़ायनर , जेमोलॉजिस्ट एवं अस्ट्रालजर परंतु ह्रदय से लेखिका स्वप्निल शुक्ल'  'स्वप्निल ज्वेल्स' नामक ब्लॉग पर सक्रिय हैं विभिन्न पत्रिकाओं मे इनके लेख प्रकाशित हैं। गहने- दि आर्ट आफ वेअरिंग ज्वेलरी ' इनकी प्रथम प्रकाशित पुस्तक है.वे लिखती हैं : "'धूल तब तक स्तुत्य है जब तक पैरों तले दबी है , उड़ने लगे...... आँधी बन जाए ....तो आँख की किरकिरी है.....चोखेर बाली है ' .....ये चंद पंक्तियाँ जाने क्यों मुझे हर वक़्त अपनी ओर आकर्षित करती हैं और जो मुझे चोखेर बाली से नियमित रुप से जुड़े रहने का सबब हैं. चोखेर बाली  को मैं पिछले एक वर्ष से पढ़ रही हूँ. चूंकि अभी कुछ समय पूर्व अपने खुद के ब्लॉग 'स्वप्निल ज्वेल्सपर सक्रिय हुई हूँ तो 'चोखेर बालीकी फॉलोवर भी बन गई हूँ. चोखेर बाली  मेरे लिये प्रेरणा का स्रोत है. इसका हर लेख मुझे ज्ञान के प्रकाश की ओर अग्रसर करता है  समाज के विभिन्न वर्गों को जागरुकता प्रदान करता है. अत: चोखेर बाली  से मुझे विशेष लगाव है और ये मेरे ह्रदय के सबसे करीब है."आज स्वप्निल का ही एक लेख यहाँ पोस्ट कर रही हूँ :-



 आज  शायद ही कोई  ऎसा क्षेत्र हो जिसमें महिलाओं ने अपना लोहा  मनवाया हो ,हम कार्पोरेट जगत की बात करें या राजनीति की या फिल्म जगत की ।यह भी सच है कि महिलायें हर चुनौतियों को स्वीकार कर अपने कार्यक्षेत्र  ज़िम्मेदारियों में सफलतापूर्वक अग्रसर हो रही हैं।लेकिन इसके बावजूद भी  महिलाओं के सामने पुरुषों की अपेक्षा कई गंभीर समस्याएँ खड़ी हैं।ये उलझने घर के भीतर और कार्यक्षेत्र ,दोनो जगह अलग अलग तरीके से सामने आती हैं।
 शाम को जब अपना सारा कार्य संपूर्ण कर लड़की घर को आएगी तो बस पहला शब्द,  "बेटी ! बहुत देर हो गई. कहाँ थी ? किसके साथ थीमैंने तुम्हे कल उस इलाके में फलाना लड़के के साथ देखा था." वगैरह- वगैरह और सबसे बड़ी बातइन प्रश्नों की झड़ी लगाने वाले लड़की के माँ - बाप नहीं बल्कि रिश्तेदार होंगे.आज भी समाज में कई ऐसे परिवार हैं जिसमें लोग लड़की की नौकरी लगते ही शादी के लिये दबाव बनाने लग् जाते हैं फिर लड़की ने अपने कैरियर और अपनी ज़िंदगी को किस तरह प्लान किया हैये तो कोई सुनना भी नहीं चाह्ता. परिवार वालों के साथ-साथ लड़की के रिश्तेदार बस या तो आए दिन नये लड़कों  का प्रस्ताव लेकर घर  जाएंगे या तो हर वक़्त लड़की के बारे में जासूसी करते रहेंगे।भले ही महिला पढ़ी-लिखी हैकामकाजी है  अपने परिवार की पूरी श्रद्धा से ज़िम्मेदारियों का पालन कर रही हो , फिर भी उस पर नौकरी छोड़ने का दबाव बनाया जाता है। .आज भी कई परिवारों में घरेलू हिंसा जैसे गंभीर अपराध हो रहे हैं . 

