Sunday, December 30, 2018

इनस्टेंट तीन तलाक़ !


यह तस्वीर इण्डियाटुडे डॉट इन से साभार


शाज़िया आले अहमद


पिछले कुछ समय से तीन तलाक़ का मुद्दा इस देश में गरमाया रहा है। मज़ेदार यह है कि मौलानाओं को सब कहना होता है, औरतों की बात सुनी जाए इसे ज़रूरी समझा ही नहीं जाता। टीवी डिबेट में ज़्यादातर मौलाना तलाक़ ए बिद्अत को बुरा मानते और इस बात की पैरवी करते हैं कि इंस्टेंट तीन तलाक़ नहीं दिया जाना चाहिये जबकि मुस्लिम मआशरे की बात की जाए तो ज़्यादातर मुसलमान क़ुरआन के मुताबिक़ तलाक़ के बारे में जानते ही नहीं थे । यह अनजाने में नहीं हुआ इसमें एक सोची समझी साज़िश थी औरतों को कण्ट्रोल करने की । क़ुरआन के मुताबिक़ तलाक़ के लिये मुस्लिम मर्दों और औरतों को जागरूक ही नहीं किया गया ।  संघियों और मुसंघियों केी रस्साकशी के चलते मुसलमानों को काफ़ी हद तक क़ुरआन के मुताबिक़ तलाक़ का पता चला । 
बचपन से देख रही हूँ रमजान शुरू होने से पहले सहरी, इफ़्तार के वक़्त की जानकारी के लिये मस्जिदों और दीगर जगहों से कैलेंडर बंटना शुरू हो जाते थे जिनमें रमज़ान से मुताल्लिक़ कुछ दुआएँ भी लिखी होती हैं ।ये कैलेंडर लग़भग हर घर में मिलेंगे । इसी तरह शबे बारात और बकरीद के मुताल्लिक़ भी पर्चे बांटे जाते हैं जिनमें इबादत का तरीक़ा और क़ुरबानी का तरीक़ा गोश्त की तक़सीम का ज़िक्र होता है । लेकिन आज तक क़ुरआन के मुताबिक़ तलाक़ की जानकारी के लिये किसी मस्जिद, किसी उलेमा, किसी जलसे से, किसी जमात से कोई पहल नहीं हुयी ।
पीस टीवी पर ज़ाकिर नाइक को सुनकर मैंने भी पहली बार क़ुरआन खोलकर देखा उनकी बताई आयतों को देखा जिनमें तलाक़ का ज़िक्र था जो कि व्यवहारिक और बेहतरीन तरीक़ा था, ये 2004 की बात है शायद । इससे पहले मेरी एक कज़िन इंस्टेंट तीन तलाक़ की भेंट चढ़ चुकी थी जो उसके शौहर ने गुस्से और नशे की हालत में दी थी बाद में उसे अपनी ग़लती पर पछतावा भी हुआ इस तरह दो ज़िंदगियाँ तबाह हो गयीं । 

ऐसे हज़ारों किस्से हैं । ये एक सबसे करीबी था इसलिये मेरी बेचैनी, तकलीफ़ भी सबसे ज़्यादा थी ।
दरवाज़े दरवाज़े घुमने वाली जमातों ने भी कभी मुसलमानों को औरतों के हक़ों को लेकर जागरूक नहीं किया नाही तलाक़ का सही तरीक़ा बताया । अक्सर लोग कहते हैं कि गुमराह लोगों तक इस्लाम पहुँचाने में इन जमातों की अहम रोल है जो काफ़ी हद तक सच भी है ।लेकिन इन अल्लाह के बन्दों को भी औरतों के हुक़ूक़ से कोई सरोकार नहीं रहा । जब मुसलमान औरतों की हालत पर गैर मुस्लिम तंज़ कसते है उस वक़्त ये रटा रटाया जुमला "इस्लाम औरतों को सबसे ज़्यादा हुक़ूक़ देता है ।"  का नारा बुलन्द करते हैं ये जुमला इतना ही झूठा और खोखला है जितना बीजेपी का नारा "महिला के सम्मान में बीजेपी मैदान में " है ।

अगर वक़्त रहते उम्मते मुस्लिमा के अलमबरदार अपनी झूठी अना को किनारे रखकर इंस्टेंट तीन तलाक़ को ख़ारिज कर क़ुरआन के मुताबिक़ तलाक़ को मुस्लिम मआशरे में राइज़ करते तो आज ज़लील ओ ख़्वार न होना पड़ता ।इंस्टेंट तीन तलाक़ मुस्लिम औरतों पर थोपा जाने वाला सबसे बड़ा ज़ुल्म था जिसकी वजह से कितनी औरतें ज़िंदा लाशों में तब्दील हो गयीं । मज़े और हैरत की बात ये है मुर्दा लाशों पर खड़े लोगों ने ज़िंदा लाशों पर खड़े लोगों को इंसाफ और क़ुरआन सिखा दिया ।
अगर पूर्वग्रह को छोड़कर, लोकसभा में स्मृति ईरानी के भाषण की बात की जाए तो जिस बिल की वक़ालत की उम्मीद तथाकथित उलेमा सी की जानी चाहिये थी वो एक काफ़िर ( बक़ौल तथाकथित उलेमा) ने की, इससे ज़्यादा शर्मिंदगी की बात उनके लिए क्या होगी ।

और साफ़तौर पर यह जीत किसी राजनीतिक पार्टी की नहीं उन प्रगतिशील मुस्लिम औरतों के संघर्ष की जीत है जिन्होंने मौलवियों के डर के आगे घुटने नहीं टेके। 

शाज़िया आले अहमद दिल्ली की निवासी हैं जो फेसबुक के ज़रिए सामाजिक मुद्दों पर खरी- खरी लिखती रही हैं। मन और पेशे से वे एक शिक्षक हैं। स्थायी पतालखनऊ।

3 comments:

Fareed Rizvi said...

रिवायतों और आलिमों और मुस्लिम कौम के अहले इल्म हज़रात की कहिली और सुस्ती का नतीजा है तीन तलाक़ पर सरकार का हस्तक्षेप ।
बहुत तरकपूर्ण लेख । मुबारकबाद

सुजाता said...

बहुत शुक्रिया फरीद रिज़वी जी

Archana Arora said...

बहुत अच्छा लेख,बधाई शाज़िया

अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री को सिर्फ बाहर ही नहीं अपने भीतर भी लड़ना पड़ता है- अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री-विमर्श के तमाम सवालों को समेटने की कोशिश में लगे अनुप्रिया के रेखांकन इन दिनों सबसे विशिष्ट हैं। अपने कहन और असर में वे कई तरह से ...