Friday, March 20, 2020

जहाँ कन्याओं का जन्म हो, माँ स्त्री हो देवी नहीं, वहाँ पुरुष पिता होगा मर्द नहीं

ममता सिंह
नवरात्रि आने वाली है देवी मैया के गुणगान और कन्याओं की पूजा शुरु होने वाली है, हालांकि कोरोना के कारण धूमधाम में थोड़ी तो कमी होगी पर बन्द नहीं होगा यह। देवीपूजन और कन्यापूजन को ढोंग कहने पर बहुत लोगों को आपत्ति होगी, उनकी भावनाएं आहत होंगी, इसलिए नहीं कहती लेकिन इन्हीं लोगों से पूछना चाहती हूं कि यूनिसेफ़ की रिपोर्ट कहती है कि हिंदुस्तान में रोज़ 7000 बच्चियाँ गर्भ में मारी जा रहीं,जी हाँ रोज़ाना सात हज़ार बच्चियाँ तो आपकी भावनाएं आहत होती हैं? अगर हाँ तो प्रतिक्रिया क्यों नहीं आती? मज़ेदार बात यह कि यह बच्चियाँ तब मारी जा रहीं हैं जब इस देश में कन्या भ्रूण हत्या के लिए 1994 में प्री नेटल डायग्नोस्टिक टेक्निक यानी पीएनडीटी क़ानून लागू है। एक अनुमान है कि पिछले तीस से चालीस साल में देश में तीन करोड़ से अधिक लड़कियाँ गर्भ में मार दी गई हैं। एक तरफ समाज देवी मैया के भजन गाता है दूसरी तरफ़ तीन करोड़ बच्चियों को महज़ इसलिए मार देता है कि वह लड़का नहीं हैं। कितने चुपचाप,कितनी ख़ामोशी और कितनी चालाकी से हम इन क्रूर आंकड़ों पर आँखें बंद कर लेते हैं..हाउ स्वीट न..
हममें से बहुतों ने शायद डॉ मीतू खुराना का नाम सुना हो और शायद न भी सुना हो ।वह कोई देवी नहीं थीं न ही कोई हाइ प्रोफाईल इंसान। वह माँ थीं..जुड़वां बच्चियों की माँ.. वह माँ जिन्होंने PNDT एक्ट के तहत पहला मामला दर्ज कराया।
उन्होंने अपने पति,ससुराली जनों के साथ-साथ उस हॉस्पिटल पर भी केस किया जिसने धोखे से उनके गर्भ की लिंग जाँच की। डॉ मीनू स्वयं डॉ थीं और उनके पति भी डॉ थे। यह पता चल गया था कि बच्चे जुड़वा हैं और दोनो लड़कियाँ। ससुर जी इतिहास के प्रोफ़ेसर और सास रिटायर्ड वाइस प्रिंसिपल पर समाज की यह मानसिकता जिसमें वंश चलाने के लिए बेटे का होना अनिवार्य होता है, के चलते डॉ मीनू पर गर्भपात कराने के लिए शारीरिक,मानसिक अत्याचार हुए,घर से निकाला गया,उनपर दबाव डाला गया कि वह कम से कम एक बेटी की हत्या के लिए रज़ामंद हों...
1994 में कानून बनने के बावज़ूद किसी ने इसके तहत कोई केस नहीं दर्ज़ किया था पर डॉ मितू ने 2008 में जब इसके तहत मामला दर्ज़ कराया तब देश भर में एकबारगी कन्या भ्रूण हत्या कानून सुर्ख़ियों में आ गया...