 आज के समाज में ये एक कटु सत्य है कि ऐसे परिवार भी देखने को मिल जाते हैं जो लड़की की ज़िंदगी में हद से ज्यादा दखल अन्दाज़ी करने को ज़िम्मेदारी का नाम देते हैं. पर ये ज़िम्मेदारी स्वयं लड़की की होनी चाहिये कि यदि वो अपने पैरों पर खड़ी हुई है और अपने भविष्य को सँवार रही है तो वो खुद को एक बेह्तर इंसान बनाने के साथ साथ समाज को एक खुशहाल परिवार ही भेंट दे रही है. क्योंकि एक लड़की ही आगे चलकर एक सफल पत्नी, माँ और अन्य रिश्तों से जुड़ती है  नए समाज की स्थापना करती  है.
ऐसे में परिवार वालों की ये ज़िम्मेदारी होनी चाहिये की कामकाजी महिला चाहे शादीशुदा हो या कुँवारी लड़की उन्हे अपनी बेटी  बहु का सहयोग करना चाहिये  कि जरुरत से ज्यादा दखल देकर अपनी ही बहु - बेटी को मानसिक तनाव की ओर ढकेलना चाहिए . महिलाओं को स्वयं ही अपने पारिवारिक या आस-पास मौजूद उपद्रवी लोगों से संभंल कर रहना चाहिये .

 प्रोफेशनल जगत में सेक्शुअल हैरसमेंट जैसे कई मुद्दे   सिर्फ एक स्त्री के मन मस्तिष्क को कुंठित बनाते हैं बल्कि अगर उसके दर्द को समझा  जाए तो यही घुटन उनके जीवन को अंधकार की ओर ले जाती है . ऐसी स्थिति में अपने साथ कार्य करने वाले कर्मचारियों  अपने बॉस के बीच प्रोफेशनल रिश्ता ही कायम रखें. अपनी पर्सनल  प्रोफेशनल लाइफ में अंतर बना कर रखें . यदि आपको ऐसा मह्सूस हो रहा है कि आपके बॉस या आफिस के किसी भी कर्मचारी की आप पर गलत निगाह है तो बेहतर होगा कि सख्त रवैया अपनायें . ऐसी स्थिति में आवाज़ उठाना कोई गलत बात नहीं . जरुरत पड़ने पर आस-पास की समाज सेवी संस्थाओं से सदैव संपर्क कायम रखें . आफिस के हर कार्य को लिखा पढ़ी में ही करें . लेटनाइट ड्यूटी की स्थिति में अपनी सतर्कता  सुरक्षा को प्राथमिकता दें और सावधानी बरतें . अपने वर्क प्रोफाइल के लिये मानसिक तौर पर स्पष्ट रहें . और यदि आपको लग रहा है कि आप का बॉस आप पर आपके वर्क प्रोफाइल के अलावा जरुरत से ज्यादा वर्क लोड बढ़ा रहा है तो इसका विरोध करें या स्पष्टीकरण माँगें.

यदि किसी तरह की फ्रस्ट्रेशन या मानसिक तनाव हो रहा है तो अपने प्रिय मित्र या परिवारिक सदस्य से खुलकर चर्चा करें . धैर्य  संयम कायम रखें . अपने खान पान पर विशेष ध्यान दें क्योंकि जब तक आप स्वस्थ नहीं होंगी तो आप अपने परिवार  कार्य को कैसे संभालेंगी ?

हम महिलाओं के ऊपर पुरुषों की अपेक्षा अधिक कार्य भार होता है. यदि कामकाजी महिलायें आफिस  घर दोनो ही संभालती हैं तो घरेलु महिलायें घर पर रह कर भी एक पुरुष से कई गुना ज्यादा कार्य संभालती हैं . परंतु समाज का कुछ वर्ग आज भी महिलाओं के मामले में पक्षपाती  ढीला रवैया अपनाता है तो ऐसी स्थितियाँ तनाव उत्पन्न करती हैं जो 'डिप्रेशन ' का रुप ले लेता है.

अपने पारिवारिक सदस्योंआसपास के वातावरणरिश्तेदारों की सोच  रवैये को समझें.  कौन किस तरह आपके कार्य में विघ्न डाल रहा हैउसका तुरंत विरोध करें . याद रखें कि हमें हमारी बेहतर ज़िन्दगी के लिये स्वयं स्वावलंबी होना होगा. अपनी मर्यादा में रहते हुए अपने अधिकारों का पूर्ण उपयोग कर हम अपने पैरों पर खड़े होकर ही एक स्वस्थ समाज को स्थापित कर सकते हैं.



13 comments:

रेखा श्रीवास्तव said...

