Friday, September 25, 2020

चमकते सितारों वाली आज़ाद दुनिया की तलाश...

 


अंकिता शाम्भवी

 

अपनी अस्मिता की खोज करती हुई, रूढ़ियों को तोड़ने की चाह रखती हुई स्त्रियाँ इधर की फ़िल्मों में लगातार नज़र आ रही हैं। फिर अलंकृता श्रीवास्तव निर्देशित 'डॉली किट्टी और वो चमकते सितारे' में ऐसा क्या है जो उसे बाक़ी स्त्री-केंद्रित फ़िल्मों से अलग और नये तरह का बनाता है?

दरअसल ये फ़िल्म न सिर्फ़ स्त्री की आज़ादी और उसके सपनों की बुनावट को बारीक़ी से दर्शाती है, बल्कि समाज में पहले से व्याप्त कई तरह के स्टीरियोटाइप्स को बिना शोर मचाए तोड़ती भी जाती है। धर्म, जाति, लैंगिक समानता जैसे कई ज़रूरी मुद्दों पर प्रश्नचिह्न अंकित करती है यह फ़िल्म।

 


दो चचेरी बहनें हैं, डॉली और किट्टी(काजल), डॉली शादीशुदा है, कामकाजी है, उसके दो बेटे हैं, लेकिन अपनी शारीरिक ज़रूरतों को लेकर वो संतुष्ट नहीं है। उसकी चचेरी बहन काजल या किट्टी है, जो गाँव से दिल्ली आकर एक नौकरी की तलाश में है, वो ज़्यादातर अपनी डॉली दी के साथ ही रहती है, पर अपना ख़ुद का कमरा भी लेना चाहती है, वो कुँवारी है और अपनी शर्तों पर जीना चाहती है।

 

जाति और जेण्डर का जुड़वा सच   

इधर की फ़िल्मों में शायद पहली बार कोई 'यादव' उपनाम वाली स्त्री-चरित्र फ़िल्म के मुख्य किरदार में है। डॉली कामकाजी है, उसके बॉस घनश्याम पाण्डे हैं, जिनका नेमप्लेट फ़िल्म में हाईलाइट करके दिखाया गया है, यहाँ ध्यान से देखा जाए तो समझ आता है कि, समाज में जाति के आधार पर जो ऊँच-नीच का मुद्दा है उसे काफ़ी सटल तरीक़े से निर्देशक ने नेमप्लेट हाईलाइट करके दिखला दिया है। ऑफ़िस में चाय बनाने का काम डॉली ही करती है, क्योंकि वो पुरुषों की नज़र में कमतर है। और यूँ भी रसोई का काम तो आख़िर स्त्री के ही जिम्मे होता है! काजल को भी जूते की फैक्ट्री में काम मिल जाता है, उसे हॉस्टल लेने के लिए पैसों की ज़रूरत होती है, अपने बॉस से सैलरी की माँग करने पर उसे अदना-सा जवाब मिलता है कि "औकात में रह! ये फैक्ट्री है, तबेला नहीं!"

 

सेक्शुअल ओरिएंटेंशन का सवाल 

डॉली के बेटे पप्पू में लड़की जैसी आदतों और गुणों का होना भी समाज की उस मानसिकता से सवाल करता है जिसे एक लड़के का गुड़िया से खेलना, गुलाबी रंग की चीज़ें पसन्द करना, फ्रॉक पहनना कभी भी उचित नहीं लग सकता। छिप-छिप कर वो अपनी मम्मी का मेकअप लगाता है और ब्रा पहनता है। ये सारी आदतें ख़ुद डॉली को भी रास नहीं आतीं।  डॉली का पति उसे यही यकीन दिलाता है कि माँ के शारीरिक दोषों के कारण बच्चे की भी शारीरिक और मानसिक बनावट पर असर पड़ता है। लेकिन वो जिस स्वास्थ्य पत्रिका से पढ़कर ऐसा कहता है, उसमें कहीं भी पिता के शारीरिक दोषों का ज़िक्र नहीं होता! लड़का-लड़की के बीच शारीरिक और मानसिक फ़र्क की घुट्टी जो हमें बचपन से पिला दी जाती है, वो कभी भी हमें अपने जेण्डर से भिन्न आदतें रखने और उसके तौर-तरीके अपनाने की छूट नहीं दे सकती। उसे दोष या विकृति की तरह ही देखा जाता है।

