Friday, August 21, 2020

सलाम इस्मत आपा !


- सुजाता

 

फिल्मों की भीड़ में थिएटर अब कोई भूली हुई सी चीज हुई जाती है. किसी वक्त इप्टा और दूसरे संगठनों ने जिस थिएटर को एक आंदोलन की तरह विकसित किया था, आज वह कुछेक महानगरों और दूसरे केंद्रों तक ही सिमट गया है. 2017 फरवरी की, शनिवार की, बेरंग शाम आज अचानक कोरोना के इन दिनों में याद आ गई. मन उदास था और किसी कल चैन नहीं पड़ता था. होना तो यह था कि वह शाम भारतीय रंग महोत्सव के किसी भव्य नाटक को देखते हुए गुजारी जाती, लेकिन अपनी जांबाज पुरखिन इस्मत आपा के नाम ने शहीद थिएटरकर्मी सफदर हाशमी की याद में बने ‘स्टूडियो सफदर’ में खींच लिया था.

 

कहानी की कहानी इस्मत की जुबानी- 

मशहूर उर्दू लेखिका इस्मत चुगताई के जीवन और लेखन पर ‘कहानी की कहानी इस्मत की जुबानी’ ब्रेख्तियन मिरर और इप्टा के सहयोग से नूर जहीर के निर्देशन में तैयार कोई डेढ़ घंटे का एक शानदार नाटक है. अपनी जीवनी अधूरी ही छोड़ गयी थीं इस्मत आपा, जिसे नूर ने उनकी कहानियों और उनके वक्त के दूसरे लेखकों की उन पर लिखी तहरीरों को जोड़ कर तैयार किया है यह नाटक, जो गुजिश्ता वक्त के संघर्षों की कहानी तो है ही, हमारे वक्त के लिए एक आईना भी है.

आधुनिक स्त्रीवादी लेखिका- इस्मत चुगताई जिस वक्त उर्दू की दबंग और ताकतवर लेखिका के रूप में उभरीं उस वक्त का समाज भारतीय और खासतौर से मुसलिम समुदाय के लिहाज से एक बेहद रूढ़िवादी समाज था, जहां औरतों को लिखने या बोलने की ही नहीं, पढ़ने की भी आजादी नहीं थी. खुद अपनी पढ़ाई के लिए इस्मत को संघर्ष करने पड़े और तोहमतें झेलनी पड़ीं.


हजार वर्षों की गलाजत के चेहरे से नकाब हटायीतो समाज के अशराफ के सीनों में दर्द लाजिम ही था- 

ऐसे में जब अपनी अभिव्यक्ति के लिए उन्होंने कहानी का माध्यम चुना, तो स्वाभाविक था कि वह अपने आस-पास के विभिन्न मुद्दों को उठातीं, जो बाकी लोगों के लिए बेमानी से थे. जब उन्होंने गैरमामूली मुद्दों को पूरी बेबाकी से उठाया, तो खलबली मच गयी. उनकी सबसे ज्यादा उल्लेख की जानेवाली कहानी ‘लिहाफ’ के लिए तो 1941 में लाहौर हाइकोर्ट में अश्लीलता के लिए उन पर मुकद्दमा भी चला. मुकदमे के सहअभियुक्त बने उस दौर के ऐसे ही एक और बेबाक लेखक और इस्मत के अजीज दोस्त मंटो. शरीफ घरानों में जन्मे इन दोनों लेखकों ने हजार वर्षों की गलाजत के चेहरे से नकाब हटायी, तो समाज के अशराफ के सीनों में दर्द लाजिम ही था.

लिहाफ’ उस दौर में स्त्री यौनिकता और समलैंगिकता के मुद्दे को बेहद संवेदनशीलता से उठाती है, जिस पर आज भी बात करना विवादों और मुसीबतों को बुलावा देना है. वह अपनी दीगर कहानियों और उपन्यासों में भी विभिन्न स्त्री मुद्दों को उठाती हैं और कहीं भी किसी एक्स्ट्रीम में गये बिना बेहद सहज और चुलबुले तरीके से मार्मिक बातों को कह जाती हैं. तंज उनका अचूक हथियार है. वे उन स्त्रियों के बीच पैठती हैं, जिन्हें हम पतित, पिछड़ी और असभ्य कहते हैं. एक परंपरागत समाज में ऐसी औरतों के बीच से जीने की इच्छा, साहस व बेबाकी को निकाल कर आपा ने अपनी कहानियों में ढालने की जुर्रत की. वे अपने वक्त की आधुनिक स्त्रीवादी लेखिका हैं.



