Friday, January 3, 2020

जैसे अब भली लग रही हैं संघर्षरतऔरतें, हमेशा अच्छी क्यों नहीं लगतीं आपको?






जो औरतें लड़कियां छात्राएं दादियां आज प्रोटेस्ट करती हुई अच्छी लग रही हैं सड़क पर आंदोलन करती हुई,प्राइम टाइम में बोलती हुई वो हमेशा से हक़ बात बोलती हुई क्यों अच्छी नहीं लगती,वो स्कूल कॉलेज युनिवर्सिटी की शिक्षा लेने और नौकरी ख़ुदमुख़्तारी के लिए सड़क़ पर चलती हुई अच्छी क्यों नहीं लगती इसलिए कि तब आपका मतलब सिद्ध नहीं होता? 











- महज़बीं

कल प्राइम टाइम में अस्सी साल और उससे ऊपर की भी उम्र की तीन शाहीनबाग़ की बुज़ुर्ग औरतों को जब बोलते देखा तो इतना प्यार आया उनपर कि ज़ी चाहा उनका मुँह चूम लूं। कितने ही लोग पुरे हिन्दुस्तान में उनकी हिम्मत की दाद दे रहे हैं।दो हफ्तों से ऊपर हुए दिल्ली की शाहीनबाग़ की औरतें NRC, CAA, NPR के विरोध में प्रोटेस्ट कर रही हैं, उन्होंने किसी भी प्रकार की हिंसा का प्रयोग नहीं किया बड़े शांतिपूर्ण ढंग से उनका प्रोटेस्ट चल रहा है, इतनी सर्दी में भी वो बैठी रहती हैं। रवीश कुमार प्राइम टाइम में जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय की उन छात्रों को लाए थे बोलने के लिए जिन्हें पुलिस ने यूनिवर्सिटी में घुसकर लाठी से मारा था,उन लड़कियों ने पुलिस की बर्बरता के बाद भी हिम्मत से निडर होकर प्राइम टाइम में सबको सच बताया, ऐसे ही अब ये तीन शाहीनबाग़ की बुज़ुर्ग़ महिलाएं भी आईं और आकर अपनी बात रखी सबके समक्ष।



इमाम शासक के समर्थन में जबकि बुर्क़ानशीन औरतें हुकूमत के ख़िलाफ़ सड़क पर

पूरे हिन्दुस्तान में लोग जगह-जगह बिल को वापिस लेने के लिए प्रोटेस्ट कर रहे हैं, सभी हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई दलित और छात्र सर्दी में भी लगातार प्रोटेस्ट कर रहे हैं।  प्रोटेस्ट करने वाले लोगों और छात्रों में महिलाएं और लड़कियां बहुत बड़ी संख्या में हैं, यहां तक की जो बाहर कम जाती हैं बुर्ख़ा लगाकर निकलती हैं बाहर, वो महिलाएं भी प्रोटेस्ट करने जा रही हैं, दूध पीते बच्चों की माँएँ भी जा रही हैं, बनारस की चम्पक की माँ भी प्रोटेस्ट कर रही थी उस दूध पीती बच्ची की माँ इतने दिनों से पुलिस हिरासत में थी। मुसलमानों का जमीयतुल हिंद संगठन भी प्रोटेस्ट कर रहा है वो शिक्षित मौलानाओं पत्रकारों का एक संगठन है जो हमेशा मुसलमानों के साथ हुए ज़ुल्म के विरोध में आवाज़ उठाता है उनके इंसाफ़ के लिए लड़ता है।बाक़ी मौलाना लोग जो क़ौम को हिदायत करते रहते हैं नसीहत देते रहते हैं, लंबी चौड़ी तकरीर करते हैं, उनमें से आधे तो चुप हैं डर से या अपनी ग़रज़ से। निजामुद्दीन मर्क़ज़ की तब्लीग़ी जमात वालों ने पूरे हिन्दुस्तान में अभी तक कहीं कोई प्रोटेस्ट नहीं किया, वो अपनी ही तब्लीग़ की दुनिया में कोरमा बिरयानी खाने, तीन दिन, दस दिन, चालीस दिन, चार महीने के चिल्ले लगाने में मशरूफ़ हैं। नौजवान लड़कों का पढ़े लिखे  लड़कों का डॉक्टर इंजीनियर प्रोफेसर का भी इंमोशनली तकरीर ब्यान करके ब्रेनवॉश कर रखा है, उन्हें तब्लीग़ जमात के सिवा दूसरी किसी बातों से सरोकार ही नहीं, इन लोगों की नागरिकता क्या ये मर्क़ज़ की कमेटी सिद्ध करेगी जो सिर्फ़ जमात में जाना ही अपनी जिम्मेदारी समझते हैं ? दिल्ली की शाही जामा मस्जिद के इमाम भी बिल के प्रशासन के समर्थन में बोल रहे हैं, कहाँ गया जामामस्जिद के इमाम का ज़िहाद ? का मतलब ज़ालिम बादशाह (शासक, हकूमत) के सामने हक़ बात बोलना है, क्या दिल्ली की जामा मस्जिद के इमाम शासक की हां में हां मिलाकर उनके समर्थन में बोलकर जिहाद कर रहे हैं ? ज़िहाद ज़िहाद चिल्लाने वाले मौलानाओं को भी ज़िहाद का मतलब नहीं पता, और ये मौलाना अपने को समझते हैं सबसे अक़लमंद ज़हीन, मख़लूक़। कुछ मौलाना प्रोटेस्ट कर रहे हैं तो उन्हें ठीक से प्रोटेस्ट भी नहीं करना आता,चिल्लाते हैं, या नाराए तकबीर लगाते हैं या जिहाद चिल्लाते हैं।