 

आज़ादी का स्वाद

कितनी स्त्रियाँ आज अपनी शादी में नाख़ुश होने पर सबकुछ छोड़कर जाने का फ़ैसला बहुत आसानी से कर सकती हैं? माँ, पत्नी, बहू होने पर एक आज़ाद व्यक्तित्व वाली स्त्री होने का भाव दरकिनार क्यों हो जाता है ? बहुत सारे सवाल इस फ़िल्म को देखने के बाद हमारे मन में दर्ज हो जाते हैं।

डॉली को इस बात की खीझ रहती है कि उसकी माँ ने उसे बहुत कम उम्र में छोड़ कर अपने सुख की परवाह की, लेकिन क्या ख़ुद डॉली भी अपनी शादीशुदा ज़िन्दगी से परेशान होकर, सबकुछ छोड़कर ओस्मान के साथ अपना जीवन सुख से बिताना चाहती थी ? शायद हाँ, इसलिए उसका गुस्सा और खीझ यहाँ हर उस औरत की खीझ बन जाता है जो शादी के बाद एक समर्पित स्त्री की तरह अपने पति, बच्चों और गृहस्थी को सम्भालने में ख़ुद की ज़रूरतों को ही ताक पर रख देती है। लेकिन अपने वैवाहिक जीवन को बचाए रखने के लिए ही डॉली पति की तमाम हरकतों पर चुप रहती है। इस फ़िल्म में एक से बढ़कर एक स्त्री चरित्र हैं, शाज़िया भी उन्हीं में से एक है जो काजल को शहर में खुलकर जीना, घूमना-फिरना सिखाती है, उसे आज़ादी का स्वाद चखाती है। लेकिन ये बात जब डॉली को मालूम पड़ती है तब वो काजल से बेहद नाराज़ हो जाती है, क्योंकि उसे मालूम होता है कि एक लड़की अपने मन के मुताबिक जीने से किस तरह सबकी नज़र का काँटा बनने लगती है।

 

स्त्री की शारीरिक ज़रूरतों को भिन्न कोणों से संवेदनशीलता के साथ एड्रेस करती नज़र आती है

 

स्त्री और पुरुष की लगभग समान ज़रूरतें होती हैं, फिर भी पुरुषों में सेक्स को लेकर शर्म या झिझक शायद ही देखने को मिले, लेकिन वहीं यदि स्त्री अपनी सुख-सुविधाओं और शारीरिक ज़रूरतों की बात करे तो लोग उसे बदचलन, कुलटा, रंडी और ना जाने क्या-क्या बना देते हैं, ये हमारे तथाकथित सभ्य समाज का दोगलापन ही तो कहलाएगा!

 

ओस्मान से प्यार और सेक्स पाकर उसे यक़ीन हो जाता है कि ठंडापन उसमें नहीं उसके शादीशुदा जीवन में है। फ़िल्म के अंत में डॉली अपने पति को ओस्मान के बारे में सबकुछ सच-सच बता देती है, इसके अलावा अपने पति द्वारा काजल को molest करने की बात जिसे वो अबतक छुपा रही थी, आज साफ़-साफ़ बता देती है, वो पति की माफ़ी भी स्वीकार नहीं करती। अपने एक बेटे पप्पू को साथ लेकर वो अपना घर, पति और दूसरे बेटे को छोड़कर चली जाती है। ये उसके नए जीवन की शुरुआत कही जा सकती है, जिसे वो बिल्कुल अपनी शर्तों पर जियेगी, पप्पू को आज वो ख़ुशी-ख़ुशी पिंक हेयरबैंड पहनाती है।

एक रात दोनों बहनें साथ में अपना दुःख-सुख साझा करती हैं, शराब पीती हैं। डॉली यहाँ कहती है कि सारी सुविधाएँ मर्दों के लिए होती हैं, काश हम औरतों के लिए भी ऐसा रोमांस एप्प और कॉल सेंटर वाली सुविधा होती। ये बात यहाँ सुन्न कर देती है कि सचमुच स्त्रियों के अकेलेपन, उनकी ज़रूरतों का ख़याल इस समाज में किसी को भी नहीं होता।

 

