Tuesday, February 9, 2016

चांद बोला पागल को - क्यों करती है रचनात्मक स्त्रियाँ आत्महत्या ?

क्यों करती हैं रचनात्मक मन की मालकिन स्त्रियाँ आत्महत्या यह शोध का गम्भीर विषय है। ऐसा क्यों है कि दुनियाभर में आत्महत्या करने वाले साहित्यिक पुरुषों की तुलना में स्त्रियों के नाम अधिक हैं ? सिल्विया प्लाथमरीना स्विताएवावर्जीनिया वूल्फ,एन्न सेक्स्टन , साराह केन , सारा शगुफ्ता ...और जाने कितने ...

सिल्विया प्लाथ के बारे में कहा जाता है कि अपनी किचन में खुले अवन में सर देकर जान दे देने से पहले रसोई और बच्चों के कमरे का दरवाज़ा गीले तौलियों से सील कर दिया था उसने। मौत हुई कार्बन मोनोऑक्साइड से। 30 की उम्र में।  पाकिस्तानी शायरा सारा शगुफ्ता मेंटल असायलम आती जाती रहीं और मरने की कोशिशें बरकरार रखीं। आखिरकार सफल हुईं। जीवन से आज़ाद हुईं। सारा पर लिखी अपनी किताब में अमृता प्रीतम ने उसकी मौत को सिल्विया प्लाथ के आत्महत्या के तरीके के नज़दीक कहा है।रूसी कवि मरीना स्वेतायेवा ने 48 की उम्र में जीवन लीला समाप्त की...नाम और भी बहुत हैं ...

लेकिन बहुत वाजिब सवाल है कि स्त्री कवि क्यों इस कदर मानसिक पीड़ा ,असंतुलनतनाव की शिकार हो जाती हैं कि आत्महन्ता हो जाती हैं। क्या क्रियेटिविटी और साइकोपैथॉलॉजी का कुछ विशिष्ट रिश्ता है?

मूड डिसऑर्डर , एंग्ज़ायटीडिप्रेशन सबके पीछे जेंडर का और बायलोजी , समाज और मनोविज्ञान का गहरा रिश्ता होने की बहुत सम्भावनाएँ हैं। मरीना भयानक आर्थिक संकट से गुज़रती हुई अकेली 3 बच्चों को पाल रही थीं जिनमें से एक बच्ची लगातार बीमार रहती थी और दूसरी को आर्थिक संकट के चलते अनाथालय में भेजना पड़ा , जहाँ उस बच्ची की मृत्यु हो गई। लिखने का संकट मरीना का अकेले का संकट था। पति रूस की राजनीतिक गतिविधियों में यहाँ से वहाँ होते ही रहते थे। मरीना की चिट्ठियों और कविताओं में यह अवसाद बार बार झलकता है कि तमाम आर्थिक संकटों के बीच घिरे हुए ,घर और बच्चों की ज़िम्मेदारियों मे उलझकर कई कई दिन उसे कलम तक उठाने का मौका नही मिलता। लिखने का समय पाना स्त्री के लिए अक्सर एक अलभ्य चीज़ रही है और घर उसके सर पर हर वक़्त सवार। एक कवि के लिए यही सबसे बड़ी पीड़ा है कि महीनों उसे कलम को छू सकने का भी मौका न मिले। उस पर साहित्य में भी अलग अलग तरह के  संघर्ष मरीना ने झेले ही। बाहर -भीतर एक साथ बराबर की जद्दोजहद में वह हार मानती है आखिर...

