Monday, February 22, 2016

यह वो आज़ादी नहीं जो हमें माँगने से आसानी से मिल जाएगी

  • मंजू शर्मा 

स्त्री की आज़ादी को लेकर लंबे समय से एक बहस जारी है पर सवाल अब भी वही है,क्या सचमुच स्त्री आज 21वीं सदी में भी आज़ाद है और उसे उसके हिस्से का वह उन्मुक्त आसमान मिल पाया है जिसे इस प्रकृति ने तो दिया है पर हमारे पितृसत्तात्मक ढाँचे की उसके हिस्से का आसमान छीनने की पुरज़ोर कोशिश अब भी जारी है।

इसे लिखते हुए मुझे चित्रा मुद्गल जी की कही हुई बात को यहाँ शामिल करना बेहद जरूरी जान पड़ा-“पिंजड़ा लोहे का हो या पीतल का,या फिर हीरा मोती जड़ा सोने का,उसके भीतर पाँव टिकाने भर की अलगनी स्त्री की ज़मीन है और उसकी तीलियों के बाहर का आसमान उसका आसमान।”औरत को औरत भर समझा गया है इंसान बनने के सफ़र पर तो अब भी लड़ाई जारी है।

पचास साल से भी ज्यादा हो गए जब फ्रांस की सुप्रसिद्ध नारीवादी लेखिका सिमोन द बुवा ने अपनी किताब ‘द सेकेण्ड सेक्स’ में एक सवाल उठाया था “यह दुनिया हमेशा पुरुषों की रही,मगर क्यों?स्त्री को उनके अधीन होकर ही रहना पड़ा।” आखिर क्यों ! हम यह अधीनता क्यों स्वीकार रहे हैं? सिमोन का सवाल आज भी उतना ही समीचीन है जितना तब था।

जहाँ देश की स्वतंत्रता की लड़ाई में स्त्री भी पुरूषों के साथ-साथ बंद दीवारों और घरों की चाहरदीवारी से बाहर निकलकर आयी थी और कंधे-से-कंधा मिलाकर लड़ी थीं वहाँ इस आज़ादी को हासिल करने के बाद उसे पुन: अपनी उसी निर्धारित चौहद्धी में लौटना पड़ा। कभी कभी  लगता है कि हमें नए सिरे से बाहर निकलने के संघर्ष करने पड़ रहे हैं।

21वीं सदी के पुरोधागण यह कहने से भी नहीं चूकते हैं कि स्त्रियों की आज़ादी  घरों को तोड़ रहे हैं।बड़ी हास्यास्पद बात है न कि टूटते घर-परिवार और बढ़ते तलाक की सारी जिम्मेदारी और उसपर असहनशील मार्का लगाकर इस समस्या को एकांगी और सतही तरीके से देखने का पक्षपातपूर्ण रवैया यहाँ भी अपना लिया जाता है। अगर कुछ स्त्रियाँ जो आर्थिक रूप से स्वतंत्र हुई हैं,अपने अस्मिता की पहचान बना पाई हैं, बड़े-बड़े पदों पर काम कर रही हैं तो अब भी उनके आत्मविश्वास से उस पुरूष वर्ग के सामंती संस्कारों को चोट पहुँचती है जो बड़े-बड़े आयोजनों में भाषणों का अंबार लगा देते हैं, आधुनिकता का नकली दंभ भरते हैं।

स्त्रियाँ प्रगतिशील तो हुई हैं पर संभावनाएँ अभी बाकी है, उनकी आकुलताएँ आज भी बरकरार हैं और आज़ादी के संघर्ष में वे कीमत स्त्री चुका रही है है खुद के खिलाफ  बढती हिंसा से। ज्यों ही स्त्रियाँ बोलना शुरू करती हैं चाहे अपने साहित्य के माध्यम से ही क्यों न बोले उसके लिए ऐसे फतवे जारी हो जाते हैं क्योंकि आज की तारीख में ये फतवे ही हैं जिसके माध्यम से ही स्त्रियों की बोलने की आज़ादी को छिना जा सकता है।

 जो स्त्रियाँ आर्थिक तौर पर निर्भर हो भी गयी हैं उनका संघर्ष भी थमा नहीं है,अनेक स्तरों पर उनके संघर्ष बढ़ते ही जाते हैं।पहला संघर्ष तो उसका वह घर ही होता है जिसके लिए उसके सामने शर्त होती है कि यहाँ किसी तरह की सपोर्ट की उम्मीद वो किसी से ना करे।दुसरे संघर्ष का मोर्चा होता है उसका वर्क-प्लेस,जहाँ पुरूषों की एक ऐसी वर्चस्व वाली दुनिया होती है जिन्हें किसी स्त्री का काम करना उनके अधिकार-क्षेत्र में दखलंदाजी प्रतीत होती है।