डॉ मीतू की ख़ुशकिस्मती थी कि उनके माता-पिता बेटी और बेटे में फ़र्क नहीं करते थे और उन्होंने हर कदम अपनी बेटी का साथ दिया,पर डॉ मीनू ने कई जगह कहा कि उनकी लड़ाई लम्बी और बहुत कठिन है क्योंकि यह एक परिवार की बात नहीं बल्कि एक माइंडसेट की लड़ाई है,वह माइंडसेट जिसमें हर जगह लड़की को कम्प्रोमाइज करने,ससुराल के हर ऊंच नीच को सहने और बेटा होने की अनिवार्यता को सहज माना जाता है,यह माइंडसेट सोसाइटी,ज्यूडिशरी से लेकर पुलिस प्रशासन तक हर जगह व्याप्त है तभी उन्हें हर जगह हतोत्साहित किया गया,एक बड़े पुलिस अधिकारी ने डॉ मीतू से कहा कि आप लड़ते लड़ते मर जायेंगी पर आपको कोई न्याय नहीं मिलेगा,वहीं एक बड़ी अथॉरिटी ने कहा कि आप एक बेटा क्यों नहीं दे देतीं अपने ससुराल वालों को,बेटे की चाह रखना उनका अधिकार है.. डॉ मीतू के लिए बहुत आसान था सबकुछ सह लेना और बहुत मुश्किल था इस माइंडसेट से एक अंतहीन लड़ाई लड़ना.. निचली अदालत ने उनका केस खारिज़ कर दिया कि उनके पास अल्ट्रासाउंड का कोई प्रूफ़ नहीं था जबकि वह कहती रहीं कि जिस हॉस्पिटल में अल्ट्रासाउंड हुआ वह उनके पति के मित्र का था..जब रोज़ाना आमलोग हज़ारों बच्चियों की जाँच और अबॉर्शन आसानी से करा रहे तब एक डॉ के लिए अपने मित्र से जाँच कराना कौन सा मुश्किल काम था.. आमिर खान के ‘सत्यमेव जयते’ कार्यक्रम में इस मुद्दे के एक शोधकर्ता ने बताया कि यह मिथ है कि कन्या भ्रूण हत्या अनपढ़ लोगों और पिछड़े इलाकों में होता है,उन्होंने बताया कि कन्या भ्रूण हत्या कराने वालों में मध्यवर्ग से लेकर उच्च वर्ग तक के लोग शामिल हैं जिनमें स्वयं डॉक्टर्स,आईएएस, चार्टर्ड एकाउंटेंट और मल्टीनेशनल कंपनी में काम करने वाले लोग तक शामिल हैं.. सन 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने ने ऑर्डर दिया कि पीएनडीटी एक्ट के तहत हुए मुकदमों का शीघ्र निस्तारण हो पर डॉ मीतू का केस वहीं का वहीं रहा..यहाँ तक कि भारत के प्रधानमंत्री के बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ के नारे के बाद डॉ मीनू को उम्मीद जगी थी कि उनके केस में अब कोई फ़ैसला होगा इसके लिए उनके छात्रों(वह एक मेडिकल कॉलेज में पढ़ा रही थीं)ने कैम्पेन के तहत लगभग तीस हज़ार हस्ताक्षर प्रधानमंत्री को भेजा, किन्तु वहाँ से भी कोई सुनवाई नहीं हुई।कुछ नारे केवल कहने में ही आसान और अच्छे लगते हैं उनपर क्रियान्वयन करने की न ज़रूरत है न उत्साह.. डॉ मीतू जिन्हें डिफेंडर ऑफ बेबी ग़र्ल्स कहा जाता है कि हार्ट सर्जरी से जुड़ी कॉम्प्लिकेशन के कारण मृत्यु हो गई..करोड़ों बच्चियों का दर्द दिल मे लिए हमारी एक हीरो हमसे विदा हो गईं,काश हमारा समाज और समय उनके इस अवदान को समझ सके और उनकी लड़ाई को अंज़ाम तक पहुंचा सके। विदा डॉ मीतू !
ममता सिंह

अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री को सिर्फ बाहर ही नहीं अपने भीतर भी लड़ना पड़ता है- अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री-विमर्श के तमाम सवालों को समेटने की कोशिश में लगे अनुप्रिया के रेखांकन इन दिनों सबसे विशिष्ट हैं। अपने कहन और असर में वे कई तरह से ...