मरीना की एक चिट्ठी यहाँ पिछले एक पोस्ट में दी गई है। अपने एक और खत में लिखती हैं -     
मरीना स्विताएवा
"रातभर बिस्तर पर बैठे रहना होता है। आल्या को 40.4 डिग्री बुखार है। मलेरिया है।...जी  रही हूँ चारों ओर उदासीनता है।मैं और आल्या इस संसार में अकेली हैं। मास्को में कोई भी हमारी तरह अकेला नहीं।दूसरे बच्चों के पास कोई न कोई बैठा होता है और मैं उसे अकेली छोड़ने को विवश हूँजलाने की लकड़ी लाने के लिए बाहर निकलना ज़रूरी है।...पिछले कुछ दिनों से मैं इतनी सुखी थी: आल्या ठीक हो गई थी और मैं- दो महीनों के बाद-फिर से लिखने लगी थी- पहले से कहीं ज़्यादा और बेहतर।
मैं पुस्तक तैयार कर रही थी।1913 से 1915 तक की पुरानी कविताओं को फिर से ज़िन्दा कर रही थी, 20 वर्ष की उम्र की अपनी और दूसरोंजिन्हे मैं प्यार करती थी, उनकी ज़िंदगी में खो गई थी।
और अब आल्या की अस्वस्थता। मैं लिखने में असमर्थ हूँ,लिखने का अधिकार नहीं क्योंकि लिखना विलासिता  और आनंद में होना हैमैं चिट्ठियाँ लिख रही हूँ और किताबें पढ रही हूँ। इससे एकमात्र यही निष्कर्ष निकाल रही हूँ कि मेरे लिए     एकमात्र विलासिता है कलाजिसके लिए मैं पैदा हुई हूँ।"
           
साइकॉलजिस्ट कॉफमैन ने 2001 में इस प्रवृत्ति के लिए  सिल्विया प्लाथ इफेक्ट '  टर्म गढा। उसने माना कि स्त्री कवियों में अन्य रचनात्मक लोगों की तुलना में पाई जाने वाली आत्महत्या की प्रवृत्ति अधिक होती है।

सिल्विया की मृत्यु रहस्य से कम नही थी...मरीना की तरह सिल्विया के लिए लिखने का संकट अकेले का संकट नही था। उन्होंने अंग्रेज़ी के एक बड़े कवि से शादी की थी। दोनो रचनात्मक जीवन से जुड़े थे। यह साझा संघर्ष होना था। लेकिन सिल्विया की कविता "डार्क हाउस "  डराती है।

उनकी मृत्यु के बाद उनके पति टेड ह्यूज की लिखी यह कविता -


सिल्विया प्लाथ 
क्या घटा था उस रात, तुम्हारे घन्टों के भीतर
उतना ही अजाना है जैसे कि वह कभी घटा ही न हो,
तुम्हारी पूरी ज़िन्दग़ानी की कौन सी पूंजी,
जैसे एक अचेतन कोशिश, जैसे जन्म एक आलसी पल के

झीने पर्दे से दूसरे पर ज़ोर डालते हुए,
ऐसे हुआ जैसे कि ऐसा घट ही न सकता हो
जैसे वह घट ही नहीं रहा था.
(कबाड़खाना से )
इसमे कोई शक नही कि सामाजिक प्रतिबद्धताएँ और घर जैसी एक जगह को चलाने का लगातार का दबाव और इसके साथ ही जिसे सीमोन ने कहा और जर्मेन ग्रियर भी कहती हैं कि एक ऐसा अंग यानि कोख मिली होना स्त्री की विचित्र नियति रचते हैं। अकसर यह सब अनरिपोर्टेड और अनसुना ही रह जाता रहा । अभिशप्त योनि और कुलच्छनी कोख (द फीमेल यूनक- जर्मेन ग्रियर) पितृसतात्मक व्यवस्था में गुलामी के टूल बन जाते हैं। प्रेम का नाम मिलते ही इस दुष्चक्र का न गुलाम को एह्सास होता है न मालिक को। इसीलिए रैडिकल फेमिनिस्टों ने माना था कि जब तक स्त्री को अपनी कोख पर नियंत्रण नही मिलेगा वह आज़ाद नहीं होगी। मातृत्व से मुक्ति जैसा कठोर विचार सुनकर एकदम से भड़क उठने वाला समाज कब और कहाँ किसी स्त्री की मदद करने आता है मातृत्व में मुझे अपने 38 साल के जीवन में यह दिखाई नहीं दिया। व्यंग्य कसने और कटूक्तियाँ कहने अवश्य प्रगट होता है यथासमय। बाद बाद को ज़रूर फेमिनिस्टों में इस विचार को लेकर अलग अलग मत हो गए। उस पर फिर कभी।
एक पहचान लैंगिक पहचान है ( वह जेंडर पह्चान और भूमिका जो समाज प्रदत्त है ) एक पहचान कवि रूप में ...वह स्त्री पैंडुलम है...इधर एक बार स्त्री , फिर उधर कवि, और जब दोनो सधते हैं तो बीच का वक़्फा नही सधता और ठीक उसी टाइम और स्पेस में कोई सिल्विया या
वर्जीनिया या मरीना अपना यह किस्सा हमेशा के लिए खत्म कर लेती है। यह अस्मिता का भयानक संकट है कि सिल्विया को बलाघातपूर्वक कहना होता है- I am I am I am और मरीना को जो बार बार लिखने को विवश करता है- मैं कवि ही रहूँगी अपनी अंतिम सांसों में ...