नाराए तकबीर लगाने की या जिहाद चिल्लाने की ज़रूरत क्या है ?

यह समय धार्मिक प्रतीक बने हुए शब्दों को बोलने का नहीं है, सरकार तो चाहती ही यही है कि मौलाना लोग जोश में आकर जिहाद का नारा लगाएँ और किसी को ज़िहाद नाराए तकबीर का अर्थ पता नहीं है, पिछले बीस पच्चीस सालों में अमेरिका और भारत की मीडिया ने ज़िहाद नाराए तकबीर को आतंकवाद का मुस्लिम कट्टरपंथी का प्रतीक बना दिया है, यानी ज़िहाद और नाराए तकबीर का अर्थ है मारना काटना,जब्कि ये बिल्कुल भी अर्थ नहीं है।और ये कूढ़मग़ज़ मौलाना यही शब्द बार-बार अपनी तकरीर में इस्तेमाल करते हैं ज़िहाद नाराए तकबीर, इन्हें छोड़ देना चाहिए इन शब्दों को बोलना जिन्हें आतंकवाद और मारकाट का प्रतीक बना दिया गया है।सीधीसादी आमबोलचाल की भाषा हिन्दी उर्दू में अपनी बात कहनी चाहिए जो सबको समझ आती है,और जिससे दूसरे लोग भड़कते भी नहीं हैं, नाराए तकबीर ज़िहाद शब्द का अर्थ किसी को नहीं पता, सबको सुनते ही यही भाव आता है मन में कि अच्छा फलां जगह मुसलमान ज़िहाद नाराए तकबीर का नारा लगा रहे हैं हमें मारने आ रहे हैं, और यही डर दिखाकर सियासी पार्टी ऐंटी मुस्लिम वोट बटोरती हैं। मौलाना लोग समझते नहीं इस सियासत को और हर जगह प्रोटेस्ट में ज़िहाद नाराए तकबीर चिल्लाने लगते हैं इसका सीधा फायदा सियासी पार्टियों को ऐंटी मुस्लिम वोट लेने में चला जाता है।


तालीम पर कभी ध्यान नहीं दिया गया , क्यों ? 

जय श्रीराम शब्द को भी सियासी पार्टियों ने दशहत का प्रतीक बना दिया है जबकि राम करुणा और मर्यादा के प्रतीक हैं। कबीर के राम भी सीधा-सरल है। अपने राम का नाम लेना कोई गुनाह नहीं लेकिन, मॉबलिचिंग करनेवाले लोगों ने राम के नाम को डर और दहशत का प्रतीक बना दिया। अभी चाहिए कि हिन्दू-मुस्लिम लोग सिर्फ़ सादा ज़बान में प्रोटेस्ट करें ज़िहाद नाराए तकबीर जय श्रीराम न बोले,क्योंकि इसका फायदा सियासी लोग उठाते हैं एकदूसरे के दिलों में डर बैठाकर और जन आंदोलन कमज़ोर पड़ जाता है।