प्रगतिशील स्त्री-लेखन  - 

इस्मत को लेखन की परंपरा डॉ रशीद जहां से मिली, जो उनकी सीनियर थीं और जिन्हें वे अपना आदर्श मानती थीं. उनके आरंभिक लेखन पर रशीद जहां का प्रभाव कहा जाता है.

रशीद जहां भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और प्रगतिशील लेखक संघ की सक्रिय कार्यकर्ता भी थीं और इस लिहाज से वे भारतीय उर्दू साहित्य की पहली विद्रोही लेखिका थीं. डॉ रशीद ने अपने कथा सहित्य में मुसलिम समाज के भीतर प्रचलित कट्टरपंथ और स्त्री मुद्दों को उठाया. रजिया जहीर (नूर जहीर की मां और उस्ताद), रशीद जहां और इस्मत चुगताई मिल कर उस जमाने में प्रगतिशील स्त्री लेखन का एक ऐसी तिकड़ी बनाती हैं, जिनकी खींची कई लकीरें अब तक पार नहीं की जा सकी हैं.


 बहुत कुछ लिखा ज़रूरी लेकिन ‘लिहाफ’ लेबल की तरह उनके नाम से चिपक गयी- 

बंबई में रह कर आपा फिल्मों से भी जुड़ी रहीं. ‘गर्म हवा’ विभाजन की राजनीतिक सामाजिक विभीषिका पर बनी फिल्म थी, जिसकी कहानी उन्होंने लिखी थी. अनुवाद न होने से इस्मत को हिंदी में पढ़ा जाना काफी बाद में संभव हो सका. खुद इस्मत भी देवनागरी की हिमायती हुईं. बीबीसी को दिये एक साक्षात्कार में उनकी पुत्री सबरीना ने बताया कि वे चिंतित थीं कि अगर उर्दू साहित्य को देवनागरी में नहीं लिखा गया, तो उर्दू दम तोड़ देगी.

मुसलिम समाज का हिस्सा होते हुए इस्मत ने स्त्री के लिए बनाये चौखटे इस दम-खम से ढहाये कि अक्सर विवादों में घिरीं रहीं. लेकिन, स्त्री-लेखन की यही वह विद्रोही परंपरा है, जो उर्दू में आनेवाली लेखिकाओं को मिली और इस मायने में हिंदी कथा साहित्य में स्त्री की उपस्थिति देर से और कम मजबूत दिखायी दी.

निवाला’ में एक सीधी-सादी दाई का काम करनेवाली अविवाहिता सरलाबेन को अड़ोस-पड़ोस वालियां मिल कर लाली-पाउडर, कपड़े-लत्ते की अपने-अपने हिसाब से तमीज सिखा कर पुरुष को लुभाने के गुर सिखाने लगती हैं. सरलाबेन रोते हुए सोचती है- ‘क्या औरत होना काफी नहीं. एक निवाले में इतना अचार, चटनी, मुरब्बा क्यों लाजिमी है... और फिर उस निवाले को बचाने के लिए सारी उम्र की घिस-घिस .’ इस कहानी से एक पल में मानो आपा न केवल सौंदर्य की अवधारणा पर चोट करती हैं, बल्कि शादी के रिश्ते में पति-पत्नी वाली सारी असहज युक्तियों को भी निशाने पर ले आती हैं. यह उनकी विशेषता है कि गंभीर बात कहते हुए भी चुटकी लेना नहीं भूलतीं.

लिहाफ’ तो इतनी प्रसिद्ध हुई कि लेबल की तरह उनके नाम से चिपक गयी. एक तरफ उनकी कहानियां पितृसत्ता के चरित्र को उघाड़ती हैं, तो वहीं स्त्री के विद्रोही तेवर भी देखने को मिलते हैं.