बेटी , बहू और पत्नी को नौकरी करने के लिए सक्षम होने पर भी कई जगह ऐसी स्थितियां आतीं हें जब कि उसको नौकरी करने नहीं दी जाती है या फिर घर के जिम्मेदारियों के नाम पर उनको घर में रहने के लिए मजबूर किया जाता है. एक कामकाजी होने के नाते मैं कह सकती हूँ कि घर या परिवार की जिम्मेदारियों से कोई भी भागना नहीं चाहता है लेकिन उसके घर से बाहर निकलने के नाम पर घर के कुछ सदस्य असहयोगी रवैया अपना लेते हें. एक अग्निपरीक्षा होती है उसके लिए नौकरी और घर को संभालना.
बाहर तो आलोचना का शिकार होती ही है साथ ही घर के अन्य सदस्यों को भड़काने वाले काम नहीं होते --
--वह से सुबह से निकल जाती हें , सारा काम आपको देखना होता है ( घर के अन्दर कोई नहीं झांकता कि वह जाने से पहले सारे काम निबटा कर जाती हो)
--बड़ी घमंडी है , मोहल्ले पड़ोस में किसी से मतलब नहीं रखती है ( कब रखे, सुबह से काम निबटा कर काम पर निकलना और लौट कर फिर घर के काम)
यही नहीं घर में रहने वाला भी सारा क्रेडिट खुद ही ले लेता है, वह तो सुबह से निकल जाती हें सारा दिन मुझे ही सब कुछ देखना पड़ जाता है.) ये रास्ता आसान नहीं है लेकिन अपने को सिद्ध करने के लिए संघर्ष भले ही करना पड़े सिद्ध करके रहना है. हमें अपने लिए नहीं बल्कि औरों के लिए भी ऐसा ही सोचना होगा. अपनी बेटी हो, दूसरे की बेटी या बहू हो घर वालों को उनकी प्रगति के बारे में समझाएं और आप तो खुद समझदार होकर ये काम घर और बाहर कर ही सकती हें.

सुजाता said...

स्वप्निल , आपके लेख का आशावादी स्वर बहुत अच्छा लगा।
कुछ बातें समझना ज़रूरी है।"मर्यादा" शब्द का स्त्री के सन्दर्भ मे ही अधिकांशत: प्रयोग किया जाता है और उसका अर्थ वह नही रह जाता जो किसी अन्य मनुष्य के सन्दर्भ मे होता है।यह कोड ऑफ कंडक्ट स्त्री के लिए बिलकुल अलग बनाया गया है।इसलिए स्त्री की बात के साथ मर्यादा शब्द का प्रयोग ही हमें तुरंत बन्द कर देना चाहिए।स्त्री की मर्यादा का आधार है क्या?हमारे नैतिक मूल्य !हमारी नैतिकता का आधार क्या है ? धर्म !!जब सीधी टक्कर धर्म से है तो उसकी शब्दावली से हमे बचना होगा।
दूसरा,
स्त्री अपनी "सभी" ज़िम्मेदारियाँ पूरी करके काम पे जाती है फिर भी उसे सहयोग नही किया जाता......यह बात हमारा मुद्दा नही। पहले तय तो कीजिए कि एक परिवार मे किसके हिस्से कितनी ज़िम्मेदारी है....दिक्कत यह है कि स्त्री और उसके परिवार वाले पहले ही माने बैठी है कि खान-पान,बिस्तर,बच्चे,सिलाई,शॉपिंग ,बीमार की सेवा .....सब तमाम काम उसकी ही ज़िम्मेदारी है! क्यों? समस्या का बीज यहीं है!

स्वप्नदर्शी said...
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स्वप्नदर्शी said...
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स्वप्नदर्शी said...

महिलाओं की सुरक्षा और अस्मिता सिर्फ महिला कैसे आचरण करे, इससे न कभी तय हुआ है, न भविष्य में तय होगा. ये बहुत कुछ हमारे समाज की कहानी और उसकी सीमा हैं, कानूनी और राजनैतिक ढांचें के भीतर औरत को कितनी जगह दे दी गयी है यह उसकी बात है. समाज और घर परिवार के लोग स्त्री को एक मनुष्य की तरह इज्ज़त और निर्णय का अधिकार देतें हैं या नहीं, ये इसकी बात है. अगर महिलाएं घर के भीतर और नजदीकी समाज में हमेशा सवाल के कटघरे में रहती है, जिसकी मंशा इतनी तो है कि स्त्री आर्थिक सहयोग घर चलाने में दे, परन्तु कहीं योनिक स्वेच्छाचार न कर रही हो, और उसका शरीर दूषित न हो, तो ये एक बीमारी की दशा है. ये इस बात का उद्घोष भी है कि स्त्री मनुष्य नहीं संपत्ति है. भले ही पढी लिखी है, नौकरी कर सकती है, वों सारे काम कर सकती है, जिसे कोई भी पुरुष कर्मी कर सकता है, परन्तु अपने बारे में निर्णय नहीं ले सकती है. उससे भी बुरी बात ये है कि हमेशा स्त्री इसी डर में खुद घिरी रहे, और लगातार इसके प्रति कटघरे में खड़ी, सफाई देती फिरे. हम मनुष्य पहले है, औरत बाद में. यूं जेल के भीतर और कंसंट्रेशन कैम्प के भातर भी औरतें फैक्ट्री में काम करती रहीं हैं. सो काम करना अपने में महत्वपूर्ण नहीं है, असली बात जहाँ मनुष्य रहता है, और जिन लोगों के बीच काम करता है, जिस समाज में विचरता है, वहाँ वों स्वाभीमान के साथ रह सकता है, कि नहीं? घर और दफ्तर में औरत लगातार कैदखाने की मानसिक दशा में रहेगी तो कितनी रचनाशील हो सकती है? सुरक्षा के लिए अत्यधिक चिंता, समय से लौट आना, और काम पर चले जाना, स्थिति को वैसे ही बनाए रखेगा. जितनी ज्यादा औरतें हर समय आज़ाद घूमेंगी, घर से बाहर जाने का बेवक्त हौसला रखेंगी, उतनी ज्यादा सड़क और दफ्तर बाक़ी सब औरतों के लिए सुरक्षित हो जायेंगे. संख्या का अपना बल होता है.