मौलानाओं ने तब्लीग़ी जमात वालों ने क़ौम को हमेशा कुंए का मेंढक बना रखा है, हमेशा से स्कूल कॉलेज यूनिवर्सिटी की तालीम का विरोध किया, रोज़ी रोटी के लिए कुछ हद तक मर्दों लड़कों के लिए तो ज़रूरी समझा भी मगर लड़कियों की स्कूल कॉलेज यूनिवर्सिटी की शिक्षा का विरोध ही किया, जिन्होंने इनकी बातें मानी घाटे में रहे, जहालत में ही रहे,फटेहाल ही रहे,जो पहले से ही कारोबारी या ज़मीनदार हैं उनको छोड़कर बाक़ी सब बग़ैर तालीम के फटेहाल ही हैं, वही ग़ुर्बत से निज़ात पा सके जो तालीम की तरफ़ बढ़े,जिन्होंने अपने बेटे-बेटी दोनों पढ़ाए बग़ैर भेदभाव के।

कुछ प्रगतिशील मर्दों को छोड़कर बाक़ी सभी दक़ियानूसी मध्यकालीन सोच के मर्दों ने हमेशा औरत को अपनी ज़रुरियात पूरी करने का सामान समझा,उन्हें घर में क़ैद रखना चाहा,नौकरी ख़ुदमुख़्तारी से दूर,तालीम से भी दूर,अभी शाहीनबाग़ वाली लड़कियां महिलाएं तो सबको अच्छी लग रही हैं,कॉलेज युनिवर्सिटी की भी,क्योंकि इनके और अपने हक़ के लिए लड़ रही हैं बोल रही हैं।

लड़ती हुई औरतें- लड़कियाँ शाहीनबाग़ की या कॉलेज-यूनिवर्सिटी की अच्छी तो लग रही हैं लेकिन ....

यही लड़कियां महिलाएं अगर अपनी शिक्षा अपने रोजगार अपनी ख़ुदमुख़्तारी अपने अस्तित्व अपने फैसले लेने के अधिकार,अपना हमसफ़र ख़ुद चुनने के अधिकार सम्पत्ति के अधिकार के लिए लड़ने बोलने लग जाएं तो सबको खटकने लग जाएंगी। भारत की आज़ादी के आंदोलनों में भी शिक्षित अशिक्षित ग़रीब अमीर सभी महिलाओं ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था,और उस वक़्त यही ज़रूरत भी थी कि हिन्दू ,मुसलमान, सिख ,ईसाई, मर्द, औरत सब एक होकर अंग्रेजी हुकूमत का विरोध करें। मगर आज़ादी के बाद क्या हुआ? औरतों को आंदोलन में इस्तेमाल करके आज़ादी तो हासिल कर ली फिर आज़ादी के बाद औरतों को दुबारा से घर की चार दीवारों में क़ैद कर दिया, तालीम से दूर कर दिया, कुछ प्रगतिशील लोगों को छोड़कर बाक़ी सब ने औरतों के साथ विश्वासघात किया दग़ा की, ग़ैरबरबरी की। आज फिर जब सबको एकजुट होकर के विरोध करने की ज़रूरत पड़ी है तो महिलाओं का प्रोटेस्ट करना, बोलना सबको अच्छा लग रहा है। प्राइम टाइम में आई जामिया की लड़कियां और शाहीनबाग़ की दादियां सबको अच्छी लग रही हैं, उन मौलानाओं को भी जो लड़कियों के स्कूल- कॉलेज- यूनिवर्सिटी जाने को बेपर्दगी, बेहयाई समझते हैं।

सवाल यह है कि अगर कानून वापस हुआ, विरोध सफल हो गया तो क्या उसके बाद फिर ये महिलाएं, ये लड़कियां ऐसी ही समाज को स्वीकार होंगी अपने मुद्दों पर भी बोलती या वहीं चार दीवारों में अच्छी लगेंगी कम बोलती हुई?  महिलाएं मर्दों की इन चालाकियों को समझ नहीं रही,कुछ समझती हैं, मगर आज भी लाखों महिलाएं गाय हैं सीधी शरीफ़ जो मर्दों की ऐसी ख़ुदग़र्ज़ी से भरी यूज़ एन थ्रो वाली सियासत को नहीं समझतीं,बहुत सी तो पढ़ लिखकर भी नहीं समझ पाती,क्योंकि वो सिर्फ़ पढ़कर पैसा कमाने की मशीन बनती हैं, समझ नहीं खुलती सबकी पढ़कर भी,फिर अनपढ़ औरतें कैसे इतनी गहरी बातों को समझें,बहुत सी अनपढ़ औरतें या कम पढ़ी लिखी औरतें आज भी अपने फैसले ख़ुद नहीं करती,उनके घर के मर्द जिस तरह खुश हो सकते हैं वो अपने आप को वैसे ही ढाल कर रहती हैं, अपने हक़ को भी नहीं समझ पाती....पढ़ लिखकर समझ ख़ुलती है स्कूल जाकर कॉलेज युनिवर्सिटी जाकर,तीसरी आँख खुलती है, सही ग़लत की पहचान होती है, अपने अधिकार के लिए बोलना आता है, अभिव्यक्ति करनी आती है। इसीलिए लड़कियों को स्कूल कॉलेज यूनिवर्सिटी नहीं जाने दिया जाता कि वो देखने लगती हैं, उनकी तीसरी आँख खुल जाती है, वो भी सवाल करने लगती हैं भाई से पिता से पति से शासक से,वो भी सिस्टम को समझने लगती हैं, अपने वजूद को अपने हक़ूक़ को समझने लगती हैं,परिवार के सदस्य ज़ुल्म ज़ादती हक़तल्फ़ी करें तो अदालत का दरवाज़ा खटखटाने लगती हैं, शासक ज़ुल्म करे तो नागरिक की भूमिका में आकर जन आंदोलन में जाती हैं।