घरवाली’ जैसी कहानी में अपनी कामवाली लाजो को काबू में करने के लिए मियां उससे निकाह करते हैं और मस्तमौला लाजो को जब तलाक देते हैं, तो लाजो की जान में जान आती है. आपा की कहानियां पितृसत्तात्मक व्यवस्था में पली-बढ़ी औरतों के विभिन्न रंग भी दिखाती हैं. ‘बिच्छू मौसी’ हो ‘सास’ हो या चाल में रहने वाली, धंधा करनेवाली औरतें या ‘दोजखी’ जैसी मार्मिक कहानियां हों, वे अपने समाज की सच्चाइयों को संवेदनशीलता, चुटीलेपन और बेबाकी से कह देने की कला जानती हैं.


स्त्री लेखन में बोल्ड लेखन के नाम पर जो भी लिखा जाता है, उसे इस्मत के लेखन से सरोकार के साथ बेबाक होना सीखने की जरूरत आज भी कतई कम नहीं है. आज जो हमारे हाथों में एक हद तक आजाद कलम है, तो उसमें इस्मत आपा जैसी पुरखिनों के पसीने और लहू का बड़ा योगदान है.

 


Sunday, August 16, 2020

स्त्रीत्व की नई छवि गढती हुई कवि- सुभद्राकुमारी चौहान

 

अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी रजधानी थी .... याद है यह पंक्ति आपको? यही वह पंक्ति है जिसे राजस्थान शिक्षा बोर्ड ने झाँसी की रानी कविता से मिटाकर स्कूलों में पढाया। राजस्थान क्या ग्वालियर में भी आपको इस सुप्रसिद्ध कविता का यह अंश सुनाई नहीं पड़ेगा। सिंधियाओं की अंग्रेज़ों से मित्रता और झाँसी की रानी के साथ हुआ विश्वासघात आप इतिहास से कितना ही मिटाने की कोशिश करें हिंदी की जानी-मानी कवि सुभद्रा कुमारी चौहान राजस्थान इसे अपनी कविता में बखूबी दर्ज कर गई हैं।

राष्ट्रीय काव्यधारा की यशस्वी कवि

16 अगस्त को 1904 में इलाहाबाद में जन्मी सुभद्रा कुमारी 9 बरस की उम्र में ही अपनी कविता से अपने पूरे स्कूल भर में प्रसिद्ध हो गई थीं लेकिन बस नवीं तक ही वे पढाई कर पाईं। 15 साल में उनका विवाह हो गया। लेकिन उनकी प्रतिभा और कविता की राह में यह रुकावट नहीं बन पाया। पति लक्ष्मण सिंह चौहान के साथ ही 1923 में ये गाँधी जी के सत्याग्रह आंदोलन में शामिल हो गई और दो बार जेल गईं।

मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न माँग

राष्ट्रीय काव्यधारा में जिस कवयित्री का नोटिस लेने से कोई नहीं चूक सकता वे सुभद्राकुमारी ही हैं। लेकिन ख़ूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी के अलावा भी उनकी कई कविताएँ हैं जो स्वतंत्रता-आंदोलन की विरासत हैं। राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा और मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न माँग जैसी पंक्तियाँ पढते हुए हमें एक पुरुष का दुनिया/समाज के प्रति अपने कर्तव्यों के निर्वाह को प्रेमिका से ज़्यादा तरजीह देना कितना स्वाभाविक लगता है।सच यह है कि स्त्री की ज़िंदगी में भी हर राहत वस्ल की राहत नहीं हो सकती। उसकी ज़िंदगी में भी समाज/ देश के प्रति कर्तव्यों की कई चुनौतियाँ होती हैं। उसके लिए कविता करना भी गृहस्थ-जीवन और प्रेम के समकक्ष चुनौती बनकर खड़ा हो सकता है। वीरों का कैसा हो बसंत और जलियाँवाला बाग पढ़ना चाहिए। एक अन्य कविता में पति के साथ इन्हीं भावनाओं का द्वंद्व दिखाई देता है। पति शृंगार रचना की कामना करता है, स्वभावत: दुनिया ही स्त्री से कोमल विषयों पर लिखने की उम्मीद करती है। वे स्त्रीत्व का नया मानक गढती हैं। स्त्री जो एक प्रेमिका ही नहीं माँ भी है और साथ-साथ राष्ट्र की एक नागरिक भी। 