 मैं अपने एक वर्ष पहले के उस कड़वे अनुभव को शामिल करना चाहूँगी जब मुझे कुछ मेरे विद्यालय के पुरुष साथियों द्वारा सुनना पड़ा कि जो औरतें घर-से दूर आकर नौकरी करने आती हैं उनका कैरेक्टर ठीक नहीं होता। और तो और अपने ही पुरूष अधिकारी से मुझे सुनना पड़ा कि औरत हो औरत की तरह रहो ज्यादा उड़ने की कोशिश मत करो,मैं परों को कतरना जानता हूँ।जिस संत्रास से मुझे गुजरना पड़ा था मैं दावे-से कहती हूँ कि प्राय: वर्क-प्लेस में कुछ और भी मेरी सखियाँ होंगी जिन्हें ऐसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ता होगा।

इस आज़ादी और समानता के लिए प्रबल-आग्रह हम हर दिन भले ही पेश कर रहे हैं इस समाज के समक्ष पर परिवेश के पहिये वहीं गोल-गोल घूमते-से जान पड़ते हैं। अगर हालिया घटनाओं पर भी प्रकाश डालें तो कहीं से भी मुझे तो नहीं जान पड़ता कि भारत की आज़ादी के 67 साल बाद स्त्रियों को भी उसके हिस्से की आज़ादी मिली है। क्या हमारे देश की आज़ादी यही कहती है कि पति के कर्ज न दे पाने पर गाँव के पाँच पंच पत्नी के साथ बलात्कार करके पति के कर्जे का भुगतान वसुलेंगे?क्या हमारे देश की आज़ादी यही कहती है कि डायन घोषित करके स्त्री को निर्वस्त्र करके सारे गाँव के सामने घुमाया जाए?मैं खुद इस परिस्थिति से गुजर रही हूँ,जहाँ कई बार एक पीड़ा और घुटन को मैं महसूस करती हूँ जो मेरे जैसी कई और स्त्रियाँ करती होंगी। जब मैं यह लेख लिख रही हूँ उसके 15दिनों के बाद मुझे अपनी नई नौकरी के सिलसिले में एक नए शहर की ओर निकलना है और उस शहर में मुझे आशियाने के लिए जिन सवालों से दो-चार होना पड़ता है कई बार लगता ही नहीं कि मेरी अपनी भी कोई अस्तित्व है-मकान मालिक का सीधा सवाल होता है कि पति साथ नहीं होंगे तो अकेली महिला को हम घर नहीं दे सकते हैं,पर मैं पूछना चाहती हूँ ऐसे लोगों-से क्या अकेले अलग शहरों में पति –से दूर रहने वाली महिलाएँ अस्तित्ववीहिन हैं ? जिनके साथ पति नहीं उनके लिए घरों के दरवाज़े बंद करना यह कैसी अमानवीय सोच है! ज्यादा-से-ज्यादा मेहनत करके अगर मुझे अपने परिवार की जरूरतों को पूरा करना है ऐसे में घुट कर रह जाती हूँ कि मेरे  लिए कोई अस्तित्व इस समाज ने शायद निर्धारित की ही नहीं है।

हो सकता है वैश्विक परिदृश्य में अपनी पहचान बनाने के लिए फेमिनिज्म का नारा लोगों द्वारा बुलंद किया जा रहा हो पर इस फेमिनिज्म को केवल एक स्त्री समझे इससे बेहत्तर क्या यह नहीं होगा कि एक पुरूष भी फेमिनिस्ट होकर इसे समझने की कोशिश करें!अगर ईमानदारी से यह समाज हम स्त्रियों को भी उन्मुक्त देखना चाहता है (जो  कि  लगता नहीं ) तो इस समाज के लिए यह आवश्यक है कि विश्वदृष्टि का अनुकरण करते हुए पुराने जर्जर मुल्यों-परंपराओं को तोड़ें,नए मूल्यों की स्थापना में आ रही बाधाओं को दूर करें।