कितने शातिर हैं मर्द और धर्म के ठेकेदार जो औरतों को स्कूल -कॉलेज -युनिवर्सिटी नहीं जाने देते,उन्हें यह बात बर्दाश्त ही नहीं कि औरतें उनके सामने या उनके बगल में बराबर वकार रखकर खड़ी हों और सवाल पूछती हों। कब तक क़ैद रखोगे कब तक इल्म से महरूम रखोगे।देखो आज वही शय जिसे हमेशा कमज़ोर कमअक़ल समझा गया हुकूमत के सामने खड़ी होकर सवाल कर रही हैं सबके हक़ के लिए निडर होकर बोल रही हैं, शर्म आई होगी मौलानाओं को,या अब भी लड़कियों के स्कूल कॉलेज यूनिवर्सिटी जाने को इल्म हासिल करने को बेपर्दगी बद्दीनी बेहयाई करार देते रहेंगे।

हमेशा औरतों को अपने से कमतर समझा मर्द ज़ात ने,कभी अपने बराबर की मख़लूक़ नहीं समझा, जो इसलाम के ठेकेदार हैं उन्होंने भी हमेशा औरतों को दूसरे दर्ज़े की मख़लूक़ समझा,कभी अपने बराबर नहीं समझा,जबकि इस्लाम की बुनयाद इस बात पर है कि अल्ला की तमाम मख़लूक़ में सबसे अफ़ज़ल सबसे ख़ूबसूरत सबसे ज़हनी मख़लूक़ इंसान है, इंसान है यानी के मर्द औरत दोनों हैं सिर्फ़ मर्द नहीं, और सब इंसान बराबर का दर्ज़ा रखते हैं, कोई छोटा बड़ा नहीं है, जात बिरादरी क्षेत्र मर्द औरत किसी किस्म का भेदभाव ग़ैर बराबरी नहीं है,अमीर,ग़रीब, काले, गोरे, मर्द, औरत सब बराबर हैं।

सबको अपनी मर्ज़ी से अपने शरीक़ेहयात हमसफ़र को पसंद ना पसंद करने का हक़ है, सबको तालीम हासिल करने का हक़ है, मर्द औरत का जोड़ा  मीया-बीव की शक़्ल में अल्लाह ने इसलिए बनाया ताकि वो एकदूसरे के साथ हमराज़ बनकर रहें एकदूसरे के साथ साथी दोस्त बनकर रहे, न कि इसलिए की एक तो दूसरे पर हुकमरानी करे और दूसरा ग़ुलाम बनकर हमेशा उसका हुक्म बजा लाने में जी हुजूरी में उसकी माहतहती में रहे।

इसलाम की बुनियादी बातों को सिरतुन नबी को छोड़कर मर्दों ने इसलाम की बुनयादी बातों में अपनी पुरुषवादी पितृसत्तात्मक सोच को घुसेड़ दिया, मर्द औरत की ग़ैरबरबरी को डाल दिया,छोटी जात बड़ी जात बिरादरीवाद क्षेत्रवाद को शामिल कर लिया,और लादना शुरु कर दिया।

