Thursday, April 14, 2016

हमें सिर्फ भारतीय सम्विधान से उम्मीद है

डॉ अम्बेडकर ने पितृसत्ता को स्त्रियों की दासता के कारण के रूप में पह्चाना। मनुस्मृति को उद्धृत करते हुए समाज में स्त्रियों की हीन दशा पर विचार किया और स्त्री-अधिकारों के हिमायत की। वे जान रहे थे कि स्त्रियाँ अपनी अस्मिता खो चुकी हैं।अपने एक लेख 'नारी और प्रतिक्रांति' में वे मनु स्मृति से स्त्री-द्वेष सम्बंधी कई उद्धरण देते हुए सवाल उठाते हैं कि 'मनु ने स्त्रियों को पदावनत क्यों किया?'

मनु के विचारों पर चलने वाले हिंदू समाज में स्त्रियों की दशा पर 1870 के दशक में भारतीय समाज में विस्फोट की तरह आईं पं. रमाबाई की पुस्तक 'हिंदू स्त्री का जीवन' में मनु के स्त्री-द्वेषी विचारों को उद्धृत करते हुए समझाया गया है कि  'धर्म' भारतीय स्त्री की मुक्ति की राह की सबसे पहली बाधा है। वे लिखती हैं "जो व्यक्ति मूल संस्कृत  साहित्य कोकटःइन परिश्रमव निष्पक्षता से पढ्ते हैं,यह  पह्चानने में कभी धोखा नहीं  खा सकते कि आचार संहिता निर्माता मनु उन कई  सौ लोगों में से एक हैं, जिसने दुनिया की नज़रों में  स्त्रियों को घृणास्पद जीव बनाने में अपना सारा ज़ोर लगा दिया। गृहकार्यमें तथा सगोत्रियता के कामों में लगा करयह सोचा गया कि स्त्रियों को भटकने से बचाने का यही एकमात्र उपाय है।...वह राष्ट्र केए प्यारी माता, समर्पित पत्नी,सहृदयी बहन तथा स्नेही पुत्री स्वतंत्रता के लिए कभी उपयुक्त नहीं होती'अपने आप में असत्य की भाँति अपवित्र होती है' कभी विश्वास की पात्र नहीं होती तथा कभी भी महत्वपूर्ण मुद्दे इन्हें नहीं सौंपे जाते।"

मनु के इस मिसोजिनिस्ट रवैये को मानो हिंदू समाज ने आत्मसात कर लिया।अम्बेडकर लिखते हैं कि मनु के ये नियम अकाट्य हैं और इनके ज़रिए उसने स्त्रियों को दास के स्तर पर लाकर पटक दिया।


मनु कहता है कि स्त्रियाँ वेद विहित दैनिक अग्निहोत्र नहीं करेंगी -
करेंगी तो वे नरक में जाएंगी ...

फेमिनिस्ट कहती हैं जो पहले ही नरक में है वह और किस नरक में जाएगा !! जिसके लिए न सड़क सुरक्षित है न घर।


धर्म से भी विद्रोह किया जा सकता है यह  अम्बेडकर ने कर दिखाया। मनुस्मृति को जलाया।विरोध सहा। मंदिरों में प्रवेश की मुहिम को लेकर हिंसा भी  झेली। अपने पद और और क्षमता के आधार पर उन्होंने स्त्रियों की स्थिति   को  बेहतर बनाने और  उन्हे प्रगति के पथ पर आगे बढाने के लिए भरसक प्रयास किए। स्त्रियों की शिक्षा से लेकर महिला  श्रमिकों को बराबरी के अधिकारों की हिमायत वे करते रहे।स्त्री शिक्षा, स्वास्थ्य , प्रजनन सभी पर विचार करते हुए  स्त्री अधिकारों की हिमायत उन्होंने की। स्त्री का दमन उसकी जाति और वर्ग से भी सम्बंध रखता है यह उन्होने पह्चाना।  एक तरह से डॉ अम्बेडकर ने भारतीय स्त्रीवाद के लिए एक व्यापक एजेंडा  तय किया और साथ ही वर्ग, जाति और जेंडर के मुद्दों पर एक साथ विचार करते हुए भारतीय चिंतकों में वे सबसे आगे निकल गए।

यह अतिशयोक्ति न होगी कि स्त्रियों को  किसी जगह अपने लिए उम्मीद दिखाई देती है तो वह सम्विधान ही है  जो उन्हे सम्मान , बराबरी और गरिमा मय जीवन देने का वादा करता है। वक़्त और ज़रूरत के हिसाब से जिसमें संशोधन किए जा सकने सम्भव हैं।
हम आज 14 अप्रैल के दिन उन्हें नमन करते हैं! 

2 comments:

Asha Joglekar said...

अंबेडकर जी ने उन सब की बात रखी जो सब उपेक्षित थे अवहेलित थेचाहे वे दलित हों या स्त्रियां। उनके अनेक आभारऔर उन्हें बार बार नमन।

Anupam Dixit said...

अंबेडकर जी ने सिर्फ अंग्रेजों कि लाज रखी और सबको भूल गए। उनकी शिक्षा और जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले बड़ौदा राजा, उनके शिक्षक जिनके "सवर्ण" उपनाम "अंबेडकर" को उन्होंने अपनाया, उनकी पत्नी जो सवर्ण थीं। पर उन्हें अंग्रेजों के साथ १९१९ के अधिनियम पर राजनीति में कैरियर बनाना था इसलिए सवर्णों का विरोध जरूरी था, गांधी से असहमति जरूरी थी, भारत को तोड़ने वाला अधिनियम जरूरी था। जातिवाद के खात्मे के लिए श्री अंबेडकर यदि इतने ही आतुर थे तो उसी जातिवाद को खुद ने अपनी राजनीति चमकाने का जरिया बनाया और आरक्षण जैसा एक ऐसा सामाजिक हथियार तय किया जो भारतीय समाज से जाति कि बुराइयों को दूर करने कि बजाए उसे और दृढ़ता से स्थापित करता है और असल में आरक्षण ने जाति को ही दलितों की एक मात्र पहचान बना दिया है। शूद्रों की स्थिति में आरक्षण के ७० वर्षों में उतना सुधार नहीं हुआ जितना आर्थिक उदारीकरण के पिछले २० वर्षों में। अंबेडकर जी खुद एक अर्थशास्त्री थे लेकिन बजाए इसके कि वे शूद्रों को अपनी आर्थिक दशा सुधारने के लिए कोई बेहतर मंत्र दे पाते उन्होंने दलितों को एक राजनीतिक झुनझुना पकड़ा दिया है। वे संविधान के निर्माता भी नहीं थे जैसा कि प्रचलित है। हमारा संविधान मुख्यतः भारत अधिनितम १९३५ से लगभग ८०% तक ले लिया गया था। अंबेडकर मात्र प्रारूप समिति के ही अध्यक्ष थे । जिसका काम था संविधान के टैंपलेट को दुरुस्त रखना। अब लेखक तो ब्रिटीशर्स ही थे । बाकी काम अनेक लोगों ने किया। अंबेडकर जी तो बस यह देखते थे कि जो तैयार नियम कानून है वे सही प्रारूप में सही जगह फिट होजाएँ। वे संविधान के DTP ऑपरेटर ही थे

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