Monday, September 29, 2014

अगर नहीं होती गुफा मैं

अगर नहीं होती गुफा मैं
तो  बन जाती नदी एक दिन।
जितना डरती रही
उतना ही सीखा प्यार करना
और गुम्फित हो जाना।
 गुफाएँ कहीं चलती नहीं
 इसलिए  अगर नहीं होती लता मैं
तो बाढ हो जाती क्या एक दिन?

एक परी या तितली या पंखुरी
सूने गर्भगृह की पवित्र देहरी पर पड़ी हुई।
कभी नहीं हो पाती मैं
जैसे हो सकती हूँ आज !
हवा हो जाती मैं शायद या बयार।

लेकिन
 एक भी अच्छा शब्द
छूटा नहीं है मेरे लिए।
तुम ऊब न जाओ
चलो फिर से गाएँ वही कविता
जिसमें मैं बन जाती थी चिड़िया और तुम भँवरा।
तुम्हारी गुन गुनाहट से
मैं प्यार सीखने लगूँगी फिर से।
इसलिए शब्दसाज़ होना होगा
मुझे ही
अबकी बार।

अगर नहीं होते तुम भ्रमर तो
मैं नहीं गाती कभी कविता
मैं गद्य रचती।
 मुझे फिर से तलाशने हैं
वे छंद जो गुफासरिता से बहते हैंं।

शापित आस्थाएँ अब भी वहाँ
दिया जलाती हैं
कि गुफाएँ पवित्र ही रहें ।
और चिड़िया - या जो भी कुछ
 मैं बनूँगी इस बार-
जब तक बेदखल है
तब तक बार बार पढनी होगी वही कविता
जिसमें तुम बादल बनते थे और
धरा बन जाती थी मैं।

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