डॉली की बहन काजल यानी किट्टी जिस कॉल सेंटर में काम कर रही होती है, वहाँ तोड़-फोड़ मच जाती है। इस काम को कालाधंधा और रंडी बाज़ार जैसे नामों से नवाज़ा जाने लगता है। ये सब देखकर काजल दुःखी होती है मगर कॉल सेंटर के बॉस को इसे फिर से बनाने की हिम्मत देती है, वो कहती है कि ये उसकी रोज़ी-रोटी का काम है। वो रोमांस बेचती है क्योंकि आजकल की दुनिया में लोग ख़ुद को अकेला महसूस करते हैं, ये एप्प उनके लिए मददगार है। इसी के साथ वो ये ऐलान करती है कि अब से ये सर्विस औरतों के लिए भी शुरू की जाएगी और तालियों की गूँज के साथ फ़िल्म समाप्त होती है।

 

ख़ुद को स्वीकारना ज़रूरी है

ये फ़िल्म एक ही साथ कई ज़रूरी पहलुओं को महज़ छू कर नहीं गुज़रती बल्कि विस्तार से उन सबसे संवाद करती नज़र आती है। फ़िल्म का अंत एक तरह से डॉली और किट्टी की शारीरिक और मानसिक आज़ादी की जीत के साथ होता है, लेकिन ज़रूरत है हमारे समाज में भी स्त्रियों की आज़ादी को पूरी स्वाभाविकता के साथ सेलिब्रेट करने की, दुनिया इतनी बदल चुकी है मग़र समाज आज भी स्त्रियों की वास्तविक आज़ादी को समझ नहीं पाया है, उसे लेकर कुंठित है, सवाल है कि ये स्थिति कब बदलेगी? स्त्रियों को हमेशा से दोहरी मार झेलनी पड़ती है, आज के समय में उसकी ज़िम्मेदारियाँ घर-बाहर सब जगह एक जैसी हैं, ऐसे में वो अपनी ख़्वाहिशों, और चाहतों को लेकर कितना खुल पाई है, ये हम सभी से छुपा नहीं है।

अब वो घड़ी आ चुकी है जब हम बेबाक होकर इन सभी सवालों का ठोस जवाब ढूँढें, स्त्री-अस्मिता को नए आयाम दें, ताकि हम एक मुकम्मल दुनिया कायम कर सकें।

 


 

अंकिता शाम्भवी, हिन्दी विभाग, काशी हिंदू विश्वविद्यालय से शोधरत हैं और संगीत और चित्रकला में विशेष रुचि रखती हैं।

Sunday, September 13, 2020

भीड़ का न्याय न्याय नहीं लिंचिंग है

 

वह स्क्रीन पर रो-रोकर सम्वेदनाएँ जुटा सकती थी, जैसा कि मर्दवादी समाज कहता है औरतें झूठा आरोप लगाती हैं, रिया विक्टिम-कार्ड खेल सकती थी; लेकिन उसने मज़बूती से तमाम घिनौने आरोप झेले और जेल-जेल चिल्लाते समाज के जल्लाद चेहरे ने उसे भावशून्य कर दिया। उसे ड्रग्स के लिए जेल की हवा खिलाकर पत्नियों से शाम की महफिल में चखना और बर्फ मंगवाने वाले शायद संतुष्ट हों लेकिन यह वीभत्स प्रकरण इस देश की लड़कियों को कभी नहीं भूलना चाहिए। पढिए युवा साथी कशिश नेगी की एक टिप्प्णी। 

                                                                                                                                                                              - सम्पादक   


- कशिश नेगी 

 

भारतीय पत्रकारिता अभी अंतिम सांसे ले ही रही थी कि 14 जून 2020 को मशहूर अभिनेता सुशांत राजपूत की आत्महत्या के साथ साथ भारतीय मीडिया ने भी दम तोड़ दिया। सुशांत राजपूत के आत्महत्या डिप्रेशन के कारण बताई जाने लगी लेकिन धीरे धीरे इसकी दिशा कृति सेनन और अंकिता लोखंडे को कोसते हुए रिया चक्रवर्ती पर ठहर गयी। रिया चक्रवर्ती एक स्ट्रगल अभिनेत्री हैं जिन्होंने अपने कैरियर की शुरुआत 2008 से टीवी के छोटे पर्दे एमटीवी से की। उन्होंने दक्षिण भारतीय फिल्म्स में भी काम किया। बाद में उन्होंने बॉलीवुड फिल्म में भी छोटे रोल किये, उन्होंने बतौर अभिनेत्री 4 बॉलीवुड फिल्मों में काम किया, 2018 में उन्होंने "जलेबी" फ़िल्म में लीड रोल किया। लेकिन उनका कैरियर सफलता न पा सका।



