Wednesday, November 5, 2014

Thank you for not gendering !

क्या स्त्री अपनी उम्र बढने के साथ साथ जेंडर से मुक्त हो पाती है ? माने जैसे  60 की उम्र तक पहुँचते पहुँचते इतनी आज़ादी हासिल कर लेना कि घर में और सदस्यों के होते हुए,ड्राइंग रूम में,बालकनी में बिना झिझक लेट पाना या  ब्रा की लगाम से मुक्त होकर घर में या बाहर बाज़ार तक घूम आना।किसी से कहीं भी खड़े होकर बतिया लेना। या क्या ऐसा है कि भीड़ में स्त्री अपने जेंडर से मुक्त हो जाती है। हरिद्वार के घाटों पर बेझिझक महिलाओं ,लड़कियों को एक पेटिकोट बांधे नहाते देखा है और उन्हें ताड़्ते देखा है बहुत पुरुषों को।कपड़े बदल लिए जाने के क्रम में भी वे स्त्रियाँ निरापद भाव से 'कुछ कुछ ' दिख जाने को नज़रअंदाज़ कर देती हैं।जो बड़ी बूढियाँ अन्यथा लड़कियों को दुपट्टे और कमीज़ सलवार की  तहज़ीब सिखाती हैं वे ही यहाँ लड़कियों को कहती पाई जाती हैं - कौन देख रहा है तुझे ही, चल ड्रामा मत कर , डुबकी लगा । यहाँ कोई नैतिक पुलिस नहीं है। यहाँ कोई शर्म ,रोक टोक नहीं है ।यह बेपरवाही जिस खयाल से आती है उसे मैं अपने भीतर नहीं ला पाई। गंगा  के घाट से पिछली दो बार बिना स्नान किए लौटी और अब जा ही नही पाती जबकि कितना सुखद है कुछ पल के लिए यह भूल जाना कि आप 'स्त्री' हो और बल्कि उससे ज़्यादा यह कि आप ' स्त्री शरीर ' हो। धर्म कर्म के नाम पर न होता तो मैं हरिद्वार के घाटों को 'जेंडर मुक्त एरिया' घोषित करना चाहती या लिखना चाहती 'thank  you for not gendering !'

2 comments:

SM said...

thoughtful post

प्रफुल्ल कोलख्यान said...

बहुत ही मार्मिक है और हाल ही में प्रकट न्यायिक संवेदनहीनता के आलोक में विशेष रूप से पठनीय है।

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