दूसरा, जिस तेजी से दुनिया बदल रही है, बहुत ज़ल्दी स्किल्स डेटेड हो जा रही हैं, इसीलिए नयी चीज़ें सीखने के अगर अवसर है, और हमारे काम का हिसा भी जो नहीं है, उस काम को सीखने में कौन सी बुराई है. नए दरवाजे ऐसे ही ख़ुलतें है. कई दफा, बोस आप पर अतिरिक्त काम ही नहीं लादता, कुछ नयी चीज़े सीखने का अवसर भी देता है, और आप पर कृपा करके नहीं, बल्कि कम्पनी और संस्थान के हित में वर्कफोर्स को लगातार अपडेट करना ज़रूरी है. और साथ काम करने वाले लोगों से क्यूं बच कर रहना है, खा थोड़े जायेंगे, वों लोग भी मनुष्य है, और अधिकतर लोग अच्छे होते हैं, बुरे की बजाय. जितना हो सके ज़रुरत पड़ने पर अपने सहकर्मीयों को कामकाजी मदद देने और मुसीबत के समय घर-परिवार और बच्चों के मसले में मदद करना बुरा नहीं है. हम लोग इंसान हैं, सिर्फ मशीन के कल पूर्जे थोड़ी है. औरतपने के खोल और पिंजरे में इस कदर बंद होने की क्या ज़रुरत है? बिना डरे जहाँ तक हो सके अपनी पूरी मनुष्यता को क्लेम करें. स्त्री अधिकारों और डर- डर के खुद को सीमीत करने से बेहतर फ़ैल जाना है, स्त्री के लिए जो दबाव के तहत बनी संरचना है, उससे बाहर अतिक्रमण किये बगैर तो सब कुछ वैसे ही रहेगा...

Swapnil Shukla said...

आदरणीय सुजाता जी, आपको बहुत - बहुत धन्यवाद मेरे लेख को प्रकाशित करने के लिये...... व आपके विचारों से में पूर्णतया सहमत हूँ.

Swapnil Shukla said...
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Swapnil Shukla said...

