Saturday, November 8, 2014

सामाजिक मोर्चे पर आज़ादी !

बहुत सी ख्वाहिशें पूरी कीं ...कुछ की कोशिश अभी बाकी है...एक ऐसी है कम्बख्त जिसकी न कोशिश कर सकती हूँ न कभी पूरी ही होगी।पतनशील इच्छा है न! पतनशील इच्छाएँ भी वैसे अपनी व्यक्तिगत कीमत पर पूरी की ही  जा सकती हैं ...पर मेरी चिंता सिर्फ अपनी अकेले की नही है।

सुबह सुबह कॉलेज पहुँचें तो मैदान मे खेल खेल कर थक चुके लड़के शर्ट उतार पाइप से नहा रहे थे। 20 वर्ल्ड कप जीतने पर खुशी ज़ाहिर करने के लिए धोनी ने अपनी टीशर्ट उतार फेंकी थी। 'रंग दे बसंती' के पोस्टर देख देख लगता था दोस्ती और मुक्ति के आनंद की सार्वजनिक अभिव्यक्ति का यह अंदाज़ चिढाता है मुझे ,स्त्री को उसकी सीमाएँ दिखाता हुआ सा ! जहाँ ट्यूबवैल या पानी मिले वहाँ ही नहाना शुरु हो जाना ...यह सार्वजनिक स्नान दुनिया को अभद्रता क्यों नहीं लगता?

श्लील अश्लील तय करने वाले पैमाने बाकी मानकों कीतरह ही स्त्री पुरुष के लिए अलग हैं।  एक के लिए अश्लीलता स्वाभाविक और एक के लिए गुनाह है।धर्म , समाज,राज्य ,कानून  पुरुष की ओर हैं। यह किसी पूर्वाग्रह से नहीं कहती बल्कि इसलिए कहती हूँ कि स्त्री कमरे के भीतर स्वयम को कितना भी मुक्त मान ले लेकिन जिन सड़कों पर वह चलती है ,जिन दफ्तरों में वह काम करती है, जिस पार्क में बच्चों को खिलाने ले जाती है, जिस खेत में निराई करती है, जिस भवन के निर्माण साइट पर मजदूरी करती है ,जिन ठेलों से सब्ज़ी का मोल भाव करती है ...वे उसकी आज़ादी और आज़ाद खयाली को बेमानी कर देते हैं। इसलिए स्त्री की स्वतंत्रता समाजिक रूप से ही हासिल की जाने की चीज़ है। व्यक्तिगत स्वतंत्रता जैसी चीज़ एक भ्रम है। सिर्फ मेरे व्यक्तिगत चुनाव मुझे पूर्ण रूप से आज़ादी का अनुभव नही करा सकते जब तक की स्त्री जाति ने वह आज़ादी समाजिक मोर्चे पर हासिल न की हो। आखिर , आज़ादी एक सामाजिक निर्मिति जो है।

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