वे आम प्रेमी-जोड़े की तरह ही ख़ुश थे

सुशांत राजपूत और रिया चक्रवर्ती किसी पार्टी में मिले थे, वे जिम भी साथ ही जाते थे। दोनों को साथ साथ देखा जाता था, अन्य प्रेमी युगलों की भांति ही वे ख़ुश थे। सुशांत की आत्महत्या के बाद सोशल मीडिया में रिया पर सवाल उठने लगे। रिया का मीडिया ट्रायल होने लगा इन सब के बीच रिया की मुसीबत तब बढ़ गयी जब दिवंगत सुशांत के पिता ने पटना के राजीव नगर के थाने में रिया के खिलाफ एफआईआर कर दी। रिया पर 16 गम्भीर आरोप लगाए गए। सुशांत के डेबिट और क्रेडिट कार्ड यूज़ कर आर्थिक शोषण, मानसिक बीमारी का ओवर डोज़ देना, ब्लैकमेल करना और परिवार वालों से न मिलने देने, जैसे आरोप मुख्य हैं।

 

मीडिया का पितृसत्तात्मक चेहरा

अचानक ही सोशल मीडिया और मीडिया में बिना तथ्यों के अनर्गल आरोप रिया पर लगने लगे। मीडिया तो इसे काले जादू तक का एंगल दे कर लोगों में अंधविश्वास परोसने लगा। कुछ वक्त बाद केस में ड्रग्स का मुद्दा उछाला जाने लगा, रिया पर आरोप लगाए गए कि वो सुशांत को ड्रग्स देती थी।

मीडिया ने रिया के बहाने न सिर्फ  पितृसत्तात्मक मानसिकता, महिलाओं के प्रति दुर्भावनापूर्ण एवम पूर्वाग्रहों को मजबूत बनाने का मौका पा लिया बल्कि  सोशल मीडिया के माहौल को भी ज़हरीला बना दिया। जो सोशल मीडिया और मीडिया कुछ वक्त पहले तक डिप्रेशन पर बात कर संवेदनाएँ प्रकट कर रहा था वह अब ऐसे गिद्ध में परिवर्तित हो चुके थे जो एक ज़िंदा लडकी को नोच डालना चाहते थे। जो समाज, मीडिया मानसिक बीमारी की बड़ी बड़ी बातें कर रहा था वो एक अकेली लड़की को मानसिक प्रताड़ित करने में को कमी नहीं छोड़ रहा।

 

रिया को निशाना बना पितृसत्ता के कई पूर्वाग्रहों को हवा दी जा रही है। "लड़कियां लड़कों को पैसों के लिए फंसाती है", "लड़कियां, लड़कों को घरवालों से अलग कर देती है", " लड़कियां सिर्फ अमीर लड़कों से रिलेशन में रहती है", "लड़कियां पैसों के लिए धोखा देती है", "लड़कियां लड़कों को दबा कर रखती हैं" जैसे अनेकों पुरुषसत्तात्मक जुमलों को मजबूत करने का कार्य मीडिया कर रही है। रिया सुशांत केस के बाद महिलाओं पर जोक्स की जैसे बाढ़ ही आ गयी। मधु किश्वर ने रिया (और उन जैसी लड़कियों) को Sex bait  कहा।

 