@ स्वप्नदर्शी
अपने लेख 'आवाज़ उठाना कोई गलत बात नहीं ' पर आपकी बहुमूल्य टिप्पणी पढ़ी ........ मैं यह साफ करना चाहूँगी कि लेख में कहीं भी हम औरतों को डर कर रहना चाहिये या साथ काम करने वाले खा जाएंगे या खुद को पिंजरे में बंद करने की बात कतई नहीं कही गई अपितु लेख का उद्देश्य हम औरतें किस प्रकार जीवन के पग-पग पर कठिनाइयों का सामना करतीं हैं और हर चुनौती को स्वीकार कर उसमें सफल होती हैं, इस बात को उजागर करना है ....... हमारे समाज में महिला सशक्तिकरण की बातें तो बहुत की जाती है पर असल में हमारा समाज सकारात्मक बद्लाव की ओर अग्रसर है ....इसका मतलब यह नहीं की हम महिलाएं पूर्णतया सुरक्षित हैं...... सावधानी , सतर्कता का अर्थ डर नहीं होता ...... ये कोई कैसे कह सकता है कि साथ काम करने वाले या हमारे अपने घर वालों के शोषण का शिकार महिलाएं नहीं होती ..... आपके आसपास के लोग अच्छे है या बुरे ,इसका मतलब ये तो नहीं की जो आप देख रहीं हैं वो सच हो . .... यदि आप थोड़ी सतर्कता व सावधानी से रहें तो इसका मतलब घुटना , डरना या खुद को पिंजरे में बंद कर लेना नहीं होता. आपने लिखा है कि "जितनी ज्यादा औरतें हर समय आज़ाद घूमेंगी, घर से बाहर जाने का बेवक्त हौसला रखेंगी, उतनी ज्यादा सड़क और दफ्तर बाक़ी सब औरतों के लिए सुरक्षित हो जायेंगे. संख्या का अपना बल होता है." जी हाँ! संख्या का अपना बल होता है परंतु जब तक ये बल एकत्रित नहीं तब तक क्या करें ...... हर महिला की सोच यदि इतनी स्वछंद हो जाए तो समाज में औरतों के खिलाफ हो रहे अनैतिक आचरण का ही अंत हो जाए....... प्रश्न फिर वही उठता है कि जब तक स्थिति सुधर नहीं जाती ...हम महिलाओं के अनुसार नहीं हो जाती तब तक सतर्कता आपकी आज़ादी आपसे कतई नहीं छीनती ...........
हम कहीं न कहीं पितृ्सत्तात्मक सोच का विरोध करते हैं पर स्थिति इतनी बिगड़ चुकी है कि आज खुद एक औरत ही औरत पर कीचड़ उछालने में परहेज नहीं करती .पूर्णतया सूझ -बूझ व सही नीति द्वारा ही हम समाज में फैली औरतों के लिये संकीर्ण मानसिकता व गंदगी का जड़ मूल समेत अंत कर सकते हैं और एक स्वस्थ समाज कि स्थापना कर सकते हैं ... तय तो आखिर् हम औरतों को की करना होगा कि हमें सिर्फ फैलना है या अपनी शक्ति का सही दिशा में प्रयोग कर एक खुशहाल व संतुलित समाज की स्थापना करना है जहां औरतों और पुरुषों को सामान्य अधिकार प्राप्त हों, एक दुसरे के लिये आदर हो और खुद के अस्तित्व की पह्चान हो. और वैसे भी संतुलन कायम रखना बहुत आवश्यक होता है ..... मैंने इस लेख में भी इस बात का जिक्र किया है कि धैर्य, संयम, सूझ- बूझ व नीति के साथ हमें आगे बढ़ना होगा जिससे विषम से विषम परिस्थिति में भी हम रचनाशील बने रह्कर खुद के लिये खुशियों व स्वाभिमान से पूर्ण ज़िंदगी जी सकते हैं.

सुजाता said...

हमें फैल जाना चाहिये ,संख्या का अपना बल होता है - सहमत । लेकिन जब तक यह बल एकत्रित नही किसी काम का नही - सहमत।
संख्या तो भेड़ॅ बकरियों की भी अधिक होती है !
फिर क्या करना होगा ....यह प्रश्न है।

पुरुषों मे बहुत एकता है।पुरुष की अस्मिता मे पुरुष अन्य सभी अस्मितांशों से अधिक मुखर है।एक पिता के रूप मे , भाई,सहकर्मी,बेटा ...सभी रूपों मे अक्सर 'पुरुष'ही या कहें पितृसत्ता ही सोच रही होती है।
स्त्री की अस्मिता मे' स्त्री' बहुत कम मुखर हो पाती है। अक्सर माँ,बहन,बेटी,पत्नी ....होकर ही सोचती है।अक्सर घर से बाहर भी 'घर'से नही निकल पाती।यहाँ भी पितृसत्ता सोचती है ..लेकिन कोण बदल जाता है ...मै भाई,पति,पिता....की नज़र मे ठीक हूँ न?
संख्या मे जब तक मानसिक बल नही आएग,तब तक एकता नही आएगी।जिस मानसिक फ्रेम मे वह अब तक सोचती आयी है उसे ही तोड़ना होगा।

mohit said...

बेहद सराहनीय प्रस्तुति ...... सच में , आवाज़ उठाना कोई गलत बात नहीं ....... महिलायें किस प्रकार हर क्षेत्र में आगे बढ़ रहीं हैं व उन्हें किस प्रकार की तक्लीफों का सामना करना पड़ता है ..इस मुद्दे पर बेहद खूबसूरती से लिखा गया लेख....स्वप्निल जी को धन्यवाद .....

gsviews said...

great analysis.......a very well written & to the point post ......hope to see these kind of insightful posts in future too ... congr8

Rishabh Shukla said...

बेहद उमदा व सटीक विश्लेषण......

Asha Joglekar said...

बढिया लेख टिप्पणियां भी बहुत उपयोगी ।

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