 

मुझे कहा कविता लिखने को, लिखने मैं बैठी तत्काल।

पहिले लिखा- ‘‘जालियाँवाला’’, कहा कि ‘‘बस, हो गये निहाल॥’’

तुम्हें और कुछ नहीं सूझता, ले-देकर वह खूनी बाग़।

रोने से अब क्या होता है, धुल न सकेगा उसका दाग़॥

भूल उसे, चल हँसो, मस्त हो- मैंने कहा- ‘‘धरो कुछ धीर।’’

तुमको हँसते देख कहीं, फिर फ़ायर करे न डायर वीर॥’’

कहा- ‘‘न मैं कुछ लिखने दूँगा, मुझे चाहिये प्रेम-कथा।’’

मैंने कहा- ‘‘नवेली है वह रम्य वदन है चन्द्र यथा॥’’

अहा! मग्न हो उछल पड़े वे। मैंने कहा- सुनो चुपचाप

बड़ी-बड़ी सी भोली आँखें, केश पाश क्यों काले साँप                                        (मेरी कविता- सुभद्राकुमारी )

 

वे उस नवब्याहता का चित्र खींचती हैं जो इसी जलियावाला बाग हत्याकांड में अपने प्रिय को खो चुकी है जो हाथों की मेहंदी लिए, आँसू पोछ्ते हुए, रोज़ पागलों की तरह उस बाग की ओर जाती है और अपने सुख के दिनो को याद करती है, आँसू बहाती है। यह कविता पुन: पाठ की माँग करती है हमसे।

 




सुभद्राकुमारी के जीवन का हर चुनाव स्त्री के पक्ष में है, यद्यपि उसका गंतव्य राष्ट्रप्रेम है- सुमन राजे (हिंदी साहित्य का आधा इतिहास, p250)   

देश के प्रति कर्तव्य भावना को नारी की भगिनी, मातृ तथा प्रेयसी भावना के साथ समंवित करके उन्होंने कर्तव्य तथ्हा भावना का सुंदर सामंजस्य उपस्थित किया है। देश प्रेम की भावनाओं के अतिरिक्त उन्होंने वात्सल्य रस की सुंदर कविताएँ लिखी हैं। - प्रो. सावित्री सिन्हा (हिंदी की मध्यकालीन कवयित्रियाँ p.305)






वीर स्त्री को मर्दानी कहती हैं सुभद्रा ?

झाँसी की रानी को मर्दानी लिखने से बहुत से लोग आज प्रश्न करते हैं कि क्यों वे वीर स्त्री को मर्दानी कहती हैं? मैं पूछती हूँ वीरता के मानक क्या बनाए हैं समाज ने? क्या वे मर्दाना ही नहीं हैं? (एक अंग्रेज़ अफसर ने भी लिखा था कि लड़ने वालों में एक ही मर्द था- झाँसी की रानी।) अपने युग की चेतना और अभिव्यक्तियाँ प्रभावित करती ही हैं।

युद्ध और राजनीति माने की मर्दाना इलाके जाते हैं हमेशा से। पुलिस में शामिल होने वाली स्त्री से भी मर्दानी होने की अपेक्षा की जाती है। बहादुरी मार-काट है, युद्ध, आक्रामकता है। प्रसव वेदना सहना, अकेले परिवार का भरण-पोषण करना नहीं, मीलों दूर से चलकर पानी के मटके सर पर उठा लाना, खेतों में काम करना, मवेशियों का पानी-सानी करना, चक्की पीसना नहीं। श्रम का, बहादुरी का ऐसे ही जेंडर अलग कर दिया गया। हम भी तो 56 इंच के सीने वाला प्रधान मंत्री चाहते हैं। सबको अपनी सम्वेदना के दायरे में समेट लेने वाली जेसिंडा आर्डर्न जैसी प्रधानमंत्री नहीं ! अपनी ओर कभी सवालिया उंगली उठाते हैं हम?  

