Wednesday, August 1, 2012

गृहकार्य की अपरिहार्यता- विचार के कुछ बिंदु

दुनिया में ज्यादातर औरतें अपने को घर के कामों का विशेषज्ञ मानती हैं, बना लेती हैं। उनका यह व्यवहार लगातार हाशिए पर धकेले जाने के कारण अनावश्यक मान लिए जाने की असुरक्षा के बीच घर और समाज में अपनी जगह सुनिश्चित करने और खुद को परिवार के लिए जरूरी बनाने की जाने-अनजाने की गई कोशिश है। साथ ही लगातार करने के कारण स्वाभाविक तौर पर वे उन कामों की विशेषज्ञ हो भी जाती हैं।


उधर घर के पुरुष महिलाओं के ऐसे व्यवहार के आदी हो जाते हैं और उनकी महिलाओं से अपेक्षाएं भी यही हो जाती हैं। आखिरकार यह विशेषज्ञता धीरे-धीरे महिलाओँ का स्थापित, आधारभूत पारिवारिक कर्तव्य बनकर रूढ़ हो जाती है।


इस अवलोकन के आधार पर महिलाओं के मन की आम भ्रामक धारणाएं नीचे दे रही हूं।


1. कुछ घरेलू काम बेहद जरूरी हैं, जिनके बिना दुनिया का चलन रुक जाएगा।

2. उन कामों को बेहतरीन ढंग से करना भी उतना ही जरूरी है।

3. उन कामों को वे खुद अपने बेहतरीन ढंग से करें, यह भी उतना ही जरूरी है।

4. वे काम सिर्फ वे ही कर सकती हैं कोई दूसरा नहीं, क्योंकि वे ही उनमें पारंगत हैं।

5. चाहे कुछ भी हो, वे काम वे खुद ही करेंगी, वरना घर के लोग नाराज होंगे या असंतुष्ट रहेंगे।


 कृपया इन विचारों पर पर जम कर विचार, लानत-मलामत करें।  इसमें और बिंदु भी जोड़े जा सकते हैं। 

समीकरण हमेशा स्त्री-बनाम-पुरुष नहीं होता। हालांकि पुरुषवादी सोच भी उसी पुरुष- प्रभाव/प्रभुत्व के कारण आती है, लेकिन इससे उबरने की जहद तो हमें करनी होगी। खुद को इसके लिए तैयार करना होगा।

2 comments:

SM said...

thoughtful article
with time they become expert in household works

P.N. Subramanian said...

मैं तो इतना जानता हूँ कि गृह कार्य भी उतना ही कठिन है जितना बाहर (नौकरी) आदि का. पत्नी कि अस्वस्थता के कारण यह भार ढाई वर्ष तक मुझे उठाना पड़ा (सेवानिवृत्त भी तो थे ही) तभी अकल आई. अब भी किये जा रहे हैं क्यों कि वो अब नहीं रही.

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