पुरुषवादी समाज के लिए महिलाएं सॉफ्ट टारगेट रही हैं

मीडिया, सोशल मीडिया और समाज का लैंगिक भेदभाव स्पष्ट नज़र आता है, 25 साल की जिया खान के खुदकुशी करने पर कोई बवाल नहीं हुआ यहां तक कि जिया की मां ने सूरज पंचोली पर खुले आम शक जताया लेकिन कोई खास कार्रवाई नहीं। श्री देवी की आकस्मिक मृत्यु पर भी दाह संस्कार के बाद विराम लग लग गया। 1999 में रेखा को भी ऐसा ही दंश सहना पड़ा जब उनके पति मुकेश अग्रवाल ने उन्हीं के दुप्पटे से फांसी लगाई थी, वो दुपट्टा रेखा का ही था? आज तक साबित नहीं हुआ। लेकिन पुरुषसत्तात्मक समाज उस वक़्त भी रेखा जी को दोषी मान चुका था। मीडिया ट्रायल से दुःखी रेखा जी ने टाइम्स ऑफ इंडिया को इंटरव्यू देने के प्रस्ताव को विनम्रता से ठुकरा दिया। अंत मे उन्होंने किसी विश्वसनीय पत्रकार से बात कर सिर्फ इतना कहा, "मैंने मुकेश को नहीं मारा"

 

बलात्कारों पर खून क्यों नहीं खौलता ?

पुरुषवादी समाज के लिए महिलाएं सॉफ्ट टारगेट रही हैं। आये दिन हो रहे सैंकड़ों बलात्कार और महिलाओं पर हो रही हिंसा पर हमारे समाज का खून नहीं खौलता। बलात्कार पीड़िता और उसके परिवार को जान से मार देने पर भी किसी को फर्क नहीं पड़ता। इन पीड़िताओं के लिए किसी को न्याय नहीं चाहिए। पुरुषसत्ता समाज को क्यों लगता है कि जब कोई आदमी सुसाइड करता है तो उसका कारण उसकी पत्नी या प्रेमिका ही होती है जबकि जब कोई औरत आत्महत्या करती है तब ये धारणा ही बदल जाती है। वैसे भी डायन, चुड़ैल, मनहूस और पति को खाने वाली कुलक्षिणी की उपाधियां सिर्फ और सिर्फ औरत को ही मिली है, पुरुषों को नहीं। डायन और चुड़ैल के नाम पर सिर्फ महिलाओं पर ही हमले होते हैं और उन्हें ज़िंदा तक जलाया जाता है।

 

पॉपुलर न्याय ? 

रिया पर अभी तक कोई आरोप सिद्ध नहीं हुए लेकिन उसे ड्रग्स के मामले में गिरफ्तार कर लिया गया है। अगर ड्रग्स मामले में कायदे और ईमानदारी से गिरफ्तारी की जाए तो आधा हिंदुस्तान शायद जेल में दिखे। जो समाज बॉलीवुड के संजय दत्त और रणवीर कपूर के ड्रग्स आरोपों को आसानी से भुला देता है वही समाज रिया के मामले में न्याय चाहता है।

मीडिया ट्रायल से तंग आ कर रिया ने एक वीडियो जारी किया जिसमें उन्होंने कहा, "मुझे देश के न्यायतंत्र पर भरोसा है" जिस पर विपक्ष के वकील विकास सिंह का बयान आया कि जो सलवार कमीज रिया ने वीडियो में पहनी है, शायद पहले कभी न पहनी हो। रिया खुद को आम महिला दिखाने की कोशिश कर रही है। वकील विकास सिंह का ये बयान पूर्णतया पितृसत्ता मानसिकता से लबालब था। वे लोगों का ध्यान रिया के परिधान की ओर आकृष्ट करना चाहते थे। वे केस को पितृसत्तात्मक तरीके से मजबूत करते दिख रहे थे।

 

 रिया अभी दोषी साबित नहीं हुई, मीडिया को तथ्यों पर रिपोर्टिंग करनी चाहिए न कि कल्पनाओं पर। रिया दोषी है या नहीं ये तय करना न्यायालय का कार्य है, आपका, हमारा, किसी मीडिया या सोशल मीडिया पर बैठे पोस्टकर्ता का कार्य नहीं। न्याय-पालिका हो ही काम करने दीजिए। भीड़ का न्याय न्याय नहीं लिंचिंग है।

 

लेखिका हिंदी में, दलित साहित्य में एम ए हैं और फिलहाल सी बी एस एस ई में कम्प्यूटर असिसटेंट हैं। चोखेरबाली पर उनका यह पहला लेख है।  

अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री को सिर्फ बाहर ही नहीं अपने भीतर भी लड़ना पड़ता है- अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री-विमर्श के तमाम सवालों को समेटने की कोशिश में लगे अनुप्रिया के रेखांकन इन दिनों सबसे विशिष्ट हैं। अपने कहन और असर में वे कई तरह से ...