हुज़ूर की पहली बीवी जो उनसे पंद्रह साल बड़ी थी उम्र में, कौन करता है आज अपनी हमउम्र या उम्र में बड़ी लड़की से शादी ? सब अपनी उम्र से पाँच दस साल छोटी ही चाहते हैं, कहीं तो बीस पच्चीस साल छोटी भी। हूज़ूर की पहली बीवी बेवा (विधवा)थीं जब उन्होंने उनसे निकाह किया आज कौन करता है बेवा से शादी ? हूज़ूर की पहली बीवी एक कारोबारी महिला थीं,आज कौन अपनी बीवी को कारोबार करने देता है ख़ुदमुख़्तार बनने देता है ? हूज़ूर ने अपनी बेटी फ़ातिमा का निकाह उनकी पसंद-नापसंद पूछकर किया था,आज कौन अपनी बेटियों से शादी के वक़्त उसकी पसंद-नापसंद पूछता है ? लव मैरिज तो बहुत दूर की बात है, अगर कोई पसंद-नापसंद के बारे में पूछता भी है तो सिर्फ़ फॉरमैलिटी होती है उसमें, दबाव यही होता है कि उनके मन मुताबिक ज्वाब दे बेटी। शिक्षा बुनयादी ज़रुरियात में से एक ज़रूरत है कितने ही लोग अपनी बेटियों को आज भी शिक्षा से वंचित रख रहे हैं, कुछ स्कूल भेजते हैं फिर कॉलेज युनिवर्सिटी नहीं भेजते,प्रोफेशनल शिक्षा नहीं देते जिससे की महिलाओं को रोजगार मिल सके।समझदारी अच्छे बुरे सही ग़लत की पहचान जिन  कामों को करने से आती है ख़ुदमुख़्तारी जिससे आती है उस चीज़ से काम से तो दूर रखते हैं औरतों को।



वो हमेशा हक़ बात बोलती हुई अच्छी क्यों नहीं लगती आपको ?


आज वक़्त की  ज़रूरत है सबके एक होकर प्रोटेस्ट करने की,हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई मर्द औरत सबको एक साथ सड़क पर आकर जन आंदोलन करने की बिल का विरोध करने की....और करना भी चाहिए सबको एक साथ मिलकर विरोध। मैं पूछती हूँ ये एकता ये इत्तिहाद मुसीबत में ही क्यों याद आती है जब चारों तरफ़ के दरवाज़े बंद हो जाते हैं, तब कहाँ जाती है ये एकता ये इत्तिहाद जब मीडिया और प्रशासन समाज में नफरत का ज़हर घोलने के लिए झूठ दिखाती है और ग़लत इतिहास दिखाती है लोगों का माइंडवॉश करती है,तब भी तो अपनी प्रगतिशील सोच का इस्तेमाल करना चाहिए, सही शासक को चुनाव में मत देकर चुनना चाहिए, घटिया न्यूज़ चैनल को नहीं देखना चाहिए। और जो औरतें लड़कियां छात्राएं दादियां आज प्रोटेस्ट करती हुई अच्छी लग रही हैं सड़क पर आंदोलन करती हुई,प्राइम टाइम में बोलती हुई वो हमेशा से हक़ बात बोलती हुई क्यों अच्छी नहीं लगती,वो स्कूल कॉलेज युनिवर्सिटी की शिक्षा लेने और नौकरी ख़ुदमुख़्तारी के लिए सड़क़ पर चलती हुई अच्छी क्यों नहीं लगती ? इसलिए कि तब आपका मतलब सिद्ध नहीं होता? 



 महज़बीं दिल्ली विश्विद्यालय में रिसर्चर हैं और मुद्दों पर बेबाक, स्पष्ट राय रखती हैं।  
(शाहीन बाग़ की सभी तसवीरें सुजाता )

4 comments:

Unknown said...

वो हमेशा हक़ बात बोलती हुई इसलिए अच्छी नहीं लगती क्योंकि मर्द की अना को चोट पहुंचती है और इसे वो किसी भी सूरत में क़ुबूल नहीं सकता।

अच्छा लेख।

सुजाता said...

शुक्रिया

Alka said...

बहुत बढ़िया लिखा महज़बीं दी। हमारा सामाजिक ढांचा ही ऐसा बना है। लड़कियां आज भी पितृसत्ता से बाहर निकलकर नहीं सोच पा रही हैं। कुछ लड़कियों जो पढ़ लिख रही है और मर्दवादी सोच की बेड़ियो को तोड़कर खुलकर बोल रही है उन्हें भी हमारा समाज पसंद नहीं करता। पढ़ती लिखती और निडर होकर बोलती लड़कियां हमारे पितृसत्तात्मक समाज को बहुत चुभता है।

कविता रावत said...

अब पहले जैसा समय नहीं है
धीरे-धीरे ही सही लेकिन महिला-पुरुष भेद जल्द ही खत्म होगा एक दिन

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