शेष कभी और , अभी सिल्विया की कविता डार्क हाउस से यहाँ समाप्त करती हूँ -


यह अँधेरा कमरा है, बहुत विशाल
मैंने अपने लिए बनाया है इसे
एक शांत कोने से शुरू करके कोठरी दर कोठरी
चबाते धूसर पन्नों को
गोंद की बूंदे टपकाते
कुछ और सोचते
सीटियाँ बजती हैं, कुलबुलाता है मेरा कान.

कितनी कोठरियाँ हैं इसमें
कैसी पनियाले सांप के बांबियों सी
उल्लुओं के घोसलों सी
मैं अपनी खुद की रौशनी में देखती हूँ
किसी भी दिन जन सकती हूँ पिल्ले
या किसी घोड़े की माँ बन सकती हूँ। हिलता है मेरा गर्भ।
मुझे बनाने ही होंगे और नक़्शे

ये मज़बूत सुरंगे!
छछूंदर सी, मैं कुतरती हूँ अपने रास्ते
पूरे चेहरे पर घास चिपकी है
और मांस के टुकड़े।
वह एक पुराने कुएं में रहता है
एक पथरीली खोह में। दोष उसका है
कि मोटा सा है वह

कंकड़ों सी गंध, शलजमी कोठरियाँ
छोटी छोटी नासिकाएं ले रही हैं सांस
छोटे छोटे विनयी प्रेम!
बेकार के, नाक जैसे अस्थिविहीन,
जड़ों की आंत में
काबिल-ए-बर्दाश्त है और स्नेहिल।

एक नर्म दिल माँ है यह।

12 comments:

अनिल जनविजय said...

मरीना स्विताएवा - सही नाम है। आपने पता नहीं क्यों मारीना लिखा है। त्स्वेताएवा लिखा जाता है, लेकिन स्विताएवा -सही रूसी उच्चारण है।

अनिल जनविजय said...

मरीना स्विताएवा - सही नाम है। आपने पता नहीं क्यों मारीना लिखा है। त्स्वेताएवा लिखा जाता है, लेकिन स्विताएवा -सही रूसी उच्चारण है।

मसिजीवी said...

व्यक्ति के 'रचनात्मक' होने का मेनिफेस्टो और इसके तहत उसके लिए समाज से अतिरिक्त रियायतों की अपेक्षाएं किसी के लिए कम और किसी के लिए ज्यादा तो पूरी होंगी ही। कभी लैंगिकता की वजह से कभी अन्यान्य वजहों से। इनमें से अधिकतर रचनाकार के अपने 'रचनात्मक दौर' में ही स्वयं कटॅूक्ति सम हो चुकी होने के भी उल्लेख मिलते हैं।
बाकी मॉडरेटर ने क्या धमकियाता अवसर चुना है विषय के लिए। थ्री-ईडियट के पात्र फरहान का पिता प्रसंगवश पुत्र खुदकशी की आशंकामात्र से ही कह देता है..फिर तो बात ही खत्म हुई न

मॉडरेटर को जन्मदिन की दिली बधाई।

Omparkash 'Hathpasaria' said...