अगर औरत को सचमुच आज़ादी मिल गयी होती तो कन्या भ्रूण-शिशुओं की हत्याओं की घटनाएँ,बलात्कार के मामले में इज़ाफ़ा न हो रहा होता।जाति-बिरादरी के बाहर प्रेम करने के दंड में जातीय पंचायतें प्रेमियों को फाँसी की सजा मुकर्रर करती है।मीडिया को सगर्व फुटेज भी मिलते हैं और हमसब इस लोकतांत्रिक देश के निवासी सबकुछ आँख पसारे पथराए हुए आँखों से सबकुछ देखते हैं।आलू-प्याज की तरह औरतों की बिक्री होती है यह क्या आज़ादी की स्थिति है? वैवाहिक ढाँचे में भी कमोवेश बनी-बनाई लीक पर ही चल रहे हैं ,क्या औरतें भी अपनी इच्छा-अनिच्छा को व्यक्त करने को स्वतंत्र हैं शायद नहीं! एक स्त्री अगर ऐसा करे तो कई सशंकित नज़रों के सवाल उसे घुरने लगेंगे और पुरूष जब चाहे,स्त्री की इच्छा-अनिच्छा की परवाह किए बगैर उसके साथ शारीरिक संबंध पत्नी होने का हक जतलाकर जबरन बना सकने के लिए एकदम-से आज़ाद है क्योंकि हमारे देश के कानून में भी यही उल्लेखित है कि ब्याहता पत्नी से संबंध बनाने वाले पुरूष को बलात्कारी नहीं कहा जा सकता है।क्या ऐसी आज़ादी का सपना हम स्त्रियों ने देखा होगा? दु:खद तो यह है कि यह आज़ादी हमें माँगनी भी किससे पड़ती है,हेकड़ीभरे हुए पुरूषों और उनके बने-बनाए हुए पुरानी अवधारणाओं से।

यह वो आज़ादी नहीं जो हमें माँगने से मिल जाएगी। यह आज़ादी पितृसत्तात्मक समाज नहीं देगा।जिस तरह-से एक पक्षी के अंडे के खोल के अंदर का जीव जिस दिन शक्तिशाली हो जाता है,खुद-बखुद कैल्सियम के कठोर खोल को तोड़कर बाहर आ जाता है।कुछ ऐसा ही मैं स्त्रियों के लिए भी मानती हूँ कि स्त्रियों को जो आज़ादी चाहिए वह भी ऐसे ही मिलेगी अर्थात् जरूरत इस बात की है कि स्त्री अपनी प्राकृत और समर्थ रूप को प्राप्त करे जिसमें उसके औजार का काम करे,स्त्री की शिक्षा और उसका खुद पर आत्मविश्वास।तभी शायद एक स्त्री समाज की विडंबनाओं और विसंगतियों के दमित वातावरण और घुटती देहरियों से बाहर कदम रख पाएगी। कुछेक प्रतिशत महिलाएँ जरूर शिक्षित और आत्मनिर्भर हुई हैं और अपनी कोशिश से अपने इर्द-गिर्द बनाए हुए दायरों को तोड़ पाने में सफल हुई है पर इतनी सफलता नाकाफी है। प्राकृतिक रूप से पुरूषों के बराबर ही सक्षम होने पर भी महिलाएँ अपनी अशिक्षा,हीन-भावना,परिवार और घर के प्रति अत्यधिक मोह और खुद के विकास को लेकर उपेक्षा का भाव आदि वज़हों से भी कहीं-न-कहीं इस आज़ादी को नहीं प्राप्त कर पा रही है। हम स्त्रियों को भी आज अपना स्पेस अगर चाहिए तो माँगने की बजाए हमें लेने आना होगा।

इसके लिए हम चलते-चलते जितनी दूर तक आए हैं उससे भी अधिक दूर तक हमें चलते हुए जाना है जहाँ आसमान का वह छोटा-सा टुकड़ा मेरा अपना होगा और उससे आने वाली धूप भी छन-छन कर उधार की नहीं होगी।वह धूप मेरी अपनी होगी,वहाँ आसमान भी मेरे संग-संग खिलखिला रहा होगा और वहाँ बरसने वाली मेघ की नन्ही-नन्ही बूँदों को हथेलियों को भरने के लिए मुझे किसी से परमिशन नहीं चाहिए होगी। तभी मैं कह पाउँगी कि आज मैं आज़ाद हूँ,यह सारा जहाँ मेरा अपना है,मैं जो चाहूँ करूँ,नाचूँ या गाउँ।सबकुछ करने के लिए आज मैं आज़ाद हूँ और मैंने अपने पिंजड़े के बंद दरवाज़े को तनिक मेहनत से उचकाकर खोल लिया है और देखो मैं आकाश के परिंदे के साथ रेस लगाने के लिए तैयार हूँ।

क्योंकि नहीं बनना मुझे ऐसी कोई बोनसाई जिसके जड़ों को समय से पहले ही काट दिया जाता है और सजाकर रख दिया जाता है किसी दफ्तर या घर के अंधेरे-से किसी कोने में।
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मंजू शर्मा हिंदी से एम ए और एम .एड. हैं और फिलहाल ओ पी जिंदल स्कूल, रायगढ में कार्यरत हैं।
वे फेसबुक पर भी सक्रिय हैं।




1 comment:

SM said...

thoughtfully written
females will have to fight this fight for many centuries there is no easy way out.

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