यह भी देखिए कि जिस समय सभी कवियों ने वीरों और महापुरुषों का प्रशस्ति-गान किया उन्होंने झाँसी की रानी को हीरो माना। साथ ही उन्होंने राष्ट्रीय काव्य धारा के भीतर के प्रचलित रूपक नहीं लिए। अपने रूपक और मानक बनाए।

  

बेटी के जन्म को सेलीब्रेट करने वाली वे हिंदी की पहली कवयित्री

लेकिन याद रखना चाहिए कि बेटी के जन्म को सेलीब्रेट करने वाली वे हिंदी की पहली कवयित्री हैं। एक रूढिवादी ज़मींदार परिवार में जन्म लेकर, एक रूढिवादी समाज में जीते हुए मेरा नया बचपनकविता में बेटी को ही अपने व्यक्तित्व का विस्तार मानती हैं। गर्वित और प्रसन्न होती उनकी कुछ कविताएँ संकेत देती हैं कि उनके पति भी कन्या के जन्म से शायद प्रसन्न न थे। एक कविता इसका रोना पढिए-  

तुम कहते हो - मुझको इसका रोना नहीं सुहाता है।

मैं कहती हूँ - इस रोने से अनुपम सुख छा जाता है।

सच कहती हूँ, इस रोने की छवि को जरा निहारोगे।

बड़ी-बड़ी आँसू की बूँदों पर मुक्तावली वारोगे।।

 

ये नन्हें से होंठ और यह लंबी-सी सिसकी देखो।

यह छोटा सा गला और यह गहरी-सी हिचकी देखो।

कैसी करुणा-जनक दृष्टि है, हृदय उमड़ कर आया है।

छिपे हुए आत्मीय भाव को यह उभार कर लाया है।

 

बालिका का परिचय एक अनूठी कविता है। बेटी को आंगन में खेलते हुए वे उसी में अपना कृष्ण, राम, ईसा मसीह, काबा, काशी सब देख लेती हैं। पुत्री के जीवन में होने को लेकर ऐसी प्रसन्नता और आश्वस्ति हिंदी कविता में निराली थी। क्रांतिकारी थी।

बीते हुए बालपन की यह, क्रीड़ापूर्ण वाटिका है

वही मचलना, वही किलकना, हँसती हुई नाटिका है।

 

मेरा मंदिर, मेरी मसजिद, काबा काशी यह मेरी

पूजा पाठ, ध्यान, जप, तप, है घट-घट वासी यह मेरी।

 

मिट्टी खाने वाले बाल-कृष्ण के मुख में जैसे यशोदा ने पूरा ब्रह्माण्ड देख लिया था कैसा अलौकिक दृश्य है।  सूरदास के यहाँ आई कृष्ण की  बाल-लीलाओं या तुलसी के वात्सल्य वर्णन से कहीं आगे जाता हुआ कितना सुंदर, सहज, मानवीय चित्र बनता है यहाँ। वात्सल्य ही नहीं प्रेम की भी सहज अभिव्यक्तियाँ इनके यहाँ मिलती हैं।   

'माँ ओ' कहकर बुला रही थी मिट्टी खाकर आई थी।

कुछ मुँह में कुछ लिए हाथ में मुझे खिलाने लाई थी।।

 

पुलक रहे थे अंग, दृगों में कौतुहल था छलक रहा।

मुँह पर थी आह्लाद-लालिमा विजय-गर्व था झलक रहा।।

 

मैंने पूछा 'यह क्या लाई?' बोल उठी वह 'माँ, काओ'

हुआ प्रफुल्लित हृदय खुशी से मैंने कहा - 'तुम्हीं खाओ'

 

 सुभद्राकुमारी चौहान और महादेवी वर्मा समकालीन थीं और दोनो भिन्न प्रतिभाओं की कवि थीं। दोनो का नाम हिंदी की आधुनिक कविता के इतिहास में अमिट हो गया।    

 

अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री को सिर्फ बाहर ही नहीं अपने भीतर भी लड़ना पड़ता है- अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री-विमर्श के तमाम सवालों को समेटने की कोशिश में लगे अनुप्रिया के रेखांकन इन दिनों सबसे विशिष्ट हैं। अपने कहन और असर में वे कई तरह से ...