Friday, October 3, 2014

नहीं हो सकता प्यार तुम्हारे मेरे बीच

नहीं हो सकेगा
प्यार तुम्हारे-मेरे बीच
ज़रूरी है एक प्यार के लिए
एक भाषा ...

इस मामले में
धुरविरोधी हैं
तुम और मैं।

जो पहाड़ और खाईयाँ हैं
मेरी तुम्हारी भाषा की
उन्हें पाटना समझौतों की लय से
सम्भव नहीं दिखता मुझे
किसी भी तरह अब।

इसलिए तुम लौटो
तो मैं निकलूँ खंदकों से
आरम्भ करूँ यात्रा
भीतर नहीं ..बाहर ..
पहाड़ी घुमावों और बोझिल शामों में
नितांत निर्जन और भीड़-भड़क्के में
अकेले और हल्के ।

आवाज़ भी लगा सकने की  तुम्हें
जहाँ नहीं हो सम्भावना ।
न कंधे हों तुम्हारे
जिनपर मेरे शब्द
पिघल जाते हैं सिर टिकाते ही और
फिर  आसान होता है उन्हें ढाल देना
प्यार में ...

नहीं हो सकता प्यार
तुम्हारे मेरे बीच
क्योंकि कभी वह मुकम्मल
 नहीं आ सकता मुझ तक
जिसे तुम कहते हो
वह आभासी रह जाता है
किसी जालसाज़ ने दिमाग को मेरे
 प्रिज़्म बना दिया है;पारदर्शी
लेकिन
तुम्हारे शब्दों को
हज़ारों रंगीन किरनों में बिखरा देता है।

4 comments:

SM said...

nice poem

neelima garg said...

v. good...

कविता रावत said...

दो विपरीत किनारे कभी नहीं मिलते ...
प्यार में एक दूजे के लिए समर्पण भावना न हो तो प्यार प्यार नहीं रह पाता...
बहुत बढ़िया

प्रफुल्ल कोलख्यान said...

इस बढ़ते हुए अंतर्वैयक्तिक विकर्षण को समझना होगा। कविता और डायरी में फर्क को मैं समझता हूँ। इसके सही आशय तक पहुँचने के लिए थोड़ी-सी निर्वैयक्तिकता की जरूरत पड़ेगी और थोड़ा-से जेंडर-रिलेक्सेशन (विचार और संवेदना में निर्जेंडर होने की प्रक्रिया) होने की प्रक्रिया को भी अपनाने की जरूरत होगी, जो थोड़ा कठिन तो है पर असंभव नहीं। जिद और उत्तेजनाओं से बाहर यह कविता सह-अस्तित्व की नई समतल जमीन और सामाजिक आयाम की जरूरत को संवेदना के स्तर पर प्रकट करती है। इसे ज्ञान के स्तर पर हासिल करने के लिए समान व्यवहार को संभव कर सकनेवाले संभावित एवं प्रतीक्षित समाज की भाषिकता और भाषा की सामाजिकता को अर्जित करना होगा। यह कविता हिंदी कविता की उस श्रृँखला में पठनीय है जो जेंडर-फ्री समाज के स्वप्न और यथार्थ के संघात के बीच से निकली हैं। अभी तो इतना ही..

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