सुजाता जी , आज ही इस विषय पर आपने लिखकर अपने सभी मित्रों को एक अकल्पित विषय को समझाने का जो प्रयास किया है , वह मात्र घटनाओं के तथ्यों से पूर्ण नहीं किया जा सकता है या इस विषय की इतिश्री केवल घटनाओं / कविताओं से करना इस विषय के साथ अन्याय है . विज्ञानं खासकर न्यूरोसाइंसेज के तथ्य जो कई शोधों पर आधारित है वे सब आपकी बातों का खंडन करते है . क्रिएटिविटी का विभिन्न मनोविकारों से तो संबंध हो सकता है लेकिन आत्महत्याओं से नहीं . और रचनात्मक स्त्रियों के बारे में तो वैज्ञानिक तथ्य और भी उलट है . रचनात्मकता और आत्महत्या का सीधा संबंध न्यूरोसाइंसेस में कहीं नहीं मिलता है बल्कि परिस्तिथियों का आत्महत्या से संबंध होता है, वह किसी में भी हो सकता है - स्त्री या पुरुष कोई भी . जोसफ लेडौक्स जैसे न्यूरोसाइंटिस्ट ने मस्तिष्क के आत्महत्या कारक अंग पर किये अपने प्रयोगों में यह सिद्ध किया है . कभी उनकी Emotional Brain या Syanptic Self पढ़िए.

सुजाता said...

ओमप्रकाश जी,
सोश्यॉलजी की दृष्टि से इस पर रिसर्च हो भी रही हैं ...जल्द ही प्रयास करूंगी कि उनमें से कुछ यहाँ लगा सकूँ

सुजाता said...

अनिल जनविजय जी ,
अलग अलग तरह से मरीना का नाम लिखा मिल जाता है। आपके कहे को सही मानकर मैं सुधार कर रही हूँ :)

Unknown said...

प्रिय सुजाता जी , 1st feb को भी कुछ ऐसा ही पढ़ा था,फिर आज भी,और फिर उससे पहले भी- शोध के रूपमे यह विषय चीज़ों के analysis के रूप में तो ठीक माना जा सकता है, पर आपके जन्मदिन के दिन इस आलेख को पढकर इसपे विचार लिखने की इच्छा बलवती हो गयी थी और लिखना तय हो गया था, संभवतः इसके पीछे मेरे subconscious में कोई और कारण भी रहा हो ,पेशागत व्यस्तता आड़े आ रही थी, आइये इसपे अपना मंतव्य रखूँ –According to "world healh organization" definition of health is -“Health is a state of complete physical, mental & social well-being , not merely the absence of disease or infirmity to lead a socially & economically productive life . इसका बिलकुल सपाट मतलब है –हेल्थ के तीनों डायमेंशन में एक “मेंटल डायमेंशन” का सिर्फ एक aspect है –“दिमाग की रचनात्मकता और सोच की तीक्ष्ण और गहन स्वतंत्रता” । इनका तारतम्य जब दुसरे डायमेंशन social well-being से नहीं हो पता है या फिर जब व्यक्ति अपनी रचनात्मकता की परिपूर्णता से दुसरे चीज़ों को compensate करने की असफल कोशिश करता है या ऐसी अपेक्षा करता है तो एक imbalance पैदा होता है, जिसके अनुसार व्यक्ति को response करना होता है ,इसे tackle करके या सिचुएशन को स्वीकार करके। पर तीक्ष्ण सृजनशीलता वाले कुछ लोगों में ये क्षोभ बलवती हो जाती है कि - जिंदगी के दुसरे aspects की कमी को मेरा ये स्ट्रोंग मेंटल aspect क्यों fill-up नहीं कर पाता । और वो दुसरे aspect को मजबूत करने की जरुरत को नकारते है (यधपि उनके लिए ये बहुत मुश्किल काम नहीं होता) पर वो ये स्वीकार नहीं कर पाते कि जिंदगी को जीने हेतु कुछ दुसरे काम भी करने होते है जिनमे आपकी सृजनशीलता न हो ...मसलन अर्थोपाजन या socialization ।मसलन हर सुबह ब्रश करना या वाश रूम जाना हमें पसंद नहीं भी हो सकता है पर हमें करना होता है इसका मतलब ये कतई नहीं है की जीवन में तीनों aspects का बराबर होना जरुरी है पर किसी आस्पेक्ट का अधिकाधिक लोप जीवन से रस को अलग कर सकता है और जीवन से क्षोभ पैदा कर सकता है। अपनी रूचि का काम अधिकाधिक करना संतोष के साथ ही साथ जीवन रस को प्रचुर बनाये रखने में सहायक होता है पर जीवन की निरंतरता दुसरे चीजों पर भी निर्भर करती है! । कुछ लोगों की बौद्धिक तीक्ष्णता वैसी दुनिया को पसंद करने लगती है जो उनके हिसाब से उनकी सोच के एक सबल पार्ट से ही सिर्फ बना हो और वो सिर्फ उस काम में खो सके जो वो शिद्दत से चाहते है । जीवन के संगीत में धुनों के साथ तारतम्यता का भी महत्व होता है ,किसी खास धुन से हमारी बेपनाह मोहब्बत भी सिर्फ उसी धुन से संगीत को कम्पलीट नहीं कर सकती पर शायद कुछ लोग इसे समझ नहीं पाते और दूसरा रास्ता अख्तियार कर लेते है , इसका मतलब ये नहीं है कि ये सब चीज़ों से समझौता करने के सन्दर्भ में है बल्कि ये जीवन को समझने के सन्दर्भ में है, आप solitude को भी एन्जॉय कर सकते है , company को भी ,आप पुरुषवाद को ध्वस्त कर सकती है जीवन संगीत के साथ ,खुद को बिना प्रतिरोध की चिमनी में जलाये । आप सारी उम्र पहाड़ काट कर रास्ता बना सकते है ,पर इस हौसले के लिए मांझी की तरह दिल में मोहब्बत चाहिए ,विषाद नहीं ,फिर तो ये बहुत छोटी सी बात है की हमें वो करने का समय नहीं मिल पाया जो हम करना चाहते है सो हमने समय के स्रोत जीवन को ही ख़त्म कर डाला – पता नहीं मैं जो कहना चाहता था उसे उसी रूप में शब्द मिल पाये या नहीं ? पर शायद संदेश साफ़ है....शायद पहुँच पाये ..

सुजाता said...

आपका सन्देश समझने की मैंने कोशिश की गौरव , शुक्रिया इस तरह विचार करने और कमेंट करने के लिए। यह केवल एक बड़े विषय का हिस्सा भर है। विस्तार से भी लिखूंगी अवसर मिलते ही।

सुजाता said...

आपका सन्देश समझने की मैंने कोशिश की गौरव , शुक्रिया इस तरह विचार करने और कमेंट करने के लिए। यह केवल एक बड़े विषय का हिस्सा भर है। विस्तार से भी लिखूंगी अवसर मिलते ही।

सुजाता said...
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jogeshwarisadhir said...

han, kabhi kabhi mn kamjor ho jata h, kya kre, mn ka

Asha Joglekar said...

डेस्परेशन, जब लगने लगे कि आप बंद हैं दो दीवारों के बीच बस एक ही रास